दिव्य ज्योति कथा

      बृह्मनिष्ठ, तत्ववेत्ता, पूज्यपाद श्री परमंहस दयाल श्री श्री 108 श्री स्वामी अद्वैतानन्द जी महाराज श्री प्रथम पादशाही जी के परम पावन श्री चरणारविन्दो मे दासानुदास का श्रद्धा एवं निष्ठासहित कोटि-कोटि दण्डवत प्रणाम है।
      एक दिन आपने श्री वचन फरमाये कि नेक कमाई बहुत फलती-फूलती है। एक कथा है कि मारवाड़ के किसी गाँव मे एक पठान और एक ब्राह्मण आपस मे अच्छे मित्र थे। खर्च आदि की तंगी से दुखी होकर रोजगार की खोज मे दोनों ही दिल्ली चले गये। पठान ने तो शाही बावर्चीखाने (राजकीय भोजनालय) मे नौकरी कर ली, जहाँ वेतन के अतिरिक्त कुछ ऊपर से भी पुरस्कार आदि के रूप मे आय हो जाती थी। इसलिए वह पठान थोडे ही समय में खूब मोटा-ताजा भी हो गया और उसने कुछ धन भी जोड़ लिया।
      ब्राहमण बेचारा किसी धर्मात्मा मंत्री के यहाँ खाना पकाने की नौकरी पर लग गया। मंत्री महोदय कुछ दस्तकारी करते थे ओर उससे जो कुछ कमाते, उस पर ही उनकी रसोई चलती थी। इस कारण उनकी रसोई मे केवल एक प्रकार की ही दाल-रोटी बना करती थी। ब्राहमण को वेतन भी हर महीने नही मिल पाता था तथा भोजन भी स्वास्थयप्रद नही था, इसलिए वह दुबला-पतला हो गया।
      जब कभी दोनों मित्र आपस में मिलते, तो पठान उस ब्रहमण से मजाक करता कि तुमने कैसे कंजूस के यहाँ नौकरी कर ली है, क्या तुम्हे और कही अच्छी जगह पर नौकरी नही मिलती? यह सुनकर ब्रहमण चुप हो जाता। लेकिन अपने दिल मे वह ब्राहमण उस धर्मात्मा मंत्री की नौकरी मे कुछ ऐसी शान्ति का अनुभव करता था, जो उसे सन्तुष्ट बनाये रखती थी।
      पठान ने जब खूब धन एकत्र कर लिया, तो वहाँ से अवकाश लेकर अपने घर जाने का विचार किया। यात्रा की तिथि निरिचत करके ब्रहमण को भी सूचना दी कि यदि तुम्हारा विचार हो, तो मेरे साथ चलो।
      ब्रह्ममण ने मंत्री महोदय से विदा माँगी, परन्तु उन्होंने स्वीकार न किया। जब चलने का दिन आया, तो ब्रहमण ने मंत्री महोदय से विनती की कि हुजूर! मेरा एक मित्र घर जा रहा है, यदि आज्ञा हो, तो बच्चो के लिये कुछ भेज दूँ।
      मंत्री ने अपनी जेब में हाथ डाला, तो संयोग से दो ही पैसे मिले। उसने वही दो पैसे निकालकर ब्रहमण को दे दिये। बेचारा गरीब ब्राहमण मालिक से क्या कह सकता था।
      ‘कहरे-दरवेश बर जान दरवेश’ अर्थात फकीर का क्रोध अपनी जान पर ही होता है। वह ब्राहमण भी अपना क्रोध और किस पर निकालता? दो पैसे लेकर चुप हो रहा। फिर सोचा कि जाकर मित्र से मिल लू। बाजार से गुजर रहा था कि अनार बिकते दिखाई दिए। दिल मे ख्याल आया कि मारवाड़ मे अनार बिल्कुल नही होते, अतः यही भेज देने चाहिए। दो पैसे से 10-12 अनार मिल गये। वह ले जाकर उसने अपने मित्र को दे दिये और सब किस्सा उसे सुना दिया।
      पठान यात्रा करते-करते मारवाड़ पहुंचा, तो किसी बड़े नगर मे रात्रि को ठहरा। वहाँ सराय मे चोरो ने उसका सब धन लूट लिया। अनार एक कपड़े मे बँधे हुए खूँटी पर टंगे हुए थे, उन पर किसी की दृष्टि न पड़ी। बेचारा सुबह उठा, तो अपना धन-माल न पाकर अत्यन्त दुःखी हुआ कि अब क्या करे और किस प्रकार घर पहुँचे?
