दुर्वासा ऋषि के पीछे पड़ा सुदर्शन चक्र

      आज मै आपको ‘भक्त अम्बरीष’ का दृष्टान्त सुनाता हुँ जो ऐतिहासिक, रूचिकर व शिक्षाप्रद है। लीजिये सुनिये –
      राजा शर्याती एक बड़े राजा हुए है। उनके वंश में राजा अम्बरीष भगवान के बड़े प्रसिद्ध भक्त हुए है जिन पर कि दुर्वासा जैसे महा तपस्वी ऋषि का शाप भी कुछ प्रभाव न डाल सका अपितु दुर्वासा ऋषि को लज्जित होकर अन्त मे परम भक्त अम्बरीष के आगे नत-मस्तक होना पड़ा और अपने प्राणो की रक्षा के लिए अम्बरीष से सहायता लेनी पड़ी। वह घटना इस प्रकार है –

      राजा अम्बरीष श्री भगवान के अनन्य भक्त हो चुके हो। यह इन्द्रियो के सुखोपभोग को छोड़कर सदैव भगवान के चरणो मे ध्यान लगाये राज्य का कार्य व्यवहार करते थे। उनकी यज्ञशाला मे देवता लोग अपना-अपना भाग लेने के लिए स्वयं आया करते थे। राजा अम्बरीष राज-काज करते हुए भी माया से व सांसारिक झंझटों से निर्लिप्त रहते थे तथा सुख दुःख को स्वप्नमात्र समझते थे। इसलिए अपने अनन्य भक्त के शरीर व उसके शासन की रक्षा स्वयं भगवान अपने सुदर्शन चक्र द्वारा किया करते थे।
      राजा अम्बरोष की भाँति इनकी धर्म-पत्नी भी साधू-सेविका और ईश्वर परायणा थी। दोनों स्त्री-पुरूष संसारी ऐश्वर्य-भोगो से उपराम रहा करते थे। इन्होने अपने जीवन मे यह नियम बना रखा था कि प्रत्येक एकादशी को निर्जल व्रत रख कर द्वादशी के दिन बहुत-सा दान-पुण्य करके साधुओ व ब्राह्मणो को भोजन कराकर व्रत खोलते थे।
      एक बार ऐसा हुआ की एकादशी के दूसरे दिन केवल दो घड़ी द्वादशी बाकी ऱह गई थी। प्रातःकाल ही दुर्वासा ऋषि अत्यधिक सख्यां मे ऋषियो को साथ लेकर राजा अम्बरीष के पास आये तथा इनकी परीक्षा लेने के विचार से इनके आगे भोजन करने की इच्छा प्रकट की। तब राजा ने कहा – “मुनिदेव ! भोजन तैयार है आप स्वीकार करे।” इधर दुर्वासा ऋषि जी ने तो मन मे उनकी परीक्षा लेने की ठान रखी थी। प्रत्यक्ष में राजा से कहने लगे की “राजन ! पहले हम स्नानादि कर आवे तब आकर भोजन करेगे।”
      ऐसा कहकर दुर्वासा जी अपने साथियो सहित नदी की ओर स्नान करने के लिए चले गये तथा जानबूझ कर स्नान करने मे विलम्ब करने लगे ताकि द्वादशी बीत जाये। इधर भक्त अम्बरीष ने प्रतीक्षा करते हुए जब देखा कि द्वादशी बीत जाने वाली है तब उस समय जो ब्राह्मण-समाज वहाँ पर उपस्थित था उनसे भक्त अम्बरीष जी ने पूछा कि “ऋषि महाराज जी तो अभी तक स्नान करके नही लौटे है और अब द्वादशी का समय भी बीता जा रहा है, अस्तु ! आप मुझे व्रत खोलने के विषय मे उचित परामर्श देवे।”
      तब उन ब्राह्मणो ने कहा – “आप भगवान का चरणामृत लेकर व्रत खोल लीजिये क्योकि यह भोजन की गणना मे नही आता।” राजा अम्बरीष ने ब्राह्मणो के कथनानुसार वैसा ही किया। इतने मे द्वादशी का समय भी बीत गया।
      द्वादशी बीत जाने पर दुर्वासा ऋषि जी भी नदी से लौट आये। उन्हें आया देख राज़ा ने उनसे भोजन करने के लिए हाथ जोड़ कर विनय की तब दुर्वासा जी ने पूछा, ‘राजन ! द्वादशी तो बीत गई है, तुमने व्रत खोला है या नही ?’ तब राजा ने प्रार्थना की – ‘महाराज ! मैने ब्राह्मण-मण्डली से आज्ञा लेकर द्वादशी मे श्री भगवान का चरणामृत पान किया है इसके अतिरिक्त अभी कुछ नही खाया। इतना सुनते ही दुर्वासा जी अति क्रोधित हुए और उन्होने कहा कि तुमने द्वादशी मे भोजन का निमन्त्रण देकर हमें भोजन कराये बिना ही पहले क्यों व्रत तोड़ दिया ?’ यह कहकर दुर्वासा ऋषि ने अपनी जटाओ मे से एक बाल उखाड़ कर पृथ्वी पर दे मारा जिससे एक शक्ति (स्त्री रुप कृत्या) वही उपस्थित हो गई। हाथ मे शस्त्र लिये हुए राजा अम्बरीष को मारने के लिए उसके पीछे दौड़ी।
      भक्त राजा अम्बरोष को ऋषि ने निरपराध ही मारना चाहा था इसलिए यह अन्याय भगवान अपने भक्त के प्रति होता देख सहन न कर सके। जिस प्रकार कि रामायण मे भी ब्रहस्पति जी इन्द्र को समझाते हुए कहते है कि ‘हे सुरेश ! तुम भरत जी से ईर्ष्या मत करो क्योकि वह तो प्रेम के समुन्द्र है और भगवान प्रेमी के वशीभूत होते है। भगवान तो अपने भक्त का अनिष्ट कभी नही देख सकते अपितु जो उनके प्रिय अनन्य भक्त को अकारण कष्ट पहुँचाता है तो वह भगवान को क्रोध रूपी अग्नि मे स्वयं ही भस्म हो जाता है।’ जैसे कहा है –
।। चौपाई ।।
      सो दुर्वासा जी के इस कृत्य को देखकर अन्तर्यामी भगवान विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा प्रदान की कि”तुम जाकर राजा अम्बरोष की रक्षा करो किससे उनको किसी प्रकार का कष्ट न पहुँचे। ” भगवान का आदेश पाते ही उसी समय वहाँ पर सुदर्शन चक्र प्रकट हो गया तथा उसके अपरिमित दिव्य तेज से वह कृत्या तो वही पर ही भस्म हो गई। इसके बाद सुदर्शन चक्र ने दुर्वासा ऋषि को समाप्त करना चाहा। चक्र को अपनी और बढता देख दुर्वासा जी अपने प्राण बचाने हेतु भाग खडे हुए परन्तु सुदर्शन चक्र उनका पीछा किये जा रहा था।
      दुर्वासा जी वरूण, कुबेर, इन्द्र आदि सभी देवताओ की शरण में गये परन्तु सब इस कार्य में अपनी असमर्थता प्रकट कर रहे थे। किस मे यह साहस था कि भगवान विष्णु के भेजे हुए सुदर्शन चक्र से बचा सके। अन्ततः वहाँ से निराश होकर ऋषि जी ब्रह्म-लोक मे गए परन्तु वहाँ भी उनकी सहायता न हो सकी। पुनः भगवान शिवजी की शरण मे गए ओर अपनी प्राण-रक्षा के लिए विनय की। तब शिवजी ऋषि जी को समझाने लगे की –
।। चौपाई ।।
शिव कह निकरहु निकरहु इत ते ।
       जाओ जाओ आये मुनि जित ते ।।
रक्षा  करन  मोर  गति  नाही ।
         साधु विरोध कुशल कहु नाही ।।
यह कैलाश भस्म हवै जै हो ।
        गणन सहित मोहि चक्र जरै हो ।।
तब मुनि कह्मो बहुरि सिर नाई ।
         नहि  रक्षहु  तो  करहु  उपाई ।।
