तीन गुणो का चित्रण

      जिस तरह मनुष्य के अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि मानसिक शत्रु है इसी प्रकार मनुष्य के स्वभाव व विचारो मे तीन गुणो का निवास है। इनको सन्तो ने त्रिगुणी माया कहा है। इनके नाम सत्त्वगुण, रजोगुण, व तमोगुण है। ये तीनो इतने सूक्ष्म है कि इनको कोई मनुष्य सरलता से देख नही सकता और न ही इनकी प्रकृति और स्वभाव को समझ सकता है। इनके सम्बन्ध ने इतना ही बता देना आवश्यक है कि ये गुण प्रत्येक मनुष्य मे एकसमान नही पाए जाते। अगर किसी मे सत्त्वगुण अधिक होगा तो रजोगुण व तमोगुण कम होगे। जहाँ रजोगुण व तमोगुण की विशेषता होगी वहाँ सत्त्वगुण नाम-मात्र होगा। मनुष्य के स्वभाव, प्रकृति तथा आहार से इन गुणो का परिवर्तन हुआ करता है। जो मनुष्य इन तीनो गुणो की विशेषता से भली-प्रकार परिचित होता है। फिर उस मनुष्य को इस त्रिगुणी माया से छूट सकना सरल हो जाता है।
तीन छोड़ चौथा पद दिन्हा, कहे कबीर सदगुरू गति चीन्हा।
  1. ‘तमोगुण’ मे आलस्य (प्रमाद) स्वार्थप्रथा असावधानी व दिल मे मलीनता भरी होती है जिससे लोभ व मौह की उत्पत्ति होती है।
  2. ‘रजोगुण’ के कारण दिल मे चंचलता व अशान्ति पाई जाती है। इसमे काम, क्रोध, अंहकार की अग्नि छिपी रहती है। 
  3. ‘सत्त्वगुण’ दोनो गुणो से विपरित है। मन मे सत्त्वगुणी विचार आ जाने पर परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग सरल हो जाता है। मनोवृत्ति भजनाभ्यास व सत्संग इत्यादि क्षेष्ठ कार्यो में अनायास लगती है। 
वैसे इन तीनो गुणो को माया की सीमा कहा गया है –

।। शेअर ।।
      अर्थ – आत्मा जिसको सत्पुरूषो ने अमर कहा है –
जिसका निवास शरीर के अंदर है, उसको इन तीनो गुणो ने अपनी कैद मे रखा हुआ है। मनुष्य की कमाई ये तीनों मिलकर दिन-रात लूटते रहते है। 
मन मे दूषित व नीच विचारो का होना ‘तमोगुण’ है।
मध्यम विचार अर्थात् भौगोश्वर्य के पदार्थो की प्राप्ति का यत्न करना ‘रजोगुण’ है।
ऊँचे व श्रेष्ठ विचार ‘सत्त्वगुण’ कहलाते है।
मनुष्यो के विचारो मे तमोगुण की अधिकता जीव को चौरासी लाख योनियो मे धकेलती है। जब तक यह जीव स्वयं को इन तीनो गुणो से स्वतंत्र नही करा लेता – मोक्ष की प्राप्ति नही हो सकती। 
      तमोगुण, रजोगुण, सत्त्वगुण की प्रकृति एवं स्वभाव को समझाने के लिए नीचे एक दृष्टान्त दिया जा रहा है –
       एक ब्रह्मण अपने गाँव मे भागवत की कथा किया करता था। यही उसका अपना व अपने परिवार का एक मात्र निर्वाह का साधन था। कथा करने पर जो कुछ चढ़ावा चढ़ता उसी से यह अपना जीवन व्यतीत करता था। इसी प्रकार निर्धन अवस्था मे रहने के कारण पंडित जी ने दिल में सोचा कि अपने देश के ब्रह्मणो को सम्मान कम मिलता हैं। जैसे कहा भी है – ‘घर का जोगी जोगना, आन गाँव का सिद्ध।’ ऐसे विचार उसके मन मे उठा करते थे कि यहाँ रहकर तो मै कष्टो से छूट नही सकता। अतएव किसी दूसरे शहर मे जाने का निश्चय किया।
