तृष्णा पिशाचिनी है

      सन्त महापुरूष कथन करते है कि तृष्णा ऐसी बुरी बला है कि इसे जितना तृप्त किया जाये यह घटने की अपेक्षा उतना उग्र रूप धारण कर लेती है। जिस प्रकार अग्नि मे घी की आहुति डालने से आग की लपेटे आकाश को छूने लगती है, इसी प्रकार तृष्णा जीव के मन मे लालच की अग्नि को ऐसा तपाती है कि उसे अपने अच्छे बुरे का ज्ञान ही नही रहता तथा अन्त में दुःख के सिवाय कुछ हाथ नही लगता।

जैसा की इस दृष्टान्त से स्पष्ट होता है –
       प्राचीन काल मे एक बादशा।ह को स्वर्ण संचित करने मे प्रगाढ़ रूचि थी। इसालिए उसने इसकी प्राप्ति के लिए कठिन तपस्या की। वह हर समय परमात्मा से यह प्रार्थना किया करता कि – हे प्रभु! तुम मुझ पर ऐसी दया करो, ऐसी शक्ति प्रदान करो कि मेरे शरीर से जिस वस्तु का भी स्पर्श हो जाये वह स्वर्ण ही बन जाये, तब मेरे समान भाग्यशाली इस सृष्टि मे कोई न होगा। यही उसका हर समय पूजा, सुमिरण व आराधना थी। 
      दृढ़ संकल्प से कोई भी कार्य किया जाये वह अवश्य पूर्ण होता है चाहे उसका परिणाम कुछ भी हो। इसी प्रकार राजा द्वारा कि गई घोर तपस्या व हदय से निकली हुई पुकार भी अब अपना फल दिखाने आई। क्योकि यह तो कुदरत का नियम है कि मनुष्य दत्तचित्त होकर जिस कार्य की और भी प्रवृत्त हो जाता है तो ईश्वर उसकी कामना अवश्य पूर्ण करने का वैसा ही साधन प्रस्तुत भी कर देता है। सो बादशाह के हदय से की गई पुकार भगवान के चरणों में पहुँची। एक दिन वह कमरे मे बैठा यह सोच ही रहा था कि सहसा उस कमरे की खिड़की खुली और खिड़की मे से एक देवदूत (फरिश्ते) ने प्रवेश किया। उसने बादशाह को यह हर्ष भरा समाचार सुनाया कि – बादशाह सलामत! आपके द्वारा की गई प्रार्थना मालिक के चरणो मे स्वीकृत हो गई है। कल प्रातः से तुम जिस वस्तु को भी छू लेगे वह स्वर्ण बन जायेगी। यह सूचना पाकर बादशाह प्रसन्नता से बल्लियों उछलने लगा और इस खुशी मे उसे रात्रि व्यतीत करनी भी दुष्कर कठिन हो गई। वह प्रातः होने की घडियाँ गिनने लगा क्योकि सोना बनाने का कार्य तो दूसरे दिन प्रातः काल से शुरू होना था।   
      सो रात्रि तो जैसे तैसे व्यतीत हुई। प्रभात हुई बादशाह उठा और महल के समस्त सामान-दीवारे, दरवाजे, खिड़कियाँ, मेंज-कुर्सी आदि जिस पर भी दृष्टि पड़ी सबको हाथ लगाता गया और वे सोने की बनती गई। बादशाह यह देख फूला न समाया। इसके बाद वह फूलवाड़ी मे पहुँचा। उसने उद्यान के सब सामान, सब वृक्षो को छू डाला। वृक्षो की डालियाँ, पत्ते सब कुछ स्वर्ण हो गया। उसका यह विचार था कि सम्पूर्ण नगर व उसके सामान सब कुछ सोने का बना दूँगा। रावण की सोने की लंका थी – मेरा शहर भी सोने का बन जायेगा। फिर दुनिया मुझे भी याद रखेगी। परन्तु अज्ञानवश उसे यह न सूझा कि क्षणिक उल्लास के पीछे अपार दुःख भी छिपा है।
        जब महल व उद्यान को स्वर्णमय बना चुका था तब तक बादशाह का नाश्ते करने का समय हो चुका था। इसलिए वह मेज के पास कुर्सी पर आ बैठा। आज्ञा देने पर विविध व्यंजनो से भरी हुई थाली इसके सामने आई। जब इसने रोटी का कोर तोड़ना चाहा तो रोटी सोने की बन गई। मक्खन को हाथ लगाया तो वह भी सोने का बन गया। दूध को छुआ तो उसकी भी वही दशा हुई। मिठाई, फल जिस चीज को भी स्पर्श करता वह सोना बन जाती। अब तो बादशाह को लेने के देने पड़ गये। आखिर भूख से परेशान हो चमचे से कुछ सब्जी जल्दी ही मुँह मे डाली और शीघ्र ही निगलना चाहा तो वह गले मे ही सोने का ढ़ेर बनकर गले मे फँस गई। अब तो बादशाह को अपनी मृत्यु आँखो के समक्ष नाचती हुई नजर आई। बड़ी कठिनाई से उसने सोने के ढ़ेर को गले से बाहर निकाला परन्तु गला अत्यधिक जख्मी हो गया तथा मुँह व वस्त्र खून से तर हो गए। अब तो बादशाह अत्यन्त दुःखी होकर माथे पर हाथ रखकर रोने लगा।
      इधर सारे नगर मे यह धूम मच गई कि बादशाह सलामत जिस वस्तु को भी स्पर्श करते है वह कंचन रूप ही हो जाती है। यह सुनकर सब लोग बादशाह को मुबारिक देने आये परन्तु यहां आकर क्या देखा कि बादशाह तो अपने किये पर पछात रहे है। अब तो वह बधाई लेने की अपेक्षा सबको अपनी दुःख भरी गाथा सुनाने लगा व साथ मे रोने भी लगा। यह सुनकर समस्त सम्बन्धी दूर-दूर बैठे ही बादशाह से ऐसी घृणा करने लगे कि मानो वह क्षय रोगी हो क्योकि इस बात का सबको ज्ञान हो चुका था कि बादशाह जड़ अथवा चेतन जिसको भी हाथ लगा दे वह सोने की बन जाती है। इसी कारण बादशाह के निकट कोई भी न जाता था। ऐसी स्थिति देख बादशाह सुबह-सुबक कर करूणा-क्रन्दन करने लगा।
      बादशाह की एक सुपुत्री थी जिससे वह बहुत प्यार करते थे। वह अबोध बालिका क्या जानती थी कि मेरे पिता जी को क्या दुख है। दूर से भागी-भागी आई और पिता की गोद मे जा बैठी। गोद मे बिठाने पर बादशाह का हाथ लगना ही था कि वह स्वर्ण-मूर्ति बन गई। अब तो बादशाह आठ-आठ आँसू बहाने लगा। यह सुन वहाँ पर दर्शको का समूह इस प्रकार इकटठा हो गया मानो वह बादशाह नही अपितु बाज़ीगर यानि मदारी हो।
      इस प्रकार दुःखी होकर बादशाह ने पुनः परमात्मा के चरणों में विनय कि – ऐ मालिक! मुझ अल्पज्ञ जीव के अपराधों को क्षमा करो। मुझे न सोना चाहिए और न उसको बनाने की शक्ति। आप दयालु है, मुझ पर कृपा करो। जब इस तरह करूणा-क्रन्दन करते हुए कुछ समय बीता तो फिर वही देवदूत प्रकट हुआ। बादशाह उसके पाँव पर गिरता हुआ आर्त्तनाद करता हुआ कहने लगा कि – आप मेरी प्यारी पुत्री को सजीव कर दिजिये। मुझे सोना आदि कुछ भी नही चाहिये।

