दौलत का नशा

      माया के अनेक रूप व अगणित नाम है। यह अनेक रूप बनाकर मनुष्य को भरमाती रहती है। इस विषय का वर्णन तो फिर कभी किया जायेगा। अब तो केवल हमने माया के नाम की चर्चा करनी है। माया के कई नाम है। उदाहरणतः – लक्ष्मी, रूपया, पैसा, धन, दौलत आदि-आदि। इसके अतिरिक्त इसके और भी कई नाम है। आज के इस प्रंसग मे ‘दौलत’ का ही वृत्तान्त ही सुन लिजिये। दौलत का अर्थ है – ‘दो लातोंवाली’। अब देखना इस बात को है कि इसकी दो लातें कैसी है और यह लातें (टाँगे) चलती कैसे है तथा इसका क्या परिणाम निकलता है ? इस सत्य का विशद वर्णन निम्नलिखित दृष्टान्त मे पढिये –



       किसी नगर मे एक कुम्हार रहता था। वैसे तो उसका नाम रामदास था परन्तु गरीब होने के कारण लोग उसे रामू कहते थे। उसका प्रतिदिन का काम था जंगल से मिट्टी लाना, परिश्रम करके बर्तन बनाना, फिर उन्हे बेचना। उससे जो कुछ भी मिलता उसी पर रामू सन्तुष्ट रहता था। लालच, झूठ, एवं क्रोधादि अवगुण उसमे न था। एक रात उसने स्वप्न मे देखा कि लक्ष्मी देवी उससे कह रही थी कि मै तुम्हारे घर आ रही हूँ। वह प्रातः उठा। रात्रि के स्वप्न की और उसने कुछ विशेष ध्यान न दिया। मन मे यह कहा कि स्वप्न तो प्रायः असत्य ही होते है। 
      नित्य की भाँति वह गधे को लेकर जंगल मे उस स्थान पर गया जहाँ से वह हर रोज मिट्टी लाया करता था। वह कुदाली से मिट्टी खोदने लगा। मिट्टी खोदते-खोदते उसकी कुदाली किसी चीज से टकरा गई। रामू ने इधर-उधर की मिट्टी हटाकर देखा तो उस स्थान से पीतल की एक गागर निकली जो कि स्वर्ण-आभूषणों से भरी हुई थी। गागर को देखकर उसका हदय प्रसन्नता से भर उठा। उसने क्या किया कि पुनः गड्ढ़ा खोद कर गागर धरती मे ही दबा दी तथा रात्रि होने पर वह गागर निकाल कर अपने घर ले आया।
      उस अपार धन को पाकर रामू ने सबसे पूर्व जिस नगर मे रहता था, उसको छोड़कर अन्य बड़े शहर मे एक अच्छा मकान खरीद लिया एवं गधे आदि बेचकर कपड़े की एक दुकान खोल ली। कुछ ही दिनों मे वह दुकान चल निकली और अब रामू का नाम ‘सेठ रामदास’ पड़ गया।
 सत्य है ‘परसु, परसा, परसराम, माया तेरे तीन नाम।’ अत्यधिक धनराशि के हाथ लगने पर सेठ रामदास ने गरीबो को सूद पर ऋण देना शुरु कर दिया। गरीब लोगों के आभूषण रख कर सूद पर रूपया आदि देता। यदि किसी निर्धन ने समय पर धन सूद सहित नही पहुँचाया तो रामदास उसके जेवर जपत कर लेता और सूद भी बहुत अधिक लेता था।           
      प्रचुर धन की वृद्धि हो जाने पर सेठ रामदास ने अपनी लड़की का विवाह एक धनाढ्य परिवार मे कर दिया। छोटे लड़के को विद्याध्ययन के लिए इंग्लैंड़ भेज दिया। बड़े बेटे को कपड़े की दुकान का कार्य सौंप दिया तथा स्वयं अच्छे-अच्छे कपड़े पहन कर अहंकार मे झूमता हुआ चलता। किसी से बात तक भी करना पंसद न करता था क्योकि वह अपने आगे किसी को कुछ न समझता था।
      इस प्रकार पाँच-छ: वर्ष व्यतीत हो गये। धन के अभिमान मे सेठ रामदास का स्वभाव बहुत चिड़चिड़ा हो गया। पैसे ने उसकी बुद्धि को इस प्रकार मलिन कर दिया कि नौकर-चाकर अथवा मुनीम से थोड़ी सी भी त्रुटि होने पर वह उसका अपमान किए बगैर न रहता। एक बार एक साधारण व्यक्ति ने अपनी लड़की की शादी के लिए कुछ रूपया इससे उधार लिया और मकान भी गिरवी रखवा दिया। वह ऋण समय पर न उतार सका तो सेठ रामदास ने उसे मकान से निकलवा कर उस मकान को तथा उसके सामान को बेचकर अपनी धन-राशि वसूल ली। वह गरीब आदमी इस दुःख मे घुल-घुल कर मर गया। उसके बाल-बच्चे भूखों तड़पने लगे। इतना सब कुछ अपनी आँखो से देखते हुए भी उसके प्रति रामदास के मन में तनिक भी दया न आई। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन इसकी क्रूरता बढ़ती गई। गली मोहल्ले के लोग इसके दुर्व्यवहार से तंग आ गए परन्तु माया ने इसको ऐसा अन्धा किया कि वह किसी की प्रवाह न करता था। यह तो दौलत की पहली लात का वर्णन है जो मानव की पीठ पर बलपूर्वक चोट करती है और मनुष्य उस चोट को सहन न कर सकने के कारण माया का दिवाना हो अहंकार मे आकर अकड़-अकड़ कर चलने लगता है।
      अब दौलत की दूसरी लात का भी वर्णन सुन लिजिये –
      पुनः एक दिन रामदास को स्वप्न मे लक्ष्मीदेवी ने कहा कि ‘ मै तुम्हारे पास से जा रही हूँ।’ अब तो रामदास क्योकि स्वप्न को सत्य मान चुका था कि स्वप्न मे ही जब उसे लक्ष्मी ने आने के लिए सम्बोधित किया तो दूसरे दिन उसे अपार धन-राशि हाथ लगी। इसी बलबूते पर रामदास ने अकड़ कर कहा – मै देखता हूँ तू कैसे जाती है ? तब दूसरे दिन रामदास ने सब नकदी रूपया बैंक मे जमा करा दिया और सोने चाँदी को लोहे की तिजोरी मे सुरक्षित रख मजबूत ताला लगवा दिया। अपनी तरफ से तो मानव बुद्धि द्वारा उसने धन को सुरक्षित रखने मे किसी प्रकार की कमी न छोड़ी परन्तु दैविक शक्ति के हाथ किसने पकड़े ? तदनुसार उसी रात्रि को इसकी दुकान मे आग लग गई। कपड़े की दुकान थी सब कपड़ा जल के राख हो गया। आग लगने का समाचार सुन इसने मन मे विचार किया कि बैंक मेरा अत्यधिक धन जमा पड़ा है और आभूषणों से तिजोरी भी भरी पड़ी है। उसका विक्रय करके नई दुकान खोल लूंगा। परन्तु विधना के खेल तो निराले होते है। अचानक उसको दूसरे दिन पता लगा कि जिस बैंक मे धन-राशि थी वह बैंक फेल हो गया है। अब तो रामदास बहुत घबराया लेकिन अभी उसके दिल मे आशा का दीपक धूमिल प्रकाश लिए टिमटिमा रहा था। रामदास को अब केवल अपने तिजोरी वाले जेवरो का ही भरोसा रह गया था। लेकिन उसको क्या ज्ञात था कि मेरी स्मस्त आशा पर पानी पड़ जायेगा। तिसरे दिन रात्रि को चोर तिजोरी का ताला तोड़कर सब सामान सोने चाँदी के आभूषण व नकदी रूपया लेकर चलते बने। चौथे दिन इंलैण्ड से लड़के का पत्र आया कि मै बीमार हो गया हूँ। मुझे खर्च व इलाज के लिए धन भेजो। लेकिन यहाँ तो रामदास को चारों तरफ से दुःखो ने घेर लिया था। उसको स्वयं को मात्र देखने के लिए पैसा तक न रहा। जीविका चलाने के लिए मकान तक बेचना पड़ा। लोगों के आभूषण जो कि उसने पास धरोहर (अमानत) के रूप मे पड़े थे चोरी हो जाने से वे लोग आकर इसे तंग करने लगे। अब तो रामदास को मारे निर्धनता से बहुत बुरा हाल था। इन सब दुःखो से उसे पक्षाघात (फालिज) हो गया। धन का अभाव होने से उचित रूप से चिकित्सा भी न हो सकी। जिससे उसकी कमर टेढ़ी हो गई और यह उस दुःख मे घुलने लगा।

      एक दिन यह लाठी का सहारा लेकर यह मकान से बाहर निकला। किसी जान-पहचान वाले ने पूछा कि ‘अरे रामदास! यह तुम्हे क्या हो गया ? तुम तो पहचाने भी नही जाते।’ यह सुनकर रामदास ने रो-रो कर उत्तर दिया कि यह सब दौलत का परिणाम है। दौलत ने आते ही मेरी पीठ पर ऐसी कसकर लात मारी जिससे मै अकड़ गया था और जाती बार मेरी छाती पर दौलत ने इतना बलपूर्वक प्रहार किया कि जिससे मेरी कमर तक टेढ़ी हो गई तथा मुझे कुबड़ा कर गई। दौलत आने-जाने पर लात मारती है। इसलिए मनुष्य को माया के आने पर घमण्ड एवं जाने का शोक नही करना चाहिये। यह तो एक ढलती छाया है कभी इधर-कभी उधर।

।। शेअर ।।
दो दिन जग मे जीना है, इतने पर क्यो इतराते हो ।
मेरी  काया  मेरी  माया,  शोर  मचाते  जाते  हो ।।
साथ  नही  हरि  नाम लिया, गफलत मे  दिन  रात  कटे ।
       काया भी बदनाम करी, अफसोस की खाली हाथ चले ।।       

      अर्थात् ऐसा ना हो कि संसार से जाते हुए अन्त मे पश्चाताप की ज्वाला मे जलते चले। जैसे कि सिकन्दर बादशाह व रावण आदि महा सम्राट मरते समय चीत्कार करते रहे। इसलिए जीवन काल मे पूर्ण सत्पुरूषो द्वारा बताये गए उपदेशो का अनुसरण कर एवं अपने तन-मन-धन को श्रेष्ठ कार्य मे लगाते हुए और मालिक का नाम जपते हुए अपने जीवन का लाभ उठाये।     

                

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