पंडित बुद्धिमान तो था ही। वह बगल मे पोथी-पत्रा दाब कर घर से निकल पड़ा। दिन भर तो यात्रा करता और जहाँ भी संध्या होती वही पर रात को ठहरता। वही किसी मन्दिर मे बैठ कर कथा करनी शुरू कर देता। उस स्थान पर जो चढ़ावा चढ़ता वह अपनी जेब मे रख आगामी पढ़ाव की सोचता। खाने-पीने की तो पंडित जी को कोई चिन्ता न थी। लोग घरो से रोटी-सब्जी, दूध-दही, मिठाई आदि जो कुछ भी जिसके घर मे होता ब्रह्मण के लिए ले आते थे। यदि कोई व्यक्ति दूसरी रात भी ठहरने के लिए कहता तो यह बीना आनाकानी किये उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लेता। इस प्रकार वह कई स्थानो पर गया किन्तु स्थायी रूप से चलने वाले अच्छे काम का प्रबन्ध उसका न हो सका।
      एक दिन यह पंडित किसी बड़े नगर मे पहुँचा। वहाँ जाकर जब शहर मे कथा करने लगा तब नगर मे चारो तरफ यह धूम मच गई कि कही से कोई बड़ा विद्वान पंडित आया है। सुनकर झुण्ड के झुण्ड श्रद्धालु लोग आने लगे। इस शहर में पंडित जी ने एक सप्ताह तक कथा कि जिससे अत्याधिक चढ़ावा चढ़ा। जब पंडित जी वहाँ से विदा होने लगे तो लोगो ने – किसी ने कपड़े, किसी ने मिठाई व किसी ने नगद रूपये अपनी-अपनी श्रद्धानुसार भेटं किये। पंडित जी ने धन-राशि को तो जेब मे संभाल कर रख लिया तथा खाने की वस्तुएँ एक टोकरी में डाल कर हाथ मे ले ली। इस समय पंडित जी के पास काफी धन इकटठा हो गया था। यहाँ से धन तो मिला ही तथा यश व किर्ति उपहार मे प्राप्त हुई – एक हाथ सोना व दूसरा हाथ चाँदी। अब तो पंडित जी प्रसन्नता से झूमने लगे – ‘गो-रस बेचे हरि मिले, एक पन्थ दो काज’ वाली कहावत यहाँ सिद्ध हुई। कथा सुनने वालो से अवकाश पाकर अन्ततः ब्रह्मण अपने घर की ओर चल दिया।
      घर से आते समय पहले तो ब्रह्मण गांव-गांव घूम कर आया था परन्तु अब तो यहाँ से सीधा ही इसने अपने घर लौटना था। अस्तु सामान उठाए ब्रह्मण अपने घर की ओर पग बढाता चला आ रहा था। जिस मार्ग से यह आ रहा था। उस रास्ते मे एक घना जंगल पार करना पड़ता था। सिर पर कपड़ो का गटठर, एक हाथ मे लाठी व दूसरे हाथ मे खाद्य सामग्री उठाए ब्रह्मण खुशी-खुशी चला आ रहा था।
      इस भयानक जंगल में तीन डाकू रहते थे। जो कुछ इक्का-दुक्का मुसाफिर इधर आ निकलता तो वे उसे लूट लेते थे तथा यही नही, कई बार तो डाकू उनके प्राण तक ले लेते थे। इस प्रकार डाकुओ का यह नित्यप्रति का व्यवसाय था। वह ब्रह्मण भी इस मार्ग पर बढता चला आ रहा था कि उसे डाकुओ ने ललकारा – यही पर ठहर जा, आगे एक कदम भी बढाया तो जान के लाले पड़ जायेगे। यह सुनकर ब्रह्मण दिल मे भयभीत होने लगा क्योकि एक तो वह अकेला था – दूसरा विरान जंगल तथा तीसरा कारण यह कि डाकु तो तीन थे ओर ऊपर से धमकी दिये जा रहे थे। वह अकेला उन तीनो से कैसे मुकाबला कर सकता था ?
