डाकु बना महात्मा

      गोस्वामी तुलसीदास जी सन्तो की संगति की महिमा करते हुए कथन करते है कि शठ मनुष्य भी सन्तो की संगति प्राप्त कर अपना जीवन इस प्रकार सुधार लेते है जैसे लोहा पारस से स्पर्श कर सोने का रूप धारण कर लेता है। दैवयोग से कभी सज्जन बुरी संगत मे पड़ भी जाये तो भी वे फण वाले सर्प के समान अपने उज्ज्वल एवं आदर्शमय बनाने वाले एक दुश्चरित्र डाकू का दृष्टान्त यहाँ दिया जा रहा है –
।। चौपाई ।।
शठ  सुधरहिं  सतसंगति  पाई ।
      पारस  परसि  कुधातु  सुहाई ।।
विधि वश सुजन कुसंगति परही ।
      फणि मणि सम निज गुण अनुसरही ।।
      किसी समय की बात है डाकुओ का एक दल नित्य प्रति बड़ी-बड़ी चोरियाँ करके जीवन निर्वाह करता था। एक दिन किसी राजा की चोरी कर बहुत-सा धन-माल लेकर डाकू सरदार अपने साथियो सहित जंगल की ओर दौड़ा। उन सब की बहुत खोज-बीन की गई परन्तु वे राज-कर्मचारियो के हाथ न लग सके। जंगल मे पहुँच कर यह डाकू-दल जिस स्थान पर पहुँचा, वही कही एक महात्मा जी अपनी कुटिया के बाहर बैठे हुए थे। डाकू सरदार की दृष्टि महात्मा जी पर गई तो क्या देखा की वह कितने शान्त-चित्त बैठे है, उनके मस्तक पर अलौकिक तेज बरस रहा था। दैवयोग से उसके शुभ संचित संस्कारो के उदय होने का अवसर आ गया था। एकाएक उसके विचारो ने पलटा खाया – क्या ? कि उसे अपने जीवन से घृणा हो आई और स्वयं से ग्लानि करने लगा। कोई बहाना बनाकर अपने दल मे से निकल गया। चलते-चलते मन में कहने लगा कि ‘मेरा भी क्या नृशंस जीवन है, लूटमार, खून आदि करना, ऊपर से पुलिस द्वारा पकड़े जाने का भय, चैन व निद्रा तो मुझ से दूर-दूर रहती है।’ ऐसा सोचता हुआ वह महात्मा जी की कुटिया पर जा पहुँचा। महात्माजी ने उससे पूछा – ‘तुम कौन हो और क्या काम करते हो?’ महात्मा जी के पूछने पर उसने अथ से इति तक पूरा वृत्तान्त कह सुनाया।
      तब महात्मा जी ने उपदेश करते हुए उसे बहुत सी ज्ञान भरी कथाये सुनायी कि जो जीव इस प्रकार के घृणित कार्य करते है, दूसरो को दुःख देकर स्वयं की उदर-पूर्ति करते है उन्हे मरणाेत्तर काल मे जो योनिया प्राप्त होती है तथा नाक-यातनाएँ एवं यमदूतो के त्रास मिलते है उनका वृत्तान्त महात्मा जी ने डाकू-सरदार को विस्तार से सुनाया, जिसे सुनकर वह बहुत पछताया और अपने कर्मो द्वारा मिलने वाले भावी दण्डो को याद कर थर-थर काँपने लगा। आर्त्तनाद करता हुआ महात्मा जी के चरणो मे गिरकर प्रार्थना करने लगा – ‘महाराज ! मैने तो बहुत पाप किये है। मेरा सुधार कैसे होगा ? कृपा कर मुझे उनसे निवृत्ति हो सकती है। वह साधन तुम्हे हम बताते है कि यहाँ से 12 मील की दूरी पर एक पूर्ण ब्रह्मवेत्ता, शान्तचित्त सन्त जी रहते है। तुम उनकी शरण मे जाकर उनकी तन-मन से सेवा करो मगर साथ ही यह बात भी ध्यान मे रखना कि आश्रम मे रहने पर कई प्रकार के कष्ट आया करते है परन्तु तुम उन्हे हँस-हँस कर सहन करते जाना तथा एक रस होकर 12 वर्ष तक उन पूर्ण पुरूष की सेवा मे निमग्न रहना, तुम्हारे सब पाप दूर हो जायेगे।’