कह्यो  शम्भु  बैकुण्ठहि  जाहु ।
          रक्षण करी रमा कर नाहु ।।
शम्भु वचन सुनि डरियो मुनीषा ।
      पयो बैकुण्ठ जहाँ जगदोशा ।।
गिरयो पाहि करि  चरनन मूला ।
        होहु नाथ मो पर अनुकूला ।।
      सरलार्थ – शिवजी ने कहा हे मुनिदेव ! आप जहाँ से आए है, कृपा करके उसी ओर ही प्रस्थान कर जाइये क्योकि साधु द्रोहियो की मै रक्षा नही कर सकता। इसमे मै असमर्थ हूँ। चक्र का अतुलित तेज मुझे कैलाश व गुणो सहित भस्म कर देगा। त्रिपुरारी के मुख से ऐसे वचन सुनकर दुर्वासा जी बहुत भयभीत हुए और पुनः महादेव जी के कदमो पर झुक कर विनय करने लगे कि यदि आप मेरी रक्षा करने में असमर्थ है तो कोई अन्य उपाय ही बतला दीजिये। उस समय शिवजी ने कहा कि तुम बैकुण्ठ को जाओ वहां तुम्हारी रक्षा करने में लक्ष्मीपति ही समर्थ है। इसके अतिरिक्त शिवजी ने दुर्वासा ऋषि को भक्ति व प्रेम रस के विषय मे और भी अत्यधिक ज्ञान दिया कि सन्तजनो का अपयश करने वालो का कभी कल्याण नही होता। तुमने जो अपनी रक्षा का उपाय पूछा है तो तुम्हारी रक्षा का एकमात्र यही साधन है कि तुम अब विष्णु भगवान की शरण मे चले जाओ तब तो बच सकोगे अन्यथा नही।
      यह सुनकर दुर्वासा जी डरते-डरते वहाँ पहुँचे जहां पर कि विष्णु भगवान जी विराजमान थे। जाते ही उनके चरणो पर गिर पड़े और विनय की – “ऐ नाथ ! मुझ पर कृपा कर मेरी रक्षा किजिये। इसके पश्चात उन्होने प्रभु की स्तुति की और अपने अपराध के लिए क्षमा याचना की तथा भगवान से प्राणदान माँगा। तिस पर श्री विष्णु भगवान जी ने कहा कि “हे मुनिदेव ! हम तीन लोक के मालिक है और समस्त सृष्टि के अधिपति कहलाते है। इतना कुछ होने पर भी हमारा अपने भक्त पर कुछ वश नही चलता। कारण, हम स्वयं भक्तो के वशीभूत रहते है। हमे अपने भक्त इतने प्रिय है कि उनकी अपेक्षा मे हम लक्ष्मी, बैकुण्ठ और स्वयं को भी कुछ महत्तव नही देते बल्कि स्वयं हम उनके वश मे रहते है क्योकि भक्तजन सब वासनाओ का त्यागकर हमारे ही चरणो का ध्यान करते है तथा हमारी ही मन, वचन, कर्म से शरणागति मे रहते है इसालिए शरणागत की हमे लाज रखनी पड़ती है। इसी कारण उनके वचन को टालने का हमे लेश-मात्र भी दुःख नही है परन्तु भक्त को असत्यवादी सिद्ध करना, वह हम से नही हो सकता। प्रभु-भक्त सदैव दयालु होते है उन्होने क्रोध को अपने वश मे किया होता है। वह सवप्न मे भी किसी का अहित नही सोचते।

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      इस समय यदि राजा अम्बरीष तुम्हारे इस कार्य को देख कर अन्तःकरण से क्रोध करते तो तुमने उसी समय ही, उसी स्थान पर जल कर भस्म हो जाना था फिर यहाँ तक तो तुम्हारा पहुँचना भी असम्भव हो जाता। अब भी तुम भक्त अम्बरीष की शरण मे जाओ वही तुम्हारी रक्षा करेगे। इस सम्बन्ध मे हम तुम्हारी सहायता नही कर सकते।”
      भगवान के ऐसे मधुर वचन सुनकर दुर्वासा जी के मन मे भक्ति के प्रति श्रद्धा पैदा हुई और वहाँ से लज्जित होकर राजा अम्बरीष की शरण में आए तथा दण्डवत वन्दना कर दीन भाव से खड़े हो गए। इधर भक्त अम्बरीष जी दुर्वासा जी को दुःखी होता देख व्याकुल हो गए और दिल मे कहने लगे – मेरे कारण ही ऋषि जी को अकारण कष्ट उठाना पड़ा। ऋषि की दशा से द्रवित होकर अम्बरीष जी ने सुदर्शन चक्र की स्तुति की एवं क्षमा माँगी और चक्र को रोक कर कहा कि “मुझसे इन ऋषि जी का दुःख देखा नही जाता। इस समय तक यदि मैने कोई शुभ कर्म किया है तो इस का फल मुझे यह मिले कि दुर्वासा जी को कोई कष्ट न होने पावे।” भक्त अम्बरीष जी के इस प्रकार प्रार्थना करने पर सुदर्शन चक्र का तेज ठण्डा हो गया और तत्क्षण सुदर्शन चक्र वही अदृश्य हो गया।
      इतना कुछ होने पर भी भक्त अम्बरीष जी ने आँखे ऊंची नही उठाई और ऋषि जी के चरणो पर गिरकर विनम्र प्रार्थना करने लगे कि “ऐ मुनिदेव! भोजन तैयार है, स्वीकार किजिये।”  भक्त राजा अम्बरीष के अनुरोध करने पर दुर्वासा ऋषि व अन्य मण्डली ने भोजन किया। उसके पश्चात भक्तवर अम्बरीष जी ने भी प्रसाद पाया।
      कथाकारो का कहना है कि दुर्वासा ऋषि जी की इस भाग-दौड मे पूरा एक वर्ष व्यतीत हो गया था। उनकी प्रतीक्षा मे भक्त अम्बरीष जी भी उसी स्थान पर खड़े रहे तथा दुर्वासा जी के दुःख से दुःखी होकर भगवान के चरणो का ध्यान लगाये रहे। यही कारण था कि एक वर्ष बीतने पर भी भोजन ज्यों का त्यों गर्म रहा।
      भोजन पाकर दुर्वासा ऋषि जी बडे आनन्दित हुए और राजा अम्बरीष से बोले कि ‘हे राजन! मुझे आज तक भक्ति की महिमा का ज्ञान न था कि भगवान के भक्त ही संसार मे सबसे अधिक शक्तिशाली है और भक्ति का मार्ग ही सबसे उत्तम व श्रेष्ठ है। आप धन्य है कि मुझ अपराधी के लिए एक ही स्थान पर एक वर्ष तक खड़े रह कर मेरी चिन्ता करते रहे तथा मुझे सुदर्शन चक्र से भी बचाया। अब मुझ मे इतनी सामर्थ नही की मै भगवान के भक्तो का तथा आपका गुणानुवाद गा सकूँ।
      दुर्वासा जी के विदा होने पर सब उपस्थित मण्डली ने भक्त अम्बरीष की अत्यधिक प्रशंसा की। उत्तर मे राजा अम्बरीष ने अपने दीन प्रकट किया तथा इस कृत्य को भगवान की महिमा व कृपा का फल दर्शाया।
      कैसा है यह शिक्षाप्रद प्रमाण कि भगवान की अनन्य कृपा होने पर भी राजा अम्बरीष के मन मे तनिक मात्र भी अभिमान न था और भक्ति रस की तुलना मे वे इन्द्रलोक के सुख को भी तुच्छ समझते थे। भगवान के भक्त कितने दयालु होते है। उनके दिल में किसी के प्रति ईर्ष्या व द्वेष की भावना नही होती। वह अपने शत्रु को भी दुखी नही देखना चाहते।
      ‘यह है भक्ति की महिमा का वर्णन और भगवान ने भक्तो के श्रेष्ठ होने का ज्वलंत प्रमाण।’

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