जीवन की सच्चाई जानिये एक छोटे-से प्रंसग से

      मौत सबके सिर पर जन्मजात ही सवार है। सभी इस बात से परिचित है कि एक न एक दिन अवश्य मृत्यु के मुँह मे जाना ही जाना है। प्रायः सभी एक-दूसरे को इस संसार से विदाई लेते हुए भी देखते है, परन्तु माया ऐसी प्रबल है कि सब देखते हुए भी किसी को अपनी मौत का विचार तक नही आता। मगर मौत से किसको छुटकारा प्राप्त हुआ है। कबूतर के आँख बन्द कर लेने पर वह बिल्ली के आक्रमण से बच नही सकता। वह तो बिल्ली का शिकार है ही। अतएव जो मनुष्य मृत्यु की तरफ से निशिचत हो जाते है। वे बड़ी भारी भूल करते है। मनुष्य कब तक काल की बली से जान छुडायेगा। कहावत है भी ‘बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी।’


      अभिप्राय यह है कि मृत्यु सब के लिए अनिवार्य है और मरणोपरान्त जनसाधारण का नाम तक मिट जाता है।


        प्रस्तुत दृष्टान्त मे यह दर्शाया गया है कि एक धाया किसी शहजादी को चिंरजीव होने का आर्शीवाद देती है और इन शब्दो की गहराई मे उतर कर शहजादी किस प्रकार इसका सार तत्व प्राप्त करती है। पूरा विवरण इस प्रकार है –

      देहली मे किसी मुगल बादशाह की एक लड़की थी। जो सर्वगुण सम्पन्न थी, पर आयु मै थी सबसे छोटी। एक दिन उसने अपनी धाया के सलाम करने पर, उसे कुछ पुरस्कार दिया, इस पर धाया ने आशीष दी ‘नन्ही! चिरंजीव रहो।’
      शहजादी – अगर मेरी आयु बढ़ जायेगी तो क्या होगा ?
      धाया – तेरा विवाह होगा, दूल्हा घर आयेगा और तू दूल्हन बनेगी।
      शहजादी – फिर क्या होगा ?
      धाया – तेरे द्वारा परिवार बढ़ जायेगा, मान बढ़ाई होगी और दुनिया मे तेरा बोलबाला होगा।
      शहजादी फिर क्या होगा ?
      धाया – तू बूढ़ी हो जायेगी, तेरे बच्चो के बच्चे होगे, तू नानी व दादी कहलायेगी।
      शहजादी – अच्छा! इसके बाद क्या होगा ?
      अन्त मे धाया झुँझला उठी। कोई जवाब न बन पाया। रोष मे आकर कहने लगी – फिर क्या होगा तू मर जायेगी, कब्र में गाड़ दी जायेगी, कीड़े-मकौड़े तेरे जिस्म के गोश्त को खा जायेगे और फिर तेरा कही नाम निशान तक न रहेगा। यही सब की जिन्दगी का अन्तिम परिणाम होता है। बस वही दशा तेरी भी होगी।

      शहजादी – मेधावी (समझदार) तो थी ही। धाया से इतना सुनतें ही ठहाका मार कर हँसते हुए कहने लगी – बस! इसी के लिए तू मुझे दुआ देती है कि नन्ही! चिरजींव रहो।
      ज्ञानवान व समझार होने के नाते धाया की बातें धाया के अन्त:स्थल मे उतर गई। उसने सोचा जब यही दशा अन्त मे काया की होनी है तो फिर क्यो व्यर्थ मे अपने इस दुर्भल शरीर को विषय-विकारो मे खोया जाए। क्यो न मालिक का सुमरण भजन करके इस क्षणिक जीवन मे अपने वास्तविक उददेश्य की सिद्धि कर ली जाए। ऐसा दृढ़ निश्चय करके वह एक सूफी फकीर (जिनका झोपड़ा महल के निकट ही था) के पास जाकर उनकी शिष्या बन गई तथा उनकी कृपा से नाम के सुमरण मे लग कर अपने जीवन के सच्चे लक्ष्य को प्राप्त कर गई।
      इस संसार को सन्त-सत्पुरूषो ने वृक्ष की छाया, पानी का बुलबुला व मुसाफिरखाने की न्यायी बतलाया है। वृक्ष की छाया व पानी का बुलबुला स्थायी नहीं, इन पर विश्वास करना मानवमात्र की भूल है अथवा जो मनुष्य संसार को सराय न समझ कर अपना नीजी घर मान लेते है। संसार के सामानों व रिश्तेदारो के मोह मे अपना मन फँसा लेते है। वे ही जन संसार को छोड़ते वक्त बहुत दुःखी होते है, क्योकि माया व माया के सामान आज तक न किसी के बने है न बनेगे, न किसी के साथ गये है न जायेगे। हजारों बड़े-बड़े राजा महाराजा सभी कुछ छोड़ कर खाली हाथ यहां से चले गए। जैसे इन पक्तिंयो से स्पष्ट होता है –
।। दोहा ।।
मुहैय्या गो के  सब सामान, मुल्की  और  माली थी ।
सिकन्दर जब दुनिया से गया, दोनों हाथ खाली थे ।।

      इससे स्पष्ट है कि काल बली के आगे मनुष्य की धन-सम्पत्ति अथवा बाहुबल कुछ काम नही कर सकता। बड़े-बड़े शूरवीर भी उसके आगे झुक जाते है। 

Leave a Reply

Your email address will not be published.