टीपू सुल्तान

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       टीपू सुल्तान हैदर अली के पुत्र थे। इनका जन्म सन् 1753 ई. मे हुआ था। इसके पिता मैसूर के शासक थे। कुछ लोग समझते है कि हैदर अली मैसूर का राजा था। यह बात नही है। हैदर अली ने कभी अपने को राजा नही बनाया। मैसूर के राजा की मृत्यु के बाद उसने उनके छोटे पुत्र को जिसकी अवस्था तीन-चार वर्ष की थी, राजा घोषित कर दिया और उन्ही के नाम पर सब काम-काज करता रहा। उसने धीरे-धीरे मैसूर राज्य की सीमा बढा ली। कुछ पढ़ा-लिखा न होने पर भी उसको सेना सम्बन्धी अच्छा ज्ञान था। उसका सहायक खांडेराव एक महाराष्ट्री था।
      टीपू जब तीन साल के हुए, हैदर अली की मृत्यु हो गई। युद्ध तथा शासन का तब तक उन्हें अच्छा ज्ञान हो गया था। उस समय भारत मे इंग्लैंण्ड की ‘ईस्ट इण्डिया कम्पनी ‘अपना राज्य फैला रही थी। हैदर अली कई बार कम्पनी से लड़े थे। जिसके कारण टीपू को अग्रेजों से लड़ने के रंग-ढ़ग की जानकारी हो गई थी। इस युद्ध मे टीपू ने नये ढंग से आक्रमण का तरीका निकाला था। वे एकाएक बहुत जोरो से बिजली की भाँति आक्रमण करते थे और शत्रु के पैर उखड़ जाते थे। हैदर अली स्वयं पढ़े-लिखे नही थे परन्तु टिपू शिक्षा की उन्होने अच्छी व्यवस्था कर दी थी। अतः टीपू शिक्षित भी थे और घुडसवारी मे भी निपुण थे।
      जिस समय टीपू को पिता की मृत्यु का समाचार मिला। वह भारत के पश्चिम मालाबार मे अंग्रेजो से लड़ रहे थे। उन्हें लड़ाई छोड़ना ही उचित समझा। वहाँ दरबरियो तथा मन्त्रियो ने इनको ही सहायता दी और टीपू को मैसूर की बड़ी सेना का सेनापति बनाया गया।
      इसके बाद उन्हे अंग्रेजो से लड़ाई लड़ने का प्रबन्ध करना था। अंग्रेजो ने मराठा से सन्धि कर ली और टीपू पर आक्रमण कर दिया। इस लड़ाई मे टीपू ने अंग्रेजो को पराजित किया। टीपू ने अपनी सहायता के लिए कुछ फ्रेंच सिपाही भी रखे थे जो उन दिनो भारत मे थे। अंग्रेजो ने टीपू से सन्धि की प्रार्थना की। इस सन्धि की बाते करने के लिए अंग्रेजो की ओर से एक दल आया और टीपू से अंग्रेजो की सन्धि हो गयी। अंग्रेजो ने यह सन्धि इसलिए की थी कि उन्हे स्वयं को शक्तिशाली बनाने के लिए कुछ समय मिल जाए। जिससे की वे टीपू को पराजित कर सके। इस सन्धि से टीपू निश्चित हो गए। जिससे वे अंग्रेजो की शक्ति का सही अनुमान नही लगा सके। टीपू को लगता था कि उनकी शक्ति अंग्रेजो के बराबर है और वे अंग्रेजो को पराजित कर सकते हे। फ्रेंच सैनिको न भी टीपू के इस विचार का समर्थन किया। इतना ही नही, उन लोगो ने टीपू को अंग्रेजो के खिलाफ भड़काया भी था।
      उन लोगो का विचार था कि यदि अवसर मिले तो टीपू की सहायता से अंग्रेजो को भारत के दक्षिण से निकालकर स्वयं वहाँ राज्य करे। इन बातो से टीपू का उत्साह बढ़ गया। टीपू ने फ्रांस से कुछ सहायता पाने की आशा की, कुछ जगह पत्र भी लिखा। उसका यही अभिप्राय था कि अंग्रेजो को भारतवर्ष से निकाल दिया जाए। अंग्रेजो को इस बात का पता चल गया और उन्होने टीपू को समय देना उचित न समझा। उन्होने टीपू के विरूद्ध सेना भेज दी। इस बार अंग्रेजो और टीपू के बीच कई बार घमासान युद्ध हुआ और अन्त मे टीपू घिर गया। कुछ दिनो के बाद टीपू लड़ते हुए मारे गए।
      टीपू को विजय प्राप्त नही हुई, यह उनका दुर्भाग्य था। किन्तु यदि उन्हें सचमुच सहायता मिली होती तो अंग्रेजो का राज्य भारतवर्ष मे शायद दृढ़ न हो पाता और हमारे देश का इतिहास बदल गया होता। यदि वह अंग्रेजो से सन्धि कर लेता तो उन्हें कोई कठिनाई न होती उन्होने ऐसे नही किया और इसी कारण अंग्रेज भी उनका नाश करने मे तुले हुए थे।

      टीपू ने अपने राज्य मे अनेक सुधार किये। उस समय वहाँ ऐसी प्रथा थी कि एक स्त्री कई पुरूषो से विवाह कर सकती थी। यह प्रथा उन्होने बंद कर दी और यह नियम बनाया कि जो ऐसा करेगा उसे कठोर दण्ड दिया जायेगा। वह स्वयं शराब नही पीते थे और उनके राज्य में शराब पीना अपराध था। उनकी पढने-लिखने मे रुचि थी और उनका अपना निजी पुस्तकालय था। उन दिनो पुस्तकालय बनाना कठिन था क्योंकि छापाखाना नही था और हाथ से लिखी पुस्तके ही मिलती थी। उन पुस्तको से पता चलता है कि साहित्य के साथ-साथ टीपू की कविता, ज्योतिष, विज्ञान तथा कला मे भी रूचि थी।
      टीपू का जीवन आमोद-प्रमोद मे नही बीतता था। सवेरे से सध्यां तक वे परिश्रम करते थे और चाहते थे कि दूसरे भी इसी प्रकार राज्य का काम-काज करे। उन्होंने तिथियाँ सूर्य-वर्षों के अनुसार चलायी थी। युद्ध-कला पर उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी। उनकी स्पष्ट आज्ञा थी कि युद्ध के पश्चात लूटपाट मे स्त्रियो को कोई न छूए। अपनी माता का वे बहुत सम्मान करते थे और सदा उनकी आज्ञा का पालन करते थे।
      टीपू ने अपने पिता के सम्मुख युवावस्था मे लिख कर प्रतिज्ञा की थी कि मै कभी झूठ नही बोलूँगा, धोखा किसी को नही दूँगा, चोरी नही करूँगा और जीवन घे अन्त तक उन्होंने इस प्रतिज्ञा का पालन किया।
      टीपू सभी धर्मो का आदर-सम्मान करते थे। उनकी सेना मे तथा मंत्रिमण्डल मे सभी धर्मो के अनुयायी थे। हाँ, धोखा देने वालो के साथ उनका व्यवहार कठोर था और उन्हें वे दण्ड देते थे।
टीपू वीर थे जिन्होंने अपने देश को विदेशियो के चंगुल से छुड़वाने का कठिन प्रत्यन किया। उन्हे सफलता नही मिली, किंतु उनके महान होने मे कोई सन्देह नही है।

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