      महात्मा जी के वचन सुन उनके चरणो मे सिर झुका कर तथा उनकी आज्ञा से वह चल पड़ा तथा वहाँ पहुँचा जहाँ ब्रह्मवेत्ता सन्त जी निवास करते थे। उसने उनके चरणो मे साष्टाँग दण्डवत प्रणाम किया। उन ब्रह्मवेत्ता सत्पुरूष जी ने उसे उठाया और पूछा – “आप कौन है ?” उनका इतना पूछना ही था कि उसके नेत्रो ने जल की धारा प्रवाहित कर दी, किसी प्रकार भी स्वयं को संभाल न सका। आखिर अपने आँसू पोछ और धैर्य धर उसने अपने जीवन की पूरी घटना और महात्मा जी के द्वारा यहाँ तक पहुँचने की सारी वार्ता कह सुनाई। साथ ही यह विनय की “हे प्रभो ! अब मेरी यही अभिलाषा है कि आजीवन आपके चरणो में रह कर अपने जन्म को सार्थक करूँ। कृपा कर अपनी शरण मे ठौर बख्शे।” ऐसा कहते-कहते पुनः अपना सिर उनके चरणो पर रख दिया और प्रेम अश्रुओ से उनको प्रक्षालित कर दिया।
      इस प्रकार उसके असीम वैराग्य व प्रेम, श्रद्धा को देख सन्त जी पसीज उठे। उन्हे उसकी हालत पर करूणा हो आई। उन्होने आशीर्वाद देते हुए उसे सप्रेम उठाया एवं नामोपदेश देकर आश्रम मे रहने की स्वीकृति भी दे दी। अब आज्ञानुसार वह वही आश्रम मे रहने लगा। तन-मन से सेवा करता परन्तु लंगर से खाना न खाता था। उसके पास कुछ धन था उससे ही वह उदर-पूर्ति करता रहा। इस प्रकार सेवा करते देख कर गुरू जी उस पर अन्दर ही अन्दर प्रसन्न हो गए परन्तु ऊपर से उसे कुछ न कहते थे। गुरू जी को उस पर प्रसन्न हुआ देख लंगर के कर्मचारियो मे से एक-दो आदमी ऐसे थे जिनका स्वभाव इर्ष्यालु प्रकृति का था, वे अब उससे ईर्ष्या करने लगे। उन्होने अब उसको ईर्ष्या से दूरवर्ती जंगल से लकड़िया लाने का काम सौंप दिया।
      गुरू जी की बड़ी प्रसिद्धि थी। अतः दूर-दूर से संगते उनके दर्शनो व संत्सग मे आया करती थी इसी कारण लंगर रात-दिन चला करता था। यह डाकू सेवक सारा दिन लकडियाँ लाता और रात को लंगर की सेवा करता। एक दिन गुरू जी ने उससे पूछा – “तुम खाते कहाँ से हो?’ तब उसने सब बता दिया। उसकी समस्त वार्त्ता सुन कर गुरू जी ने लंगर के सेवादारो को हुक्म दिया कि “इसे लंगर में से ही खाना खिलाया करो।” और इस सेवक को भी फरामाया कि ‘तुम लंगर से ही भोजन खाया करो।’
      पूर्ण सदगुरू का पवित्र संत्सग प्राप्त होते हुए भी कई व्यक्ति ऐसे होते है जो उनके निकट रहकर के भी दुर्भाग्य वश पूरा-पूरा लाभ इस प्रकार प्राप्त नही कर सकते जिस प्रकार की चंदन के वृक्षो के निकट नीम-शीशम आदि के वृक्ष होते हुए भी चन्दन से सुगन्धि प्राप्त नही करते। गुरू जी के उक्त वचन सुनकर वे दोनो कर्मचारी भी ईर्ष्या की अग्नि मे सुलगने लगे। वे इस पर बड़े तीखे कटाक्ष करते तथा अब उसे रोटी में बहुत सा आटे का छान मिला कर देने लगे। यह सेवक गुरू जी की सेवा व प्रेम में पूर्ववत निमग्न रहता। उसके द्वारा सूखी रोटी देने एवं कटु वचनो की उसने तनिक भी परवाह न की। गुरू जी के दर्शन, सत्संग, सेवा के अतुल आनन्द के समझ ये कष्ट उसे तुच्छ जान पड़े। इस प्रकार लंगर मे से भूसी मिश्रित भोजन करते हुए उसे तीन वर्ष और बीत गए। वह ऊपर ऊपर से पका आटा खाकर बीच में से छान फेंक छोड़ता तथा जंगल मे जब लकडियाँ लेने जाता तो वहाँ के कन्द-मूल खाकर निर्वाह करता और पहले से भी अधिक दिन दुगुनी और रात चौगुनी सेवा करने लगा। उसमे सेवा के प्रताप से इतनी सहन शक्ति आ गयी थी कि उनके कष्ट देने पर भी वह गुरू जी से कोई शिकायत न करता अपितु सतगुरू की प्रसन्नता एवं सेवा के आनन्द से पूरी तरह से भोजन न खाने पर भी वह पूर्ववत हष्ट-पुष्ट बना रहा। इसपर सतगुरू की प्रसन्नता एवं उसकी हष्ट-पुष्टता ने ईर्ष्यालुओ की ईष्याग्नि मे घृत की आहूति का काम किया कि अब वे इसे रोटी में बहुत सा नमक मिला कर देने लगे तथा उससे बहुत काम भी करवाने लगे। यह देख अन्य कार्यकत्ताओ ने उन दोनों को बहुतेरा समझाया कि ऐसा करना उचित नही परन्तु वे अपनी दुष्प्रकृति के कारण विवश थे। अतएव वे अपनी दुष्टता से नही हटे।
      यह डाकू सेवक उन द्वारा दी गई नमक-मिश्रित रोटी को पानी मे भिगो रखता। जब नमक पानी मे घुल जाता तब वह पानी फेंक रोटी खा लेता। इतना कुछ होने पर भी उसने प्रभु-प्रेम मे किसी प्रकार की आँच न आने दी प्रत्युत दिन-प्रतिदिन उन्नति ही करता गया।
      उस सेवक को अत्यन्त कष्ट देने पर भी उनको चैन कहाँ? उधर श्री गुरूदेव की असीम कृपा और इधर ईर्ष्यालुओ द्वारा मिलने वाले असह्म कष्ट। सच है, ज़हाँ फूल होते है वहाँ काँटे भी साथ होते है। ईष्यालु कब यह सहन कर सकते थे कि नया आया आदमी इतनी जल्दी गुरुदेव की प्रसन्नता को पा ले। अब उन्होने उसे और भी कष्ट देने के लिए एक नया षड़यंत्र रचा कि रोटी मे बाल मिला कर देनी शुरु कर दी जिसे खाकर वह रोगी हो जाए और उठ न सके।
      उनके दुर्व्यवहार को देखकर वह सोचने लगा कि यदि मै यहाँ से चला जाऊँगा तो गुरू-सेवा छूट जायेगी और मेरी ही हानि होगी। इसलिए इन लोगों द्वारा अपमान सहना ही उचित है परन्तु सेवा न छोड़नी चाहिए। जैसे कहा भी है –
।। श्लोक ।।
      अर्थ – ‘अपमान को सहन कर मान की इच्छा न करके कार्य सिद्ध करना चाहिए। कार्य की हानि करना मूर्खता है।’ यह विचार कर वह रोटी को कूट कर पानी में भिगो रखता और कपड़े से छान कर बाल निकाल रोटी खा लेता इस प्रकार निष्काम सेवा करते हुए उसके कई वर्ष बीत गये। यद्यपि गुरू जी सर्वज्ञ थे। परन्तु ऊपर से कुछ न कहते थे। कारण वह जानते थे कि इसकी सेवा रूपी तितिक्षा से ही जन्म-जन्मांतरो के पाप धोये जायेगें। इस कारण वह उसके खान-पान पर की ओर विशेष ध्यान न देते।