      अभी पंडित बेचारा मन मे कुछ सोच ही रहा था कि इतने मे तीन डाकु उस पर टूट पडे। सबसे पहले उन्होंने पंडित जी से डण्डा छीना फिर उसे जमीन पर पटक दिया। धरती पर धड़ाम से गिरते ही वे अचेत हो गए। तब उन्होने उसे अच्छी तरह रस्सी के फंदे मे डालकर वृक्ष से कसकर बाँध किया। फिर तीनो डाकुओ ने मिलकर अच्छी तरह से उसकी तलाशी ली। नकद रूपये, खाने का सामान व कपड़े इत्यादि उससे छीन लिये। पण्डित जी तो वृक्ष के साथ बंधे पड़े थे। सब कुछ तलाशी लेने के बाद भी उसके पोथी-पत्रो को उलट-पलट के देखने मे लगे हुए थे।
      एक डाकु ने कहा – आह! आज तो बहुत माल हाथ लगा। प्रातः किसी अच्छे का मुँह देखकर उठे थे। डाकु पंडित जी को वही पर बँधा छोड़कर जब सामान रखने के लिए घर आये। सामान सुरक्षित स्थान पर रखकर पुनः पंडित जी के पास पहुँच गये। डाकुओ के दिल मे यह भय लगा हुआ था कि इस घटना का किसी को पता चला तो हम पकड़े जायेगे। पण्डित बेचारा दिल मे अत्यन्त दुःखी व परेशान हो रहा था कि घर से भी निकला और विदेश आकर भी लाभ प्राप्त न कर सका।

      मेरी तो ऐसी हो दुर्दशा हो गई है। हाँथ पाँव वृक्ष से बँधे हुए थे जिससे हिलना-जुलना तक भी कठिन था।
डाकुओं ने आते ही उसे धमकाना शुरू कर दिया। डाकु सरदार ने तो म्यान से तलवार बाहर निकाली और कहने लगा – इसको यही मार कर ढेर कर दो ताकि हमारे डाका मारने की इस घटना का किसी को ज्ञात न हो सके।
      इस पर दूसरा डाकु कहने लगा – इसे इसी वृक्ष से ही बँधा रहने दो। भूख-प्यास से छटपटा कर स्वयमेव मर जायेगा। पहला सरदार डाकु दिल का अति कठोर व वज्र हदय का था। इसकी अपेक्षा दूसरे डाकु का दिल कुछ कोमल था। पहला डाकु तो प्रत्येक दशा मे ब्रह्मण को मारना चाहता था, जिससे वह पंडित दिल ही दिल मे काँपे जा रहा था। प्राण विपदा मे पड़ जाने के कारण वह मन ही मन देवी-देवताओ को मनाने लगा कि – यदि मै इस बार डाकुओ के फंदे से छूट जाँऊ तो आयु पर्यन्त घर से बाहर निकलने का नाम न लूँगा।
      पुनः डाकु परामर्श करने लगे। तब उनमे से पहला डाकु तो वध करना ही उचित समझता था। दूसरा डाकु उसको वृक्ष से ही बँधा छोड़ना चाहता था। इस पर सरदार डाकु कहने लगा – यदि कोई अन्य आकर इसे छुड़ा लेगा तो तब यह हमारा भाँडा ही फोड़ देगा। जिससे फिर हमारे विषय मे पूछताछ होने लगेगी और सरकारी कर्मचारी हमारी खोज मे निकल पड़ेगे। इस प्रकार हम सबको लेने के देने पड़ जायेगे।
      डाकुओ की बाते सुनकर पण्डित जी ने डरते-डरते कहा – ‘भाइयो! तुम्हारे मन मे जो आये – सो करो परन्तु मुझे जान से मत मारो। अपने प्राण सबको प्रिय होते है। मै तो एक गरीब ब्रह्मण हुँ। वैसे शास्त्र नीति के अनुसार भी गाय और ब्रह्मण को कोई नही मारता क्योकि इन्हे मारने से बड़ा पाप होता है। अतएव तुम मुझे छोड़ दो। मै यहाँ से सीधा अपने घर चला जाऊँगा तथा लूटे जाने का यह वृत्तान्त किसी को भी न बताऊँगा।’
