जब राजा विक्रामादित्य ने देखा महाकाल को


      चक्रवर्ती सम्राट विक्रामादित्य जिनके शुभ नाम से चिरकाल से आद्योपरान्त सम्वत् प्रणाली चली आ रही है । यह धर्मात्मा, सदाचारी व प्रजावत्सल थे । इन्ही पवित्र गुणो ने इनका नाम आज तक अमर बना रखा है । यह अहर्निश इसी चिन्ता मे डूबे रहा करते थे कि समूची प्रजा के किसी भी जन को कोई कष्ट न होने पाए । यह अन्य राजाओ की न्यायी विलासप्रिय न होकर प्रजा के हितचिन्तक थे वैसे भी देश सम्राट का कर्त्तव्य हो जाता है कि प्रजा को वह सन्तानवत् समझे ।

      एक दिन राजा विक्रामादित्य प्रातः चार बजे कृषक वेष धारण कर परिभ्रमण हेतु नगर में निकले । घूमते घूमते वह एक जंगल मे जा निकले । सामने से एक रीछ आता दिखाई दिया और इनके आगे से होकर चलने लगा । उस रीछ ने राजा को नही देखा था लेकिन राजा की दृष्टि रीछ पर पड़ गई । वह रीछ के पीछे हो लिए । थोड़ी दूर आगे चलकर क्या देखते है कि वह कुछ आगे चलने के पश्चात मिटटी मे लोट पोट होने लगा और तत्काल ही एक बीस वर्षीय नवयुवती बनकर निकट ही एक कुँए पर जा बैठी । यह निराला कौतुक देखकर राजा विक्रामादित्य ठिठक से गये । इतने मे ही कुँए पर दो सिपाही आये । वो दो भाई नौकरी से छुटटी पाकर घर को जा रहे थे । जब वे युवती के निकट से होकर निकले तब उस तरूणी ने बड़े भाई से पूछा – आपके पास खाने को कुछ पदार्थ है ?
     बड़ा भाई – जी नही ।
     इस पर युवती ने कटाक्ष मारते हुए कहा – मुझे बड़ी भूख लगी है ।
     उसके पुनः आग्रह करने पर बड़ा भाई उसके हाव भाव पर मुग्ध हो गया और कहने लगा – यदि आप कहे तो निकटवर्ती गांव से खाने को कुछ ले आऊँ ?
     युवती – आपको इतना कष्ट दूँ ।
     बड़ा भाई चुकी उस पर मोहित हो चुका था । अतः प्रसन्नतापूर्वