दानवीर कर्ण ने बोला गुरू से झूठ

      द्रोह या छल-कपट करना तो किसी के भी साथ अच्छा नही फिर यदि जिससे गुण ग्रहण किया जाए अथवा शिक्षा प्राप्त की जाये उसी के साथ छल-कपट करना या झूठ बोलना – ये अनीति है। जैसे कहा भी है कि ‘आचार्य देवो भव’ अर्थात विद्या-गुरू को भी ईश्वर के समान पूजना चाहिये। दूसरा विशेषकर भक्ति मार्ग मे तो अपने इष्टदेव सन्त सदगुरू के साथ शिष्य को असत्य एवं छल-कपट से रहित होकर प्रेम व सच्चाई का व्यवहार करना चाहिए।
      जैसे कि सन्त सहजोबाई जी कथन करती है –

।। दोहा ।।
      अर्थात शिष्य का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपने इष्टदेव अन्तर्यामी सदगुरू से असत्य न कहकर अच्छी या बुरी जो भी बात हो अक्षरक्षः सत्य सत्य कह देनी चाहिये, क्योकि सदगुरू जीव के हितैषी होते है। उनसे ही यदि जीव अपने अवगुण छिपाये तो फिर उसका कल्याण कौन करेगा?


      इसी पर एक दृष्टान्त यहाँ दिया जा रहा है –




      द्वापर युग मे कौरव-पाण्डवो की आपस मे जब पटती नही थी तब कौरव दल के हदय मे ईर्ष्या के बीज अकुरित (पैदा) होने लगे जिससे वे भीतर ही भीतर पांडवो से युद्ध करने की तैयारियो मे जुट गये। अर्जुन तो उन्हे काँटे की तरह चुभता था क्योकि द्रोणाचार्य जी ने अर्जुन को शस्त्र-विद्या में अच्छी तरह से पारंगत (होशियार) किया था। अर्जन के इस शस्त्र-विद्या-कोशल को देखकर कौरव ईर्ष्या व घृणा की अग्नि से अहर्निश सुलगते रहते थे। कौरव दल मे उसके समान शस्त्र-विद्या मे अन्य कोई भी प्रवीण न था। अतः उन्होंने वीर कर्ण को श्री परशुराम जी से धनुर्विद्या सीखने के लिए प्रेरित किया जिसके बल से वे पाण्डवो को पराजित कर अपनी ईर्ष्याग्नि को शान्त कर सके।
      श्री परशुराम जी ब्राह्मण थे, वे धुनर्विद्या अच्छी से जानते थे। पहले तो वे सभी वर्णो को धनुर्विद्या सिखाया करते थे किन्तु एक बार किसी क्षत्रिय द्वारा इनका अपमान हो जाने से विक्षुब्ध होकर उन्होने यह प्रण किया था कि मै किसी भी क्षत्रिय को शस्त्र विद्या न सिखाऊँगा। इस बात से सभी परिचित थे कि श्री परशुराम जी क्षत्रिय वशं को शस्त्र-विद्या तो सिखाने से रहे; फिर भी वीर कर्ण को शिक्षा ग्रहण तो करनी ही थी। अतः उसने ब्राह्मण का वेष बनाया और श्री परशुराम जी के द्वार पर जा उपस्थित हुआ। जब वीर कर्ण श्री परशुराम जी के पास पहुँचा और उसने शस्त्र-विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की, तब श्री परशुराम जी ने उससे उसका वर्ण व नाम पूछा। वीर कर्ण ने अपना नाम एवं वर्ण बदलकर अपने को एक ब्रह्ममण परिवार का सदस्य बताया। ब्राह्मण कुल मे उत्पन्न जान तथा वीरो के से आकार प्रकार को देख परशुराम जी ने उसको विद्या देना स्वीकार कर लिया। अब वीर कर्ण श्री परशुराम जी के पास रह कर धनुर्विद्या सीखने लगा। वह अत्यन्त श्रद्धा भाव से उनकी सेवा करता था परन्तु उसके दिल मे हर समय यह शंका घर किये रहती – कही गुरूदेव को मेरी वास्तविकता का पता न लग जाये कि मै क्षत्रिय वंश का हूँ।
      श्री परशुराम जी ने तो उसके कथन पर विश्वास कर लिया था और समझ लिया था कि वास्तव मे यह द्विज वर्ण का ही है। हार्दिक भावना से उसे धनुर्विद्या सिखाते रहे और वीर कर्ण जब अच्छी तरह से निपुण हो गया।
तब एक बार का वृत्तान्त है कि श्री परशुराम जी को कही अन्य स्थान पर जाना था। उस समय वह अपने साथ वीर कर्ण को भी ले गये। यात्रा करते-करते दोपहर होने आई। तब वह जंगल मे एक सघन वृक्ष की छाया मे विश्राम करने के लिए रूक गये। कर्ण ने अपनी चादर श्री परशुराम जी के नीचे बिछा दी। भोजन करने के पश्चात परशुराम जी को जब नींद आने लगी तब उन्होंने वीर कर्ण से कहा कि ‘सिर के नीचे रखने के लिए एक पत्थर तो ले आओ।’
      तब वीर कर्ण ने विनय की कि ‘गुरूदेव ! आप मेरी जांघ पर सिर रख कर विश्राम कर लीजिये।’ श्री परशुराम जी ने अपनी स्वीकृति दे दी और विश्राम मे हो गये। गहरी निद्रा के आने पर एक भयंकर ‘दन्दशूक’ नाम का कीट उधर आया और उसने कर्ण का पांव में जोर से काट लिया। वह डंक इतना प्रचण्ड था कि खून की धारा बह निकली। तब वीर कर्ण ने दिल मे सोचा कि यदि मै अपने पांव को हिलाता हूँ तो गुरू जी के आराम मे बाधा पहुँचेगी। अतः वह पीड़ा को अगाध धैर्य से सहन करता हुआ पूर्ववत स्थिर बैठा रहा।

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      कुछ देर बाद जब परशुराम जी की आँख खुली तो क्या देखा कि कर्ण का पांव खून से लथपथ हुआ पड़ा है। उन्होने पूछ लिया कि ‘यह क्या हुआ?’ तब कर्ण ने कहा – ‘भगवन ! कुछ नही, एक कीड़े ने काट लिया है, मैने आपको सोया जान अपनी जाँघ को हिलाना उचित न समझा।’ यह बात सुनकर श्री परशुराम जी ने कहा कि ‘एक बात पूछू ! सच-सच बताना कि तुम वस्तुतः कौन हो? तुम ब्रह्मण नही हो क्योकि ब्राह्मण तो इतने भीषण दंशन को सहन नही कर सकता। तुम्हारे पांव से इतना अधिक रक्त की धारा बह रही है परन्तु तुमने चूँ तक न की। इस अगाध धैर्य को देख कर मुझे तो तुम क्षत्रिय वंश के ही प्रतीत हो हे हो।’
      यह सुनकर कर्ण तो मानो साँप सूँघ गया और विवश होकर उसे अपना वास्तविक परिचय देना पड़ा कि ‘गुरूदेव! मै कुरू-कुल मै उत्पन्न कर्ण हूँ – क्षत्रिय मेरा वर्ण है। शस्त्र विद्या सीखने के स्वार्थ से ही मैने आपके समक्ष असत्य बोला है क्योकि आपके इस प्रण को मै सुन चुका था कि ‘मै क्षत्रियो से समस्त भूमण्डल को खाली कर दूंगा।’ इसलिये मैने अपने वर्ण व नाम को आपसे गुप्त रखा।
      इस पर श्री परशुराम जी ने कहा कि ‘तुमने मुझे गुरु कह कर मेरे साथ धोखा किया है। गुरू से छल-कपट करने वाले शिष्य का कभी भला नही होता। यह विद्या जो कि तुमने मेरे यहां से पाई है तुम्हारे किसी काम न आयेगी।’ यह कहकर उसी समय परशुराम जी ने कर्ण को विदा कर दिया और साथ ही अपनी तरफ से सेवा के फलस्वरूप पाँच बाण दे दिये जिससे कि बडे-बड़े शत्रुओ को मारा जा सकता था।
      आचार्य का वचन किसी भी दशा मे टल नही सकता था चाहे कुछ भी हो जाए। वीर कर्ण का भी यही हाल हुआ उसे इस धनुर्विद्या व गुरू द्वारा दिये गये बाणो से कुछ लाभ न प्राप्त हुआ। कारण, कि महाभारत का युद्ध शुरू होने से पूर्व ही माता कुन्ती ने वे पाँच बाण भिक्षा मे मांग लिये। परिणाम यह हुआ कि अर्जुन और वीर कर्ण के युद्ध मे कर्ण अर्जुन द्वारा उन्ही बाणो से मारा गया।
      इस दृष्टान्त का भाव यह है कि जीव को गुरूदेव के साथ कभी भी छल-कपट नही करना चाहिये। सतगुरू तो साक्षात भगवान का स्वरूप होते है। वे ही तो केवल जीवो के परम हितैषी होते है। उनसे जीव की आन्तरिक अवस्था क्या छिपी होती है। वही जिज्ञासु सतगुरू की प्रसन्नता प्राप्त कर सकता है जो कि मन-वचन-कर्म से सदगुरू के आगे किसी भी प्रकार का दुराव नही रखता तथा निश्छल रहकर उनके वचनानुसार जीवन यापन करता है। वह ही सदगुरू के मंगलमय आशीर्वादों का अधिकारी बन अपना जीवन सफल कर सकता है।

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