      जब उसका शरीर सेवा करते हुए और बिना कुछ खाए हुए कृश हो गया तब एक दिन की बात है कि वह लकड़ियो का गटठा सिर पर उठाए चला आ रहा था। मार्ग मे आँधी आने लगी। चलते-चलते कृशकाय (निर्बल) शरीर एक गड़ढे मे जा गिरा। तत्क्षण उसके मुख से अफसोस युक्त शब्द निकले, ‘खेद है कि गुरू द्वारा अभी ब्रह्मानन्द तो लिया नही और यह शरीर पहले ही गिर पड़ा।’ इतने शब्द निकलते ही उसने अपने को सम्भाला और लकड़ियाँ लिये हुए गड़ढे से बाहर निकला, शने: शनेः चलकर आश्रम मे आ पहुँचा। लकडियाँ रख पूर्ववत लंगर की सेवा में जुट गया परन्तु अपने गिरने की बात किसी से न की।
      गुरू जी अन्तर्यामी तो थे ही। वे उसके निष्काम सेवा-भाव से अति प्रसन्न थे। अब उसे भक्ति की परीक्षा मे उत्तीर्ण जानकर उन्होने सब संगत को एकत्र किया तथा उन दोनो लांगरी सेवको को भी जो कि उससे ईर्ष्या करते थे। सबके सामने गुरू जी ने उससे पूछा – ‘प्रेमी ! आज गडढे मे गिरते समय तुमने क्या शब्द कहे थे?’
      उस सेवक ने करबद्ध यह विनय की – ‘गुरूदेव ! उस समय मैने यह कहा था, खेद है कि अभी तक श्री गुरूदेव जी से ब्रह्मनन्द तो लिया और यह शरीर पहले ही गिर पड़ा।’ उसके मुख से इतने उच्च और श्रेष्ठ वचन सुनकर गुरू जी भीतर ही भीतर गदगद हो उठे और उसे अपने समीप बुलाया। निकट आने पर सच्चे सेवक के सिर पर करूणा भरा हाथ फेरा और अटल भक्ति का आशीर्वाद दे रूहानियत के अलौकिक धन से मालामाल कर दिया। सच्चे सेवको का प्रमाण किसी कवि ने इस प्रकार दिया है –
सच्चे  आशिक  मूल न  डरदे,  तान्या  दुःखा  पासों ।
लावन ते च तोड़ निभावन, डरन न निकलन सांसों ।।
मक्खी अते  परवाना  दोनों, जलन  शमा ते  आवन ।
मक्खी  नसे पर  परवाने,  तन-मन  जाल  दिखावन ।
      भावार्थ यह है कि जो प्रेमी अपने प्रियतम को पाने की तीव्र लालसा रखता है, वह रवाने की न्याई शमा पर जल मरने मे हिचकिचाता नही। जैसे कि इस दृष्टान्त मे डाकू को जब महात्मा जी के क्षणिक मात्र सत्संग से तीव्र वैराग्य हो गया तब उसने अपने रूहानी गुरू को रिझाने मे कोई कसर न छोड़ रखी। ऐसे ही दृढ निश्चय वाला प्रेमी मालिक को पाने के लिए स्वयं को समर्पित कर सब कुछ पाने का अधिकारी हो जाता है। अगर यही डाकू आई हुई परीक्षा से घबरा जाता तो सदगुरू की प्रसन्नता को कैसे प्राप्त कर सकता था। इसलिए ईश्वर प्राप्ति के लिए जब मनुष्य पग बढ़ाता है तो मन, इन्द्रिया, शरीर व बुद्धि से ऊपर अपनी सुरति की धारा को ले जाने पर ही सदगुरू की प्रसन्नता प्राप्त हो सकती है, जिससे आत्मा का साक्षात्कार होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.