      संयोग की बात कि उस नगर के एक बड़े धनवान सेठ का इकलौता पुत्र अत्यधिक बीमार था और किसी भयानक रोग से अति पीड़ित था। हकीम ने बतलाया कि यदि इसको अनार के दाने तुरन्त खिलाये जाए, तो इसके जीवन की आशा है, अन्यथा नही। सेठ ने नगर मे घोषणा करवा दी कि जो कोई व्यक्ति अनार लाकर देगा, उसे बहुत कुछ रूपया दिया जायेगा। पठान ने इस अवसर को गनीमत समझा और तुरन्त वे अनार ले जाकर सेठ को दे दिये। जब वह अनार उस लड़के को खिलाए गये, तो मालिक की मौज से वह स्वस्थ हो गया। उस सेठ ने उन अनारो के बदले मे उस पठान को बहुत सा धन दिया। उन रूपयो मे से कुछ रूपये खर्च करते हुए वह पठान अपने घर पहुंचा। जितना धन शेष बचा था, वह सब ब्राह्मण के घरवालो को दे दिया। मार्ग की कठिनाइयो व धन प्राप्ति का सब हाल लिखकर दिल्ली मे ब्राह्मण के पास भेज दिया और यह भी लिख दिया कि अब तुमको नौकरी करने की आवश्यकता नही है। पर्याप्त धन मिल गया है, घर वापस चले आओ।
      उस ब्राह्मण ने सारी बात मंत्री महोदय को बतलकर विनती की कि वो दो पैसे आपने कैसे दिए थे कि जिनके बदले इतना धन प्राप्त हो गया?
      उन्होने उत्तर दिया कि मै शाही खजाने (राजकोष) के रूपये-पैसे को अपने घरेलु उपयोग मे बिल्कुल नही लाता, अपने परिश्रम और दस्तकारी से जो पैसा बनता है, उसी से काम चलाता हुँ। तुमने बहुत ही ईमानदारी से मेरे यहाँ काम किया था, इसलिए मै नही चाहता था कि शाही खजाने से तुमको वेतन दिया जाए। सो मैने अपनी मेहनत की कमाई मे से ही दो पैसे दिए थे। परन्तु मै इस बात को भी जानता था कि ये दो पैसे तुम्हारे पूरे जीवन के लिये पर्याप्त होगे। अब यदि तुम घर जाना चाहो, तो बडी प्रसन्नता से जा सकते हो।
      ब्राह्मण उनसे विदा लेकर जब घर आया, तो पठान ने उस रूपये के लिए जो यात्रा मे उसने खर्च किये थे, क्षमा माँगी। ब्राह्मण ने कहा कि जो कुछ रूपया तुम वसूल करके लाये हो, उसमे से तुम आधे भाग का अधिकार रखते हो, क्योकि यदि तुम किसी प्रकार की ख्यानत करते, तो मुझे क्या मालूम हो सकता था? वास्तव मे उन दो पैसों मे से, जो मेरे वेतन मे मुझे मिले है, केवल एक पैसा ही मेरी आयु के लिए काफी होगा;  शेष एक पैसा तुम अपने काम मे लाओ।
      इस प्रकार वे दोनो उसी दिन से नेक कमाई करके जीवन सकल करने लगे।

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