दो प्रकार की आग (आध्यात्म)

      आग को महापुरूषो ने दो प्रकार की कहा है। एक यह आग है कि जिससे भोजन सामग्री तैयार की जाती है। इसके सम्बन्ध मे इतना कहा जा सकता है कि इस आग को युक्ति पूर्वक प्रयोग मे लाया जाए तो आप इससे हर प्रकार का भोजन तैयार कर सकते है। यह आग मनुष्य के लिए लाभदायक है। विपरीत इसके जरा सी गफलत या लापरवाही की गई तो यह आग इतना नुकसान पहुँचा सकती है कि पूरे घर को जला कर राख कर देती है।

      इसके अतिरिक्त दूसरी आग मनुष्य के हदय की है। यह भी दो प्रकार की है – पहली तो क्रोध की अग्नि है। जिससे मनुष्य को बचना ही चाहिए। यह क्रोधाग्नि जिज्ञासु के लिए तो बहुत हानिकर है। दूसरी है प्रेम की अग्नि इसकी सत्पुरूषो ने बहुत प्रशंसा की है। एक फकीर का वचन है।

।। शेअर ।।
दर दिले आंशिक चूं, इश्क आतिशे अफरोख्त ।
हर चें जुज माशूक बूद, ओ रा विसोख्त ।।

        अर्थात् जब प्रेमी के हदय मे प्रेम की आग भड़क उठती है तो वह प्रियतम के सिवाय सब वस्तुओ – काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार विषय-विकारादि को जलाकर राख कर देती है। प्रेमी के दिल मे केवल प्रियतम ही रह जाता है।
      निम्नलिखित दृष्टान्त अन्दर वाली अग्नियो (क्रोध व प्रेम) के विषय पर है।   
      दो मित्र एक स्थान पर बैठे थे। सर्दी का दिन था। अतः उनको आग की आवश्यकता पड़ी। एक ने कहा कि यदि कही से आग मिल जाती तो हम सेकते और सर्दी से छूटकारा पाते। दूसरे मित्र ने पूछा – प्रकट आग चाहते हो अथवा परोक्ष (गुप्त) अग्नि की इच्छा रखते हो। वह ज्ञानवान् था। उसने पूछा की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष आग कैसी होती है।
      दूसरे ने उत्तर दिया – प्रकट आग तो यह है कि जो बाँसो अथवा चकमक के परस्पर रगड़ने से पैदा होती है, यह अग्नि घास व लकड़ियो आदि को जलाती है। दूसरी गुप्त आग वह है जो मनुष्य के अन्तस्थल मे उत्पन्न होती है। यह भीतर की आग भी दो प्रकार की होती है – एक प्रकार की अग्नि तो उसी को जलाती है। जिसके दिल मे वह पैदा होती है। दूसरी अग्नि इससे अच्छी होती है। वह दूसरो के दिल की मलिनता व बुराईयो को वशीभूत कर देती है और दोनों के मन को शान्तमय करती है। तब पहले मित्र ने सोच कर कहा – तो आप पहले मुझे भीतर की आग दिखा दो। दूसरे मित्र ने कहा – चलो, आग दिखाता हुँ। दोनो मित्र वहाँ से चल दिये। थोड़ी दूरी पर एक साधु का झोपड़ा था। वहाँ पहुँचकर कहने लगे – बाबा जी! थोड़ी सी आग दे दो।
       यह सुनकर बोला – चल, परे हट! यहाँ पर आग क्या काम?
      वे दोनों बोले – हम सर्दी के कारण अत्यन्त परेशान हो रहे है। इसलिए बाबा जी! कृपा कर आप केवल एक ही चिनगारी दे दिजिये।
      उनके इस प्रकार गिड़गिड़ाने पर भी साधु बिगड़ा और कहने लगा – क्या तुम सुन नही रहे कि यहां पर आग-वाग नही है ?
      उनमे से ज्ञानवान् ने कहा – बाबा जी! धुआँ तो उठ रहा है। इससे सिद्ध होता है कि आग अवश्य होगी।
      उसकी यह बात सुन साधु ने उन्हे डाँट-डपट कर दो-चार कड़ी बातें सुना डाली। वे दोनो पुनः बोल उठे – आग तो प्रज्वलित हो रही है।

