देश सम्राट के प्रति एक व्यक्ति का निस्वार्थ प्रेम

       ‘श्रद्धा’ कितना सुन्दर शब्द है। एकमात्र जीवन मे इसके होने से भक्ति-मार्ग मे सब कुछ स्वतः पाया जा सकता है। इसी सच्ची श्रद्धा भावना से ही दूसरे को आकृष्ट किया जा सकता है। इतिहास मे कितने ही प्रमाण है। छोटी से छोटी श्रेणी वाला व्यक्ति भी इस उत्तम गुण के द्वारा देश के बादशाह तक की प्रसन्नता प्राप्त कर लेता है। इसी प्रकार यदि जीव सन्त-सत्पुरूषो पर सच्ची श्रद्धा व भावना रखे तो वे क्या इससे प्रसन्न न होगे? अवश्य होगे। यही एक साधन है उन्हे प्रसन्न करने का। सतगुरू जब भी प्रसन्न होगे तो केवल हदय की शुद्ध व पवित्र भावना से ही। इसी का दूसरा नाम श्रद्धा है।
      अब आइये तनिक नीचे लिखे दृष्टान्त मे श्रद्धा का स्पष्ट प्रमाण भी देख लीजिये
      एक समय की बात है। रेगिस्तान के किसी क्षेत्र मे पानी का बहुत अभाव था। कोसो तक पानी का नाम निशान न था। पीने के निर्वाह के लिए लोगो को बहुत दूर से पानी लाना पड़ता था। जैसे की कृपण व्यक्ति धन को सँभाल-सँभालकर व्यय (खर्च) करता है, उसी प्रकार वहाँ के निवासी भी बहुत दूर से पानी लाते तो उसे बहुत विचारपूर्वक प्रयोग करते। पानी की एक बूंद भी वृथा न जाने देते। पानी की इतनी अधिक न्यूनता (कमी) थी कि प्यास के कारण किसी किसी समय व किसी किसी वर्ष मे कई व्यक्ति व पशु तक भी मारे जाते थे। न ही वहाँ कोई कुआँ और तालाब था जो कभी वर्षा आने से भर जाता। इस प्रकार वहाँ की जनता अत्यन्त दुःखमय जीवन व्यतीत कर रही थी।
      एक दिन एक मनुष्य के मन मे यह विचार आया कि जब हमे पानी का इतना अभाव सताता हे तो हमारे देश का जो बादशाह है उसे पानी की कितनी कमी होती होगी हमारे राजा को पानी के बिना कितना कष्ट उठाना पड़ता होगा। अच्छा तो यही होगा कि मै कुछ थोड़ा सा पानी राजा के पास ले जाऊं परन्तु इतनी दूर पानी ले कैसे जाऊँ? बादशाह का शहर वहाँ से मिलो दूर था। कुछ दिन तो वह सोचता रहा। आखिर एक दिन उसने पानी का एक घड़ा भर कर सिर पर उठा लिया तथा खाने का सामान व अपने लिए पानी भी अलग ले लिया क्योकि वह पानी का कलश तो राजा के लिए भेंट स्वरूप ले जा रहा था। पद यात्रा करते हुए छः सात दिन के बाद व्यक्ति बादशाह के नगर मे जा पहुँचा और पूछते-पूछते राजमहल तक पहुँच ही गया।
      वह श्रद्धालु व्यक्ति पानी तो इस भावना से लाया था कि हमारी भाँति बादशाह को भी जल का अभाव खटकता होगा परन्तु विपरीत इसके क्या देखता है राजमहल के पीछे की तरफ एक नदी बह रही है जिसमे शीतल जल उछालियाँ भरता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है। तथा बादशाह अपने मंत्री के साथ नदी की लहरो पर नाव मे बैठ कर विहार (सैर) कर रहे है। पानी लाने वाले मनुष्य ने देखा कि जिस पानी को मै अमूल्य वस्तु समझकर इतनी दूर से यहाँ लाया हुँ उस पानी की यहाँ क्या कीमत हो सकती है? कई दिनो का थका माँदा निराश हो पानी का घड़ा सिर से उतार कर पास रख लिया और स्वयं एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे। थोड़ी देर तक बैठा-बैठा राजा को नौका विहार करते हुए देखता रहा।
      कुछ देर बाद अचानक बादशाह की दृष्टि उस व्यक्ति पर पड़ी तब बादशाह ने मंत्री से कहा – मंत्री जी ! जाओ देखो, वह व्यक्ति काफी समय से वृक्ष के नीचे बैठा हुआ है, वह कौन है तथा किस उददेश्य (विचार) से यहां बैठा है?
      मंत्री बादशाह की आज्ञा पाकर वहां पर आया जिस स्थान पर वह व्यक्ति बैठा हुआ था। मंत्री के पूछने पर उस व्यक्ति ने जल कलश लाने का समस्त वृत्तान्त अथ से इति तक कह सुनाया।
      मन्त्री ने उस व्यक्ति के मुख से सुनी हुई, उनके क्षेत्र मे पानी का अभाव की एवं उस की श्रद्धा भावना से बादशाह के लिए जल कलश भर कर लाने की बात बादशाह को सुनाई। बादशाह उसके प्यार व सच्ची भावना से बहुत प्रसन्न हुए। उस व्यक्ति को अपने निकट बुलाया और उसकी श्रद्धा की अनुपम भेटं अर्थात पानी का कलश लेकर उस जल को नदी मे डलवा दिया तथा मंत्री को कहा कि ‘मंत्री जी ! राज्य कोष से यह घड़ा अशर्फियो से भरकर ले आयो। हम इसकी सच्ची भावना व श्रद्धा से अत्यन्त प्रसन्न हुए है। अतः तुम जाओ – इनके क्षेत्र में एक कुआँ भी खुदवा दो जिससे इन्हे पानी की कमी न रहे।’ बादशाह से अतुल धन-राशि प्राप्त कर एवं जल की सुगमता का साधन पूर्वक गांव लौट आया।
      भाव यह है कि सरलता व निष्कपटता कितना अपने आप मे श्रेष्ठतम गुण-पूज्य है। जिस प्रकार इस दृष्टान्त से स्पष्ट होता है कि सरल-हदय ग्रामीण झ्स उदात्त भावना से ही राजा को प्रसन्न कर आया तथा अपने व ग्रामवासियो के लिए सुख का साधन भी जुटा लिया इसी श्रद्धा के प्रकरण मे कितना ही सुन्दर प्रमाण द्वापर युग का हमारे सामने है – यदि एक भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी अपनी पटरानियो सहित अन्तःपुर में बैठे थे। सखियाँ दूसरे के प्रेम की स्पर्धा सहित प्रशंसा कर रही थी। भगवान कृष्ण चाकू से कोई फल काट रहे थे – साथ ही उनकी प्रेम-वार्ता सुन-सुन कर मुस्करा भी रहे थे – साथ ही प्रेम की परीक्षा लेने हेतु एवं संसार से प्रेम का अनुपम आदर्श स्थापित करने के लिए उन्होंने स्वयमेव चाकू से अपना हाथ की अंगुली पर थोड़ा सा जख्म कर दिया जिस से रक्त की धारा बह निकली। यह देख सब इधर-उधर भागने लगी – कोई दवा लेने को धायी- कोई हाथ दबाने लगी इत्यादि। प्रेम प्रतिमा द्रुपद सुता भी वही उपस्थित थी। जब उसने देखा कि मधुसूदन की अंगुली से लहु टपकता जा रहा था तो झट से अपनी धारण की हुई बहुमूल्य साड़ी मे से कुछ कपड़ा फाड दिया और उसे जलाकर वह राख घाव पर लगा कर ऊपर से पटटी बाँध दी। उसका ऐसा त्याग व सच्चा प्रेम देखकर भगवान मुसकराते हुए वचन फरमाने लगे ‘द्रौपदी ! तू कितनी नादान है, साधारण से जख्म के लिए हजारो की कीमत रखने वाली साड़ी को तूने व्यर्थ ही फाड़ दिया है। यह तनिक सा घाव था – साधारण चिकित्सा करवाने से ही ठिक हो जाता।’ भगवान के मुख से यह वचन श्रवण कर उसके नेत्र डबडबा आए। उस समय द्रौपदी सजल नेत्रों से बोली
।। शेअर ।।
लहू  इस हाथ से  टपके,  तो  चूल्हे  मे गई  साड़ी ।
फकत इक बूँद पर कुरबाँ, करूँ लाखो नई साड़ी ।।
अगर  फाहे को  हो दरकार, प्यारे  खाल गर्दन दी ।
तो हाजिर है यदि किस्मत खोलिये, फिलहाल गर्दन की ।।
      द्रौपदी के इन प्रेम-सने वचनो को सुन भगवान प्रसन्नता से गदगद हो उठे और उन्होंने अनुग्रह भरी चितवन उस पर डालते हुए ये वचन उच्चारण किए
भाव सच्चा काम मरहम से भी ज्यादा कर गया ।
जख्म क्या, दिल भी मेरा तेरे वचन से भर गया।।
है मेरी बस नजर  श्रद्धा प्रेम  पर और मान पर ।
कम है इस धज्जी से जो मै थान चुन दूँ थान पर ।।
रीझ जाता है फकत दिल प्रेम के इक पान पर ।
भाव बिन थूकूं नही,  गाड़ी भरे सामान पर ।।
       अन्त में भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी ने द्रौपदी को एक साड़ी के बदले कई साडियाँ प्रदान की जिससे सर्वसाधारण परिचित ही है। इसीप्रकार जो मनुष्य यथाशक्ति एवं सच्ची श्रद्धा-भावना से पत्र-पुष्प लेकर सन्त सत्पुरूषो की शरण में जाते है तो वे भी ऐसे अनन्य प्रेमियो को अपने दिव्य प्रेम व भक्ति से समृद्ध कर लोक-परलोक मे उनके सहायक बनते है।

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