जीवन बहुत पड़ा है भजन-पूजन वृद्धावस्था मे कर लेगे (अध्यात्म राह)

     आज और कल का नाम लेते लेते ही मनुष्य की आयु बीतती जा रही है। बचपन खेलने मे, जवानी धन व सन्तान के झूठे मोह मे फँसकर नष्ट कर देता है, वृद्धावस्था मे उनको छोड़ने की अपेक्षा पहले से भी अधिक मोह-ममता के बन्धनो मे जकड़ा जाता है। सन्त-महापुरूष इस जीव को ममता व तृष्णा के बन्धन से छुड़ाने का पूरा-पूरा प्रयास करते है। प्रस्तुत दृष्टान्त इसी कथन की पुष्टि करता है – 

     कोई एक राजा बहुत नेक, सत्संगी, परलोक की चिन्ता करने वाला, ईश्वर भक्त, न्यायकारी और गरीबो पर दया करने वाला था। उसके चरित्र मे सभी प्रकार के श्रेष्ठ गुण पाये जाते थे, परन्तु देखिये विधाता की विचित्र रचना कि जहां राजा इतना ईश्वर परायण एवं सन्त-सेवी था तो वहां दूसरी तरफ उसकी अपेक्षा देश सम्राट की धर्म पत्नी उनके भक्ति पथ के विचारो से बिल्कुल विरूद्ध अर्थात् नास्तिक थी। उनको अपने सुन्दर रूप का घमण्ड, राजमद और अपने शारीरिक बनाव श्रृंगार करने मे सतत व्यस्त रहना ही प्रिय था। खाना पीना एवं सुन्दर सुन्दर वस्त्राभूषण धारण करना उसे सत्य भासते थे। भजन-पूजन मे अपने समय को लगाना वह व्यर्थ समझती थी। रानी की यह अवस्था राजा को हर समय चुभती रहती थी। वह कई बार रानी से कह चुके थे कि यह मनुष्य जन्म अनेक शुभ कर्मो से मिलता है।
     राजा के इस प्रकार समझाने पर भी रानी हर बार यही उत्तर देती की महाराज! भगवान् ने कृपा कर हमे अंसख्य भोग्य-पदार्थ दिए है, मनुष्य जन्म तथा साथ ही राज्य की साम्राज्यता भी दी है, मुझे सुन्दर रूप व यौवन दिया है। इसलिए इस युवावस्था और जीवन की स्वर्णिम घड़ियों मे खाने-पीने एवं सुखेश्वर्य का आनन्द लेना चाहिए। क्योकि परमार्थ और परलोक सुधार के लिए तो अभी बहुत समय पड़ा है फिर भजन-पूजन कर लेगे, अभी से जल्दी क्या पड़ी है?
      राजा ये बातें सुनते तो रानी की अल्पबुद्धि पर अफसोस करते और समझाते हुए रानी से कहते – रानी! क्या मालूम किसकी जीवनयात्रा कब और कहाँ समाप्त होगी। तुम्हारा इस प्रकार कहना कि योवनावस्था बीतने पर बुढ़ापे मे परलोक सुधार के कार्य भी सिद्ध कर लेगें, ऐसा समझना तुम्हारी बड़ी भूल है। चूँकि इस जीवन की घंडिया शनैः शनैः सरक रही है तथा यह भी आवश्यक नही कि बुढ़ापे तक हमारा शरीर इसी भाँति स्थिर रहे। जब श्वासों का ही भरोसा नही तो फिर शरीर स्थिरता की तो बात ही प्रथक् है। जैसे सन्त सहजोबाई जी की वाणी से स्पष्ट है –
।। दोहा ।।
भीतर का भीतर खुलै, कै बाहर खुली जाये ।
देह खेह हवै जायेगी, जैहो जन्म गँवाय ।। 
      राजा द्वारा ऐसी यर्थार्थता से भरी बातें सुनकर भी रानी के हदय पर उनका किंचितमात्र भी प्रभाव न पड़ता। राजा सदैव इसी फिक्र मे रहता कि किसी उपयुक्त साधन द्वारा रानी को सन्मार्ग पर लाना चाहिए क्योकि मेरे तो लाख बार समझाये जाने पर भी इसके मन पर तनिक भी प्रभाव पड़ता दृष्टिगत नही हो रहा। इसप्रकार सोचते सोचते राजा को एक युक्ति सूझी। मन ही मन सोचने लगे कि अपने गुरूदेव द्वारा रानी को उपदेश करवाकर सन्मार्ग पर अग्रसर कराना चाहिए। ऐसा विचार दृढ़कर एक दिन राजा अपने सदगुरू जी के दर्शनार्थ उनके आश्रम पर गये और रानी के विषय मे समस्त दृष्टान्त उन्हे सुना दिया। 
      उत्तर में गुरूदेव जी ने फरमाया – अच्छा राजन्! हम अमुक दिन आपके घर आएँगे तब सत्संग द्वारा रानी को समझायेगे।
      निश्चित अवधि पर गुरुदेव राजमहल मे पधारे। राजा रानी दोनो ने मिलकर इनका सादर अभिवादन किया। भोजन हेतु प्रबन्ध होने लगा। तब गुरुदेव ने कहा – भोजन हम थोड़ी देर बाद करेगे क्योकि हमारा विचार पहले सैर करने का है। इसलिए तुम दोनों हमारे साथ सैर पर चलो। साथ में अन्य किसी कर्मचारी या नौकरादि को ले चलने की आवश्यकता नही। हम तीन शरीर ही चलेगे।