      देवदूत ने पूछा – क्यो बादशाह सलामत! रोटी का एक ग्रास अच्छा है या सोने का महल! पानी का एक घूट श्रेष्ठ है अथवा सोने का ढ़ेर! तुझे अपनी जीवित पुत्री प्यारी लगती है या सोने की मूर्ति ?
      बादशाह ने अति विनम्रता व दिनता से विनय करते हुए कहा – महाराज आपके वचन सत्य है। परमात्मा द्वारा दिये हुए रोटी-पानी व सन्तान आदि ऐसे अनमोल पदार्थ है कि उनकी तुलना मे सोने-हीरे व जवहारात इत्यादि सब तुच्छ है। मै तो लोभ की अज्ञानता मे फँस कर नेत्र-हीन हो गया था। इसलिए आप मुझको वे ही पदार्थ देने की कृपा फरमाये। इस उपकार के लिए मै आपका सदैव ही कृतज्ञ बना रहुँगा।
      इस पर देवदूत ने पुनः कहा कि ‘बादशाह सलामत! अभी तो केवल पाँच-छः घण्टे ही हुए है, दो-तीन दिनो तक तो इस सोना बनाने के वरदान से लाभ उठा लो।’ बादशाह ने उत्तर दिया – न महाराज! मुझे तो अब एक मिनट के लिए भी यह शक्ति नही चाहिए और कृपा करके आप इस वरदान को मुझसे वापस ले लिजिए।’ बादशाह के बार बार आग्रह पूर्वक विनय करने पर देवदूत ने वह शक्ति वापस ले ली और कुछ मन्त्र पढ़कर उसकी लड़की को जीवित कर दिया। बादशाह अपनी लड़की को जीवित हुआ देख अत्यन्त प्रसन्न हुआ, तत्पश्चात उसने भोजन किया। बादशाह अपनी इस अदूरदर्थिता पर आजीवन पश्चाताप करता रहा।
      मात्र बादशाह को नही अपितु हमे भी इससे यह शिक्षा लेनी चाहिए कि लालच कितना दुःखदायी है – जीव के स्वार्णिम जीवन को क्षण भर मे दुःख के महाकुण्ड मे जा फैंकता है। यह बात तो अक्षरशः सत्य है कि कुदरत की तरफ से मनुष्य को दिये गये ये पानी, अनाज, फल, दूध आदि कितने अमूल्य पदार्थ है। इन वस्तुओ से ही जीवन का निर्वाह होता है। अगर ये पदार्थ एक दिन भी ना मिले तो जीना मुश्किल हो जाये। अतः हमारा कर्त्तव्य है कि लोभ रूपी शत्रु से छुटकारा प्राप्त कर सन्तोषपूर्वक जीवनयापन करे। मालिक के दिये हुए पर ही सन्तुष्ट रह कर अहर्निश शुभ-कर्म मे रत हो भजनाभ्यास द्वारा अपना लोक-परलोक सँवार कर वास्तविक आनन्द के पात्र बनें।                      

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