प्रथम डाकु ने कहा – परन्तु तेरी बात यहाँ सुनता ही कौन है ? दूसरा तेरी बात पर विश्वास कौन कर रहा है? क्योकि एक तो तू पढा-लिखा आदमी, दूसरा ब्रह्मण संसार मे प्रत्येक पर विश्वास करे परन्तु शिक्षित जनो पर तो भूलकर भी विश्वास नही करना चाहिए क्योकि ये पढे-लिखे तो बुरी बला होते है। न्यायालय मे ऎसे-ऐसे पेचीदा (उलझे) प्रश्न करते है कि अपराधी को खाया पिया हुआ समस्त जहर उगलना पड़ता है। न भाई! ना!! हम तो तुझे मारे बिना न छोड़ेगे। यह बातें सुन-सुन कर बेचारे पण्डित जी का तो खून सूखता जा रहा था।
      तीसरा डाकु जो अब तक चुपचाप खड़ा व सुन रहा था समय पाकर कहने लगा – पहले तो यह जाति का ब्रह्मण है। अतः ब्रह्मण को मारने से ब्रह्म हत्या लगती है। दूसरा जब वह स्वयं ही इस बात की प्रतिज्ञा कर रहा है कि लूट जाने की घटना के विषय मे अन्य किसी से कुछ न कहेगा, इसलिए मेरा विचार तो यही है कि इसे इस वृक्ष के साथ ही बँधा रहने दो। हम इसकी हत्या करके पाप के भागी क्यो बने? धन-सम्पत्ति तो वैसे ही हमारे हाथ मे आ गई है। अब इसको मारने से क्या लाभ?
      जब दो डाकुओ ने ब्रह्मण को न मारने की सम्मति दी तो उसकी बात सुनकर बहुमत के अनुसार चुप रहना पड़ा, यद्यपि वह वध करना ही उचित समझता था अन्त मे वे ब्रह्मण को वही वीरान जंगल मे बँधा हुआ छोड़कर अपने निवास स्थान पर लौट आए।
      सांयकाल हुआ। ब्रह्मण वृक्ष के साथ बँधा हुआ इधर-उधर देख रहा था कि कोई भूला-भटका आदमी आ जाए और मुझे इस बन्धन से मुक्त करा दे परन्तु कोई की व्यक्ति इस मार्ग से न निकला क्योकि यह वन तो निर्जनता के लिए विख्यात था। इस जंगल को डाकुओ ने अपना केंन्द्र-स्थान बना रखा था जिस कारण लोग भयभीत थे। कभी कोई भाग्य का मारा यात्री ही इस वन मे आ निकलता जिसको की डाकुओ द्वारा लूटे जाने का बोध न होता था अथवा कोई अपने ही दुर्भाग्यवश खिंचा-खिंचा चला आये तो आ जाए।
      इतने मे वह तीसरा डाकु जिसके दिल मे ब्राह्मण के प्रति दया भाव उमड़ा था ब्राह्मण के निकट आया। पहले तो उसे देखकर ब्राह्मण सिर से पाँव तक काँप उठा और मन मे सोचने लगा कि अब तो मेरी मृत्यु होने मे कोई सन्देह नही ….। डाकु ने निकट आकर कहा – सुनो, ब्राह्मण देवता! डरो नही – मै तुम्हारा वध करने नही अपितु इस बन्धन से मुक्त कराकर तुम्हे तुम्हारे घर तक पहुँचाने आया हुँ। अतः अब तुम दिल से मृत्यु के भय को निकाल दो। मेरे साथियो का यदि वश चलता तो वे तुम्हे अवश्य मौत के घाट उतार देते किन्तु मेरा स्वभाव उनसे भिन्न है।
यह कहते हुए डाकु ने उसके हाथ-पाँव खोल दिये तथा साथ ही कुछ खाने-पीने के भोज्य पदार्थ भी ब्राह्मण को दिये। सम्पूर्ण रात्रि चलते-चलते पण्डित जी को उसके गाँव के निकट पहुँचा दिया। इतने मे सूर्य की लालिमा ने दशो दिशाओ को आलोक से भर दिया। दिन चढता देख कर डाकु विदा होने लगा। तब ब्राह्मण कहने लगा भाई! आपने मेरे प्राणो की रक्षा की है। अतः मेरे घर चलो। वैसे मै इस उपकार का बदला चुका तो नही सकता परन्तु आपको अपने घर ले जाकर आपका अतिथ्य करना चाहता हुँ।
      उसकी बात सुन डाकु मुस्कुराता हुआ ब्राह्मण से कहने लगा – न भाई! मै तुम्हारे ऐसे उपकार से बाज आया क्योकि अभी मुझे तुम्हारे पर इतना विश्वास नही हुआ। वैसे भी डाकु लोग पढे-लिखे लोगो पर विश्वास नही करते। इसी कारण मुझे तुम पर विश्वास नही हो रहा। यह क्या कम है कि जो मैने तुम्हे तुम्हारे घर तक पहुँचा दिया है? अब किसी प्रकार का तुम्हे भय नही होना चाहिए। जाओ! नाक की सीध मे अपने घर चले जाओ तथा मै भी अपनी राह लेता हुँ। यह कहकर डाकु उलटे पाँव ऐसे दौड़ा कि फिर उसे किसी न देखा। दुःखो का मारा ब्राह्मण अपने घर आया। जैसे अपने जीवन मे पहले कंगाल था, वैसे अब भी कंगाल का कंगाल बना रहा।
  1. भावार्थ – प्राणो के मारने के विचार वाला डाकु (मन की मूढावस्था व कठोरता) तमोमुण।
  2. रस्सी से बाँधने वाला डाकु (मन की चंचलता) रजोगुण।
  3. बन्धन से छुड़वाकर जंगल से बाहर तक पहुँचाने वाला डाकु (मन की निर्मलता) सत्त्वगुण। 
अब इन तीनो गुणो की विशद व्याख्या सुनिये –
     पहले शुभ कर्म करके तमोगुण की मूढ़ावस्था को बदलो। फिर उपासना, तप, साधना करके रजोगुण को चंचलता को वश मे करो। उसके पश्चात मन मे जो ज्ञान का भाव है यह सत्त्वगुण है। इसके उदित होने पर ज्ञान की उपलब्धि होगी। ज्ञान की प्राप्ति होने पर परमार्थ-पथ पर सुगमता से चला जा सकता है तथा सुख शान्ति से निज घर पहुँचा जा सकता है। इस त्रिगुणी माया के आत्मा पर तीन पर्दे पड़े हुए है। एक-एक करके इन तीनो पर्दो को दूर करना है। आत्मा की जाग्रत अवस्था को सत्त्वगुण, स्वप्नावस्था को रजोगुण, सुषुप्ति अवस्था को तमोगुण कहते है। चौथा पद-निर्वाण पद अथवा तुरीय दशा इनसे ऊपर है। इस त्रिगुणी माया की सीमा मे से निकलने के बाद ही चौथे पद की प्राप्ति होगी। 
      इन तीनो गुणो का भोजन के साथ गहरा सम्बन्ध है। आहार पर संयम न होने से रजोगुण व तमोगुण बढते है। 
      इसका वर्णन भगवान श्रीकृष्णचन्द्र जी ने गीता के सत्रहवे मे इस प्रकार किया है।
।। शेअर ।।
हे सेह-गाना जौहद औ-ऐमाल सखावत और गिजा ।
अब बयाँ करता हूँ, जिसका शोक है जिस किस्म का ।। 
 अर्थ – भोजन, यज्ञ, जप व दान यह तीन प्रकार के है। इनमे सब की रूचि अलग-अलग से है। ऐ अर्जुन! अब तू उन सब के भेद सुन।