      गुरूदेव जी के कथनानुसार ये तीनों ही सैर को गये। चलते-चलते जब ये गेहूँ के एक खेत के किनारे पहुँचे जो बिल्कुल पक चुका था। वहाँ रूककर गुरूदेव ने रानी से कहा कि ‘राजा और हम खेत के इस किनारे से होते हुए खेत के उस पार जाते है और तुम खेत के बीच मे से होकर उस पार आ जाना। खेत के अन्दर से आने के लिए तुम्हे इसलिए कहा है कि जिस जगह तुम्हे गेहूँ की पकी बालियाँ मिले हमारे लिए तोड़कर ले आना।’    
      रानी ‘बहुत अच्छा’ कहकर खेत मे घुस गई और गुरूदेव राजा के साथ खेत के किनारे-किनारे चलने लगे। इधर रानी जब खेत के बीचो बीच पहुँची तो क्या देखा कि यहाँ फसल बहुत पक रही है। मोतियों के दानों की सी पकी हुई बालियां लदी हुई है। विचार आया कि गुरुदेव के लिए यही से ही पकी हुई बालियां तोड़ कर ले चलूँ। पुनः मन ही मन कहने लगी कि अभी तो बहुत खेत बाकी है। यहाँ से कौन बोझ उठाये आगे चलकर तोड़ लूँगी। कुछ कदम चलने के उपरान्त रानी ने क्या देखा कि खेत के पिछले हिस्से की न्यायी यहाँ गेहूँ की बालियां बहुत अच्छी नही अर्थात् खराब है। यह देख रानी ने विचार किया कि यह तो गुरूदेव के योग्य नही। कदाचित् और आगे चलकर अच्छी बालियां मिल जाएँ तो वही से तोड़ लूँगी।   
      कुछ और आगे चलने पर उसे पहले से भी कमजोर और खराब बालियां दिखाई दी। जिससे रानी फिर भी ‘आगे तोड़ने का विचार कर’ आगे चल पड़ी। चलते चलते खेत की परिधि ही समाप्त हो गई और रानी वहां जा पहुँची। जहां राजा सहित गुरूदेव रानी की प्रतीक्षा कर रहे थे। रानी को खाली हाथ आया देख गुरूदेव जी ने पूछा – ‘हमने तुमसे गेहूँ की बालियां लाने को कहा था सो तुम क्यो नही लायी। (आश्चर्यमयी मुद्रा बनाकर) क्या खेत मे पकी हुई बालियां नही थी?’  
      रानी ने सिर झुकाकर कहा – ‘गुरूदेव! खेत मे बालियां बहुत अच्छी से अच्छी थी पर मै न ला सकी। कारण यह कि मै खेत के मध्यान्तर पहुँची तो मुझे बहुत ही अच्छी और पकी हुई बालियां नजर आई लेकिन इस विचार से कि अभी तो बहुत खेत बाकी पड़ा है कुछ आगे चलकर तोड़ लूँगी। यह सोच मैने उन बालियों को न तोड़ा, परन्तु आगे बढ़ने पर मुझे वैसी बालियां न प्राप्त हो सकी जो आपके योग्य होती। इस तरह विचार करते करते कि आगे चलकर तोड़ लूँगी। अन्ततः इसी कारण खालीं हाथ लौट आई हूँ जिसका मुझे अत्यधिक अफसोस है।’
      महापुरूष किसी न किसी युक्ति द्वारा जीव को समझा कर उसे भक्तिपथ पर अग्रसर करते है तो यहाँ भी गुरूदेव ने उचित अवसर देखकर कहा – ऐ भोली रानी! इसी प्रकार तुम कुछ विचार करो कि तुम्हारा यह जीवन भी खेत के मध्यभाग (युवावस्था) उपलब्ध न हो सकेगी। बस, अभी से ही परलोक का फिक्र करो। इसी अवस्था (वर्तमान) मे ही मालिक का सुमिरण-भजन सत्संग व शुभ कर्म किये जा सकते है क्योकि बुढ़ापे में तो सब इन्द्रियां शिथिल पड़ जाती है। अतः अभी से ही ऐसे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म करो जिससे भगवान के दरबार मे प्रभु-नाम की पूंजी से रिक्त हाथों जाकर लज्जित न होना पड़े। दूसरा जैसे खेत आगे जाकर समाप्त हो गया इसी तरह इस नश्वर शरीर का क्या भरोसा कि वृद्धावस्था तक यह शरीर रहे अथवा न भी रहे।’    
      गुरूदेव द्वारा खेत का प्रमाण देने पर एवं ज्ञान भरे वचनों ने रानी के हदय पर बहुत अच्छा प्रभाव डाला। फलत: रानी ने उसी दिन गुरूदेव से सच्चे नाम की गुरू-दीक्षा ली और वह भी राजा की भाँति नित्यप्रति भजन सुमिरण मे अधिकाधिक समय लगाकर अपने जीवन को सफल बनाने लगी। सारांश –
।। शेअर ।।
      इस दृष्टान्त मे आपने यह पढ़ा कि रानी ने किस तरह अच्छी गेहूँ की बालियां खेत के मध्य भाग से न तोड़ कर ‘आगे चलकर तोड़ने’ की आशा बनाए रखी जिस से अन्त मे उसे खाली हाथ महात्मा जी के पास  लौटना पड़ा। ठीक यही दशा मनुष्य कि है जो अपने आत्म-सम्बन्धित शुभ कार्यो – सत्संग, भजनाभ्यास, सन्त-सेवा इत्यादि को करने के लिए कल पर डाल देता है कि अब समय नही है बाद मे करूँगा, लेकिन अज्ञानता के कारण वह नही जानता कि कल आयेगी अथवा नही।   
।। दोहा ।।
आज कहै मै काल्ह भजूँगा, काल्ह कहै फिर काल ।   
आज काल्ह के करत ही, औसर जासी चाल ।।

Leave a Reply

Your email address will not be published.