निष्काम कर्म करने का फल

      एक बार सर्वशक्तिमान, मालिके-कुल, रूहानी जगत के शहनशाह श्री श्री 108 श्री परमहंस जी (श्री प्रथम पादशाही जी महाराज) जयपुर शहर मे विराजमान थे। सत्संग का अमृत-प्रवाह बह रहा था, उस समय एक भक्त ने विनय कि – हे प्रभो ! सकाम कर्म मे मनुष्य अपनी इच्छा अथवा मनोकामना की पूर्ति के लिए जी तोड़ परिश्रम करने मे संलग्न हो जाता है। उस कार्य को जिसमे कि उसका स्वयं का कुछ स्वार्थ छिपा होता है बहुत लगन एवं दिली शौक से पूरा करने का प्रत्यन करता है। जब उसकी मनोभिलाषा पूर्ण हो जाती है तो इससे उसको अपार खुशी होती है परन्तु विपरीत इसके इसके कोई निष्काम कर्म करने का संकल्प करे तो यह बात सत्य ही है कि निष्काम कर्म अवश्य कठिन होते है क्योकि निष्काम कर्म का अर्थ बिना प्रयोजन के अथवा बिना की स्वार्थ-सिद्धि के केवल मालिक की सेवा समझ कर कार्य मे रत रहना है। निष्काम कर्म करने वाले की कोई प्रकट रूप मे अपनी इच्छा अथवा कोई भी कामना तो नही होती, इसलिए गुप्त रूप से उसे क्या फल प्राप्त होगा?
      भक्त की विनय सुन श्री परमहंस दयाल जी ने फरमाया – ‘तुम्हारी बात सुनकर हमे एक दृष्टान्त याद आ रहा है’ सूनो –
      किसी गांव में एक विधवा रहती थी। उसका एकमात्र लड़का था। चक्की पीस कर वह गरीब स्त्री अपना अपने पुत्र का जीवन निर्वाह करती थी। एक दिन उस देश के बादशाह सुन्दर सवारी पर बैठ कर कही जाते हुए इसी गांव से गुजर रहे थे। धूम-धाम, बैण्ड-बाजे एवं आतिश बाजी आदि तथा साथ मे अत्यधिक सेना व जनसमूह पीछे चला आ रहा था। कोलाहल सुनकर यह लड़का भी तमाशा देखने बाहर आया। देखता क्या है कि बादशाह की अति सुसज्जित सवारी बडी शान व धूम-धाम से इसी ओर चली आ रही है। साथ मे सजे-सजाये घोडे, हाथी आदि बडे ठाठ-बाट के साथ बादशाह की सवारी के पीछे-पीछे चल रहे है। रथ व गाडियो की उनके पीछे कतारे है। कई प्रकार के वाद्ययन्त्र अपनी मधुर व मृदुल लहरियो द्वारा वायुमण्डल मे सरसता का संचार कर रहे है जिन्हें सुनकर मन अनायास ही मुग्ध हो जाता है। सबसे आगे एक अतीव सुन्दर रथ पर बादशाह सलामत बैठे है। लोग उन्हे सलाम करते जा रहे है तथा बादशाह भी हाथ जोड़ कर सबको सलाम का उत्तर दे रहे थे।
      जब बादशाह की सवारी आगे निकल गई तो उस बालक ने अपने मित्रो से कहा कि ‘बादशाह ने तो मुझसे कोई बात ही नही की।’ यह सुनकर सब लड़के उसकी नादानी पर खिल्ली उड़ाते हुए कहने लगे – वाह! वाह! तू है भी इस योग्य … ‘सोए झोपडो में, स्वप्न देखे महलो के कि बादशाह तुझसे अवश्य बोलते।’ इसप्रकार और भी कई बाते कह-कह कर लोगों ने उसे ताने देने शुरू किये तथा उसकी हँसी उड़ाने लगे। यह बात उस लड़के के दिल में चुभ गई। उसने प्रण कर लिया कि अब बात तो तब ही है कि बादशाह स्वयं मुझसे पूछे – ‘भाई तेरा क्या हाल है?’ परन्तु वह अपना यह विचार किसी के सामने प्रकट न करता और न ही किसी से सलाह लेता क्योकि लोग उसका मजाक करने लग जाते थे।
      एक दिन उस लड़के ने अपने दिल की बात माँ से कह सुनाई और पूछा। माँ ने कहा – ‘बेटा! वैसे तो यह बात अति असम्भव है, फिर भी ऐसी असम्भव बातो को सम्भव बनाने की युक्ति सन्त महापुरूष ही बता सकते है। उनकी कृपा से ही तेरी इच्छा पूर्ण हो सकती है।’ बस, फिर क्या था माँ से कुछ आशायुक्त उत्तर पाकर इसकी इच्छा ने उग्र रूप धारण कर लिया और सदैव इसी टोह मे रहता की कही सन्त जनो के दर्शन हो सके।
      कहते है कि दृढ संकल्प मे बहुत शक्ति होती ह्रै। दृढतापूर्वक कार्य करने वाला मनुष्य अपने जीवन के प्रत्येक कार्य मे सफलता प्राप्त कर लेता है। इस लड़के ने भी दृढता से अपने जीवन मे यह कहावत प्रत्यक्ष कर दिखाई कि हिम्मते मर्दा, मददे खुदा’ मै इस कार्य को अवश्य करके दिखाऊँगा। उसके इस विचार ने इसे सफलता की मंजिल पर जा पहुँचाया। वह किस प्रकार ? आगे पढिये
      एक बार शहर के बाहर कुछ एक साधुओ की मण्डली आकर ठहरी। यह लड़का वहाँ जाकर साधुओ की सेवा करने लगा। उनकी सेवा ऐसी श्रद्धा भावना तथा तन-प्राण से करने लगा कि मण्डली के सब साधु इनसे खुश हो गये। जब वे उस स्थान से चलने लगे तब उन्होंने इस बालक से कहा – वत्स ! हम सब तुम्हारी सेवा से अति प्रसन्न हुए है जिस श्रद्धा भावना से तूने हमारी सेवा की है। अब जो भी इच्छा हो हमसे माँग ले।
      तब उस लड़के ने हाथ बाँध कर कहा, ‘महाराज ! मेरा मनोरथ यह है कि हमारे देश का जो बादशाह है वह मुझ से पूछे कि ‘क्यो भाई ! तेरा क्या हाल है तथा तू क्या चाहता है ?’ यदि आप मेरी यह अभिलाषा पूर्ण कर सकते है तो कर दीजिए।’ लड़के के मुख से यह बात सुनकर वे भी आश्चर्य चकित हुए बिना न रह सके और कहने लगे कि ‘यह तेरा कैसा मनोरथ है बेटा ! धन-दौलत, इज्जत-मान, मकान आदि जो भी तेरी इच्छा हो हम से माँग ले, यह क्या व्यर्थ सी बात कर रहा है
      लड़के ने कहा – महाराज ! बेकार अथवा लाभप्रद जो कुछ है मेरी तो यही मात्र हार्दिक आकाँक्षा हे। यदि आप इस इच्छा की पूर्ति करने की कृपा कर देवे तो बहुत अच्छा; अन्यथा मुझे और किसी वस्तु की इच्छा नही है। कुछ क्षण सोचकर एक महात्मा जी ने कहा – अच्छा बेटा ! एक युक्ति हम तुझे बताते है। उसी के अनुसार ही तुम करना। वह युक्ति इसप्रकार है – इस शहर के बाहर इसी देश के बादशाह का अमुक स्थान पर जो महल बन रहा है, तू कल से वहां टोकरी ले जा कर मजदूरी करने का काम शुरू कर दे और वहां अत्यन्त परिश्रम व दिल लगाकर काम किया करना परन्तु साथ ही इस बात को याद रखना कि जिस समय सायकांल को वहां वेतन बटने लगे तो तू उस समय वहां से खिसक जाया करना। अपने किये हुए श्रम के बदले मे मजदूरी कभी न लेना। यदि राज-कर्मचारी तुझे मजदूरी देने के लिए विवश करे तो तू उनसे कहना कि मजदूरी तो मजदूरो को दी जाती है। यह तो मेरे अपने घर का ही काम है, तो मै इसकी मजदूरी क्यो लूँ।
      महात्मा जी को ‘सत्य वचन’ कह कर वह लड़का दूसरे दिन उस महल पर जाकर सेवा करने मे तल्लीन हो गया। पूर्ण सच्चाई से एडी से चोटी तक बल लगाकर वह परिश्रम करने लगा। जितनी ही देर मे दूसरे मजदूर एक टोकरी उठा कर लाते उतनी ही देर मे वह दो-तीन टोकरियां पलट जाता। राज-कर्मचारी उसके अथक परिश्रम को देख कर अत्यन्त प्रभावित हुआ। दिल मे सोचने लगे कि नया नया श्रमिक (मजदूर) आया है, इसलिए दिन-रात एक कर परिश्रम करता हुआ दृष्टिगत होता है परन्तु दो-चार दिनो मे यह भी अन्य मजदूरो की भाँति टके-गज की चाल से चलने लगेगा।
      सध्यां समय जब खजानची मजदूरी बाँटने लगा तो उस नये मजदूर को अत्यधिक खोजने पर भी न खोज पाया। इस तरह जब कई दिन अथक परिश्रम द्वारा कार्य में समस्त दिन जुटे रहना और वेतन प्राप्त करने के समय वहां से गुम हो जाना उसका नियम ही बन गया तब एक दिन उस लड़के को शाम को छुटटी के समय राज खजानची ने निकलते देख लिया। तब खजानची उससे पूछने लगा कि ‘तुम यहाँ पर किये गये अपने परिश्रम की मजदूरी क्यो नही लेते? मै कितने दिनो से देख रहा हुँ कि तुम कार्य तो पूरे श्रम से करते हो और जब वेतन-वितरण का समय आता है तब न मालूम तुम कहां अदृश्य हो जाते हो इसका क्या कारण है ?’
      उस समय लड़के ने महात्मा जी की बताई हुई बात कह दी कि ‘मेरा तो अपने ही घर का काम है, फ़िर मे मजदूरी किस बात की लूँ ? मजदूरी तो मजदूरो के लिए हुआ करती है, घर के सदस्यो के लिए नही।’
      लड़के की यह अनोखी बात सुनकर खजानची हैरानी मे पड़ गया। उसने कई बार उसको मजदूरी देनी चाही, परन्तु उस लड़के ने वेतन लेने से हर बार इन्कार कर दिया। शनेः शनेः उसके वेतन न लेने की चर्चा बहुत से आदमियो के कानो तक जा पहुँची।
      एक दिन स्वयं बादशाह महल का निरीक्षण करने आये तथा जितने समय तक वहाँ ठहरने का अवसर बना रहा, उस लड़के को बराबर भाग-भाग कर काम करते देख बादशाह ने पूछा – यह कौन है ? तब वहाँ के प्रबन्धक ने कहा कि ‘बादशाह सलामत ! यह मजदूर बहुत ही मेहनती है। जब से यह यहां पर कार्य करने के लिये आया है ; आज तक इसी चाल से ही अत्यधिक परिश्रम करने मे जूटा हुआ है। इसके कार्य करने मे कभी भी शिथिलता नही आने पाई।’ बादशाह उसे देख तो रहे ही थे। उन्होने प्रबन्धक से कहा – इसने जरा सी देर मे ही कितने चक्कर लगा डाले है। अतः आज तुम इसको कुछ ज्यादा मजदूरी दे देना।
      कार्य प्रबन्धक  ने विनय की – ‘हुजूर ! इस लड़के का अजीब हाल है। यहाँ पर काम करते हुए लगभग दो महीने होने को आए है। इसी प्रकार ही जी-तोड़ परिश्रम करता रहता है। असावधानी व अवकाश कभी नही करता। सुस्ताना ले इसने सीखा ही नही। इस पर भी यह हाल है कि मजदूरी नही लेता। न लेने पर कहता है कि यह तो मेरे अपने घर का काम है इसकी मजदूरी क्या लूं ?’
      बादशाह भी यह उत्तर पाकर आश्र्चर्य मे पड़ गए, साथ ही मन ही मन उसकी प्रशंसा किए बिना न रह सके। उन्होने लड़के को अपने पास बुलाकर पूछा – ‘कहो भाई ! तेरा क्या हाल है ? तू क्या चाहता है एवं परिश्रम करने पर भी मजदूरी क्यो नही लेता ?’
      बादशाह की यह बात सुनकर वह लड़का हाथ बाँधकर खड़ा हो गया तथा प्रत्युत्तर मे कहने लगा – ‘बस, सरकार ! आज मैने अपनी मजदूरी करने का वेतन प्राप्त कर लिया है। इसके अतिरिक्त मुझे कुछ नही चाहिये।’ यह उत्तर सुनकर बादशाह एवं सब कर्मचारी हैरान हो पूछने लगे कि ‘क्या बात है ? तुम्हारी कौन सी इच्छा पूर्ण हुई है ?’
      तब लड़के ने हाथ जोड़े हुए ही कहा – महाराज ! काफी समय से मेरी हार्दिक अभिलाषा थी कि आप स्वयं मुझसे ये कहे ‘क्यो भाई ! तेरा क्या हाल है और तू क्या चाहता है ?’ यह चिराभिलषा मेरी आज पूर्णता को प्राप्त हुई – वही शब्द मैने आपके मुख से सुन लिए है। अब शेष किसी वस्तु को पाने की इच्छा मेरे मन मे नही है।
      यह सुनकर बादशाह अति अचम्भित हुए कि यह कोई अनोखा आदमी है। इसकी कोई बात समझ मे नही आती। इसने तनिक सी बात के लिए इतना कठोर परिश्रम किया। बादशाह पूर्व ही लड़के के काम से प्रसन्न हो चुके थे। वे उसे अपने साथ महल ले आए और एक अच्छा एवं दायित्वपूर्ण कार्य उसको सौंप दिया। चूंकि मेहनत, लगन व सच्चाई से काम करने की उसकी प्रकृति बन चुकी थी। अतएव लड़के ने वहां भी ऐसी लगन व सच्चाई से कर दिखाया कि बादशाह उसको अपने हितैषियो व विश्वासपात्रो मे समझने लगे। इसप्रकार निष्काम भाव से कार्य करने के कारण उसने बादशाह के हदय मे अच्छा स्थान बना लिया।
      विधाता के कौतुक तो निराले होते ही है। हुआ क्या कि उन्ही दिनो वहां के मुख्यमंत्री की म्रत्यु हो गई। तब बादशाह ने उस लड़के को मुख्यमंत्री के उच्च पद नियुक्त कर दिया। उसके अचित प्रबन्ध करने की चर्चा सारे शहर में फैल गई। उसके उचित प्रबन्ध करने की चर्चा सारे शहर मे फैल गई। बादशाह की एकमात्र पुत्री थी। उस लड़के को हर प्रकार से सुयोग्य जानकर कुछ समय अपरान्त अपनी राजकुमारी का विवाह भी बादशाह ने उसके साथ कर दिया। इस प्रकार वह बाहशाह के परिवार का ही सदस्य बन गया। बादशाह का अपना कोई पुत्र न था। अतः जब बादशाह की मृत्यु का समय निकट आया तो इसी दामाद को ही अपना राज्य सौपं दिया। अन्त मे वही लड़का उस राज्य का बादशाह बन गया।
      यह दृष्टान्त सब को सुना कर श्री परमहंस दयाल जी ने फरमाया कि ‘अगर वही लड़का मजदूरी ले लेता तो दो-तीन महीने के पचास-साठ अथवा सौ रूपये मिल जाते परन्तु निष्काम कर्म करने की युक्ति सन्तो द्वारा सीख वही गरीब विधवा का लड़का बादशाह बन गया। जब इस दुनिया मे भी निष्काम कर्मो का फल मिल सकता है तो क्या परमात्मा की दरगाह में निष्काम कर्म व्यर्थ चले जायेगे? नही, ऐसा कभी भी नही सोचना चाहिये।’
जैसे कहा है –
।। दोहा ।।
      निष्काम कर्म करने मे बहुत शक्ति भरी हुई है। किसी जीव के भी निष्काम किये हुए कर्म व्यर्थ नही जाते। जैसे किसी प्रकार का भी बीज जमीन मे बोया जाये तो समय पाकर अवश्य ही अंकुर फूट पड़ता है। इसी प्रकार ही निष्काम कर्म भी समय आने पर आना रगं अवश्य लाते है।
      यह वचन श्रवण कर समस्त संगत प्रसन्नता से गदगद हो गयी तथा नतशिर हो उनकी सहदयता के गीत गाने लगे।

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