।। शेअर ।।
जिसकी खासियत हो ईजावी नशल व जिन्दगी ।
तन्दरूस्ती जोरे जिस्मानी, तमानियत खुशी ।।
जिसको कहते है मक्कवी व मुफर्रा सर्दतर ।
अक्लमन्दो को बहुत मरगूब है वह माहिजर ।।
अर्थ – जो भोजन आयु, स्वास्थ्य एवं शरीर को प्रसन्नता व स्फूर्ति देता है, साधारण भोजन स्वादिष्ट अच्छा व शक्ति प्रदान करने वाला है, सतोगुणी स्वभाव के मनुष्य उसे पसन्द करते है।
।। शेअर ।।
जो गिजा हो गर्म, खट्टी, खुशक, कड़वी, चरपरी ।
जिसमे हो सोजश की खासियत नमक की ज्यादती ।।
 नुक्से सेहत रंज और तकलीफ हो जिसका असर ।
राल टपकाते है अहले शौक ऐसे चाट पर ।।
अर्थ – जो भोजन कड़वा, खट्टा, गर्म, नमकीन, चटपटा, रूखा व जलन पैदा करने वाला हो, जो कष्ट, चिन्ता व बीमारी का कारण बने – ऐसे भोजन को रजोगुणी वृत्ति रखने वाले लोग पसन्द करते है। जो जिवहा के रस लेने हेतु खाया जाता है वह राजसी भोजन है। 
।। शेअर ।।
अर्थ – बासी, बदबूदार, दूर्गन्धयुक्त, गली-सड़ी, जूठी, अपवित्र खुराक तमोगुणी वृत्ति वालो को अच्छी लगती है।
      भोजन का प्रभाव व्यक्ति के विचारो पर पड़ता है। जैसा-जैसा जो आहार सेवन करेगा तदनुसार उसके विचार व व्यवहार मे उसी प्रकार की बढोतरी होगी। यदि कोई मनुष्य अपने आप को सतोगुणी बनाना चाहे तो सबसे पूर्व अपने आहार-व्यवहार पर कड़ी दृष्टि रखे। आहार-व्यवहार ठीक हो जाने पर विचार स्वतः ही पवित्र, उत्तम व श्रेष्ठ हो जायेगे। यही सत्त्वगुणी की पहचान है। 
      इन तीनो गुणों से ऊपर चौथा पद है। जो मानव सदगुरू द्वारा बताये गए भजनाभ्यास की साधना करके एवं अपने आहार-व्यवहार पर संयमपूर्वक सत्त्व-रज-तम की सीमा को पार कर जाता है तब ऐसे साधक को ईश्वर का निरूपण (साक्षात्कार) हो सकता है। ऐसे मनुष्य को चौथे पद की प्राप्ति होती है। वे जिज्ञासु शरीर के रक्षार्थ ही मात्र आहार किया करते है।
      स्त्री हो अथवा पुरूष जब वे निष्काम होकर अपने नियमित कर्म करके भगवान की आराधना करते है वे सत्त्वगुणी पुरूष है। सत्त्वगुणी वाले मनुष्य का चित्त प्रसन्न व इन्द्रिया शान्त रहती है। दिल मे किसी प्रकार का भय नही होता और मन मे किसी के प्रति ईर्ष्या द्वेष की भावना नही होती। भगवान की प्राप्ति सत्त्वगुण की प्रकृति वाले मनुष्य को सुगम होती है। इस मार्ग मे सदगुरू की छत्रछाया मे रहना परमावश्यक है। कर्म, उपासना द्वारा तीनो गुणो से छूटकारा पाने की जो व्याख्या ऊपर दी गई है – यह समय के सन्त सत्पुरूषो की शरण ग्रहण कर सूरत-शब्द-योग का अभ्यास करके राज-योग करते हुए इस त्रिगुणी माया से सुगमतापूर्वक छूटा जा सकता है।

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