नट-नटनी के वाक्य ने बदला जीवन

       प्रातः स्मरणीय, वन्दनीय चरण, अज-गज उत्रायक श्री श्री 108 श्री सदगुरूदेव जी श्री दूसरी पादशाही जी महाराज ‘सन्त आश्रम चकौड़ी’ मे विराजमान थे। एक बार श्री पवित्र वचन हुए कि – उस सेवक और गुरूमुख की भक्ति उत्तम व श्रेष्ठ है जो गुरू दरबार की सेवा करते-करते अन्तिम क्षण तक सदगुरू के चरणो मे निभा जाये। यह मन तथा माया तो जीव को भरमाते रहते है। यदि यह जीव मन माया के धोखे मे आकर अपने कर्त्तव्य को पीठ दे बैठा तो उसकी बड़ी भारी हानि होती है।
  
।। दोहा ।।
      उदाहरणतय: एक किसान फसल बोते समय कितनी कड़ी मेहनत करे। पूरा वर्ष कठोर परिश्रम मे लगा रहे परन्तु फसल के पक जाने पर यदि वह चिडियो आदि पक्षियो से उसकी रक्षा न करे अथवा सावधान होकर खेत पर जाकर पहरा न देवे तो पक्षी उसकी उपेक्षा का लाभ उठाकर सम्पूर्ण पैदावार को नष्ट कर देगे। इस प्रकार उस किसान का सब परिश्रम निरर्थक चला जायेगा या जैसे एक बालक पूरे वर्ष भर पढने से अच्छी तरह मेहनत भी करे किन्तु परीक्षा के निकट आने पर वह अपनी लापरवाही से परीक्षा मे असफल हो जाए तो उस बालक के दिल पर क्या गुजरेगी ? जिस प्रकार किसान व बालक का परिश्रम व्यर्थ चला गया। इसी प्रकार उस सेवक की जिनको मन व मन के दूसरे साथी काम, क्रोध आदि बहका कर सेवक धर्म से विमुख कर दे तो उस सेवक की सब की गई साधना निष्फल चली जायेगी। सेवक को मन व माया के चंगुल मे फँसने से सदैव बचना चाहिए और अन्तिम श्वासों तक सदगुरू के दर पर एकचित्त होकर पड़े रहे तथा सेवा मे लगे रहे। ऐसा दृढ़ निश्चय रखने वाला सेवक अन्त मे सदगुरू की प्रसन्नता का पात्र बन जायेगा। इसी का नाम ही वास्तविक अर्थो मे गुरूमुखता है।
      किसान व बालक का नुकसान तो एक वर्ष का है। वे आगामी (अगले) वर्ष मे इसी कमी को पूरा कर सकते है परन्तु वह जीव जो मन माया के धोखे में आकर श्री सतगुरू की श्री आज्ञा व मौज मे न चलकर सेवा-भजन व सुमिरण को पीठ दे गया उसके नुकसान का तो अनुमान (अन्दाजा) ही लगाया जा सकता है। अतएव साधक भला या बुरा जैसा भी हो उसे गुरू दरबार मे पड़ा रहना चाहिए।
प्रत्येक समय उनके मुख से ये शब्द निकले –
।। शब्द ।।

      इस सत्यता का प्रमाण इस नीचे दिये गए दृष्टान्त से मिल जायेगा –
      एक राजा अति कृपण था। राज-दरबार मे अतुल धन पदार्थ होने पर भी खर्च करने मे उसका दिल हिचकिचाता था। न ही वह प्रजा के सुख-भोग के लिए कोई उत्तम साधन जुटाता था, न ही कभी दान-पुण्य करता था। ‘चमड़ी जाये पर दमड़ी न जाये’ वाली कहावत उस पर चरितार्थ होती थी। राजा की इस कृपणता से सभी दुःखी थे पर राजा के आगे कोई सिर कैसे उठाए।
      उस राजा के एक लड़का और एक लड़की थी। दोनो ही योवन सम्पन्न थे। राजा क्योकि पैसो को दाँतो से पकड़ता था, इसलिए वह पुत्र व पुत्री की शादी करने का विचार तक भी दिल में न लाता था। उनके इस व्यवहार से राजकुमारी व राजकुमार अत्यन्त दुःखी रहते थे। वे लज्जावश प्रत्यक्ष मे पिता से कुछ भी न कह सकते थे।
      एक बार उसी शहर मे एक नट व नटी तमाशा करने के लिए आए और उन्होने अपनी कला दिखाने के लिए राज-दरबार मे प्रार्थना की। पहले तो राजा आनाकानी करने लगा (क्योकि उसे राज्य-कोष से धन देना पड़ता था) परन्तु मंत्रियो आदि की सम्मति पर राजा ने उन्हें तमाशा दिखाने की स्वीकृति दे दी। शहर के बाहर खुले मैदान मे रंगमंच तैयार हो गया। रात का समय होने पर जब खेल आरम्भ होना था तब राजा, मंत्री, राजकुमार एवं राजकुमारी आदि सभी कौतुक देखने के लिए वहाँ आए। शहर की जनता भी अत्यधिक संख्या मे वहाँ पर एकत्रित हुई। वहाँ से कुछ दूरी पर एक साधु आश्रम था। वह भी ढोलक की आवाज सुनकर वहाँ आ गया।
      नट और नटी का खेल प्रारम्भ हुआ। जब उन्हें नाचते-गाते चार-पाँच घण्टे बीत गए और कंजूस राजा ने उन्हें कुछ भी पुरस्कार न दिया तो वे लेग निराश हो गए। नटनी नाचते-नाचते थक गयी तब उसने नृत्य करते-करते ही नट को सम्बोधित करते हुए कहा –
रात घड़ी भर रह गई, थोके पिंजर आय ।
कहे नटनी-सुन नायका, मदरा ताल बजाय ।।
     अभिप्राय यह है कि रात काकी बीत गई है और मै नाचते-नाचते थक गई हूँ इसलिए ताल (ढोलक) जरा धीरे-धोरे बजाओ। यह सुनकर नट ने उत्तर दिया –
बहुत गई थोड़ी रही, थोड़ी भी अब जाय ।
सुन नटनी! कहे मालदेव, ताल मे भंग न पाये ।।
      अर्थात् रात्रि बहुत तो बीत चुकी है। अब थोड़ी सी रात मे क्यो विघ्न डालती है ? इसलिए ऐ नटनी! तुम्हे ताल मे भंग (विघ्न) नही डालना चाहिए।
      नट के ये शब्द सुनकर राजा के लड़के ने अपने गले से स्वर्ण हार उतार कर नटनी को दे दिया और राजकुमारी ने अपने हाथ का जड़ाऊ कंगन नटनी को पारितोषिक (इनाम) के रूप मे दे दिया। साधु जो पास मे ही खड़ा था उसने अपने ऊपर से कम्बल उतार कर नटनी को दे दिया। इनाम पाकर नट-नटनी ने खेल बंद कर दिया। कंजूस राजा ने यद्यपि उन्हे कोई ईनाम न दिया था अपितु लड़के व लड़की ने भी को ईनाम दिये थे वे भी उसे खलने लगे।
      राजा ने रात तो जैसे-तैसे चिन्ता मे बिता दी। प्रातः होते ही पुत्र व पुत्री को बुलाकर पूछने लगा कि रात मे उन नट-नटनी को तुमने इतना अधिक पुरस्कार क्यो दिया ? पहले तो लज्जा के कारण वे चुप रहे परन्तु बार-बार पूछने पर लड़के ने कहा – पिताजी! मै आपके व्यवहार व कृपणता से तंग आ गया था। आप न तो मेरा विवाह करते है और न हमारी आवश्यकताओ की पूर्ति करते है। अब मैने विवश होकर आज ही रात को आपको मारने की योजना बनाई थी परन्तु नट के इन वाक्यो ने मेरे इस विचार को बदल डाला है। जिससे आपके प्राण भी बच गए है। उन वाक्यो से मुझे शिक्षा प्राप्त हुई कि ‘बहुत गुजर गई है, अब ताल मे भंग न पाये।’ इसी कारण मैने नटनी को अपना हार पारितोषिक रूप मे दिया। राजा लड़के का उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित हुआ।
      अब राजा ने पुत्री से पूछा कि तेरा नटनी को स्वर्ण कंगन देने का क्या प्रयोजन था ? लड़की ने लज्जावश आँखे झुका ली। पिता जी के दुबारा पूछने पर लड़की ने कहा – पिता जी! मै क्या कहूँ, मुझे कहना तो नही चाहिए परन्तु आपके बार-बार पूछने पर बताना ही पड़ा। मै अब युवावस्था मे पदार्पण कर चुकी हूँ परन्तु आपको मेरी कोई चिन्ता नही है। अन्ततः विवश होकर मैने मंत्री दे लड़के के साथ आज रात को यहाँ से चले जाने का निश्चय किया लेकिन नट के ज्ञान भरे वाक्य ने ‘बहुत गई थोड़ी रही, थोड़ी अब जाय’ मेरी आँखे खोल दी। अतः मैंने इस वाक्य को हदयंगम कर सोचा कि आपकी अपकीर्ति न हो, मैने जाने का विचार त्याग दिया। इस अच्छी शिक्षा के कारण मैने नटनी को अपना स्वर्ण कंगन इनाम मे दिया। अपने लड़के व लड़की की बात सुनकर राजा के आश्चर्य की सीमा न रही। राजा ने दिल मे सोचा कि उस साधु ने भी तो नटनी को कम्बल दिया था। उससे भी कारण पूछना चाहिये।
      राजा ने नौकर को भेजकर साधु को बुलवाया। साधु के आने पर राजा ने साधु से नटनी को कम्बल देने का कारण पूछा। तब उस साधु ने उत्तर दिया कि ‘राजन! बहुत समय पूर्व मैने संसार के दुःखो से दुखी होकर सम्बन्धियो के स्वार्यमय व्यवहार से तंग आकर रिश्ते-नातो से विरक्त हो उनसे उदासीन होकर गृह त्याग कर संन्यास ले लिया था। आपके शहर के बाहर कुटिया बनाकर भगवद्-भजन-ध्यान आदि किया करता था। इस तरह साधना करते-करते कई वर्ष बीत गये। अब कुछ समय से यह मन जो जन्म-जन्मो से जीव का शत्रु है इसने मेरे ऊपर अपना प्रभाव डालना शुरू कर दिया। मन के धोखे मे आकर परित्याग किये हुए संसार के क्षणभंगुर सुख एवं माया के झिलमिलाते लुभावने रंग फिर से मेरी आँखो के समक्ष नाचने लगे है। अतः कई दिनो से मेरा मन के साथ युद्ध चल रहा है।

।। दोहा ।।
तुलसी रण मे जूझना, घड़ी एक काम ।
नित उठ मन मे जूझना, बिन खाण्डे संग्राम ।।
      मै अपनी इस अवस्था से परेशान था। मन मुझे फिर संसार की दल-दल मे फंसाने का भरकस प्रत्यन कर रहा था। आज नट-नटनी के शिक्षाप्रद वाक्य से मुझे अत्यधिक लाभ हुआ कि ‘ताल मे भंग न पाये।’ इसी उपदेश को श्रवण करने से मैने मन को परास्त कर दिया और पुनः भजनाभ्यास व ईश्वर-प्राप्ति के साधन मे जुटे रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया है। मेरे पास सिवाय कम्बल के और कोई धन पदार्थ तो था नही हसीलिए मैने उसे कम्बल ही इनाम के रूप मे दे दिया। 
      इन तीनो की बातें सुनकर राजा के मन पर बहुत चोट लगी। तब राजा ने नट नटनी को बुलाकर उन्हें बहुत सा पुरस्कार दिया और लड़की का विवाह करके अपना राज-पाठ पुत्र को सौंप दिया। राजा के मन मे भी अब तीव्र वैराग्य उत्पन्न हो चुका था। इसलिए राज-काज व घर-गृहस्थी को त्याग कर राजा ने सन्त-सत्पुरूषो की शरण ग्रहण की। उनसे नाम की दीक्षा लेकर भजनाभ्यास द्वारा ईश्वर प्राप्ति के लिए जंगल मे चल दिया। तात्पर्य यह है कि –

।। दोहा ।।
      अर्थात् जब मन रूपी इस नदी मे सदैव ही मायावी कामनाओ की विचियाँ (लहरे) उठती रहती है। जो जीव इन तरंगो के भँवर मे आ जाता है तो उसकी ज्ञान व विवेक वाली बुद्धि सब नष्ट हो जाती है। जिससे उसे लाभ हानि कुछ भी नही सूझता। इसकी तरंग एक बाढ़ का रूप धारण करके आती है जो कि जीव को आवागमन के गहरे भवसागर मे डाल सदैव के लिए दुःखी बना देती है। परन्तु जो भक्तिवान पुरुष होते है वे मन की तरंग मे न आकर भक्ति की तरंग में अपने आपको लीन करते है। जिससे वे शाश्वत सुख के अधिकारी बन जाते है।

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