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      अब तो साधु महाराज ने  ‘आव न देखा ताव’ चिमटा उठाया और उन्हे मारने को चले। तत्क्षण दोनो मित्र भाग खड़े हुए तथा भागते हुए भी कहने लगे – ‘देखा ना, बाबा जी! अब तो वह आग और भी प्रचण्ड रूप धारण कर चुकी है। उसकी लपेटे आकाश को छूने लगी है।’
      वहाँ से आगे चलते हुए ज्ञानवान् मित्र दूसरे मित्र से कहने लगा – मित्र! अब तुम समझ गए ? एक तो यह क्रोध की भीतरी आग है। यह क्रोध चाहे अन्य किसी को किसी प्रकार की हानि न भी पहुँचा सके परन्तु इस क्रोधाग्नि से क्रोध करने वाले मनुष्य का मन सदैव जलता रहता है जिससे वह हर समय अशान्त बना रहता है। तत्पश्चात दोनों मित्र एक अन्य साधु के पास गए और वहाँ पहुँचकर वही आग का प्रश्न किया।
      उस साधु ने कहा आग तो यहाँ है नही। यह बात सुनकर उन दोनो ने जान-बुझकर कुछ कठोर वचन कहे। परन्तु यह साधु अत्यन्त धैर्यवान्, श्रेष्ठ विचारो वाला एवं सुशील प्रकृति का था। वह समझ गया और अत्यन्त मधुर वाणी मे हँस कर कहने लगा – हाँ! मेरे पास आग है। आओ, यहाँ मेरे पास बैठो। तनिक शान्ति से मेरी बात सुनो। यहाँ से तुम्हे वह आग प्राप्त होगी जिसे पाकर की तुम प्रसन्न हो जाओगे।
      साधु के यह वचन सुनकर दोनो मित्र उनके निकट आकर बैठ गये। तब साधु ने उपयुक्त समयानुसार इस प्रकार का उनके साथ वार्त्तालाप आरम्भ किया – बेटो! तुम प्रत्यक्ष आग के पीछे मत पड़ो। तुम ऐसी आग की खोज करो कि जिसे पाकर तुम्हारा पूरा जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हो सके। जिस आग की प्राप्ति की हम तुमसे बात कर रहे है। इसकी प्रशंसा तो ऋषि-मुनिजन तक करते रहते है।
      ‘ऋग्वेद’ की ऋचाओ मे इस आग की अत्यधिक महिमा गाई गई है। जैसे –
‘ॐ-अग्निमीडे पुरोहितम्
      अर्थात् मै उस (अग्नि) प्रकाश-स्वरूप (पुरोहित) सृष्टि के पूर्व से ही वर्तमान उस परमात्मा की (इडे) स्तुति करता हुँ – उनकी शरण मे जाता हुँ।
      साधु महाराज पुनः कथन करते हुए कहने लगे – यह वह आग है जो सबका कल्याण व उद्धार करती है। यही सब जीवो की उन्नति का एकमात्र उत्तम साधन है। इस अग्नि का दूसरा नाम है – ‘प्रेमभक्ति’। यह हदय के समस्त मलिन विचारो को भस्म करने वाली तथा अपवित्र हदय को पावन करने वाली है। तुम भी इस ‘प्रेम-भक्ति’ रूपी अग्नि की प्राप्ति का यत्न करो जिससे तुम काल व कर्म रूपी सर्दी से अनायास ही छूटकारा पा लेगे। फिर तुम्हारे मन मे शाश्वत शान्ति निवास करेगी।
      दोनो मित्र इस साधु के सदव्यवहार को देख तथा मधुर वचनो को सुनकर अति प्रभावित हुए। दोनो मित्रो ने उस साधु को सादर प्रणाम कर श्रद्धापूर्वक उनसे प्रेम भक्ति रूपी अग्नि का साधन पूछा। साधु जी ने उसे आन्तरिक योग साधन की रीति बताई जिससे दोनों के जीवन मे भक्ति की भावना उत्पन्न हो गई। अब वे दोनों नित्यप्रति संत्सग मे आने लगे। महात्मा जी के वचनो पर आचरण कर दोनों का जीवन सफल हो गया।

।। दोहा ।।
ज्यों तिल माही तेल है, ज्यो चकमक मे आगि ।
 तेरा साई तुज्झ मे, जागि सकै तो जागि ।
      भाव यह है कि जिस प्रकार तिलो मे तेल और चकमक पत्थर मे अग्नि समाहित होती है, जो कि प्रत्यन द्वारा प्राप्त की जा सकती है। इसी प्रकार ही प्रत्येक मनुष्य के अन्तःकरण मे वह सच्चा परमपिता परमात्मा विराजमान् है। उसका साक्षात्कार करने के लिए भी प्रयत्न व साधन करने की आवश्यकता है।परन्तु यह साधन केवल पूर्ण ब्रह्मवेत्ता, तत्वदर्शी, सन्त-सदगुरु जी की शरण मे जाने से ही प्राप्त हो सकता है। पुनः उस साधन की साधना (कमाई) करके जिज्ञासु प्रेम-भक्ति रूपी अग्नि अपने हदय मे प्रज्वलित कर सकने मे सफलता प्राप्त कर सकता है। इस दिव्य अग्नि से प्रचण्ड होने पर हदय की समस्त मलिनता व पाँचो विकार स्वयमेव दग्ध हो जाते है और साधक अनायास ही शान्त रूप होकर अपने घट मे मालिक का साक्षात्कार कर लेता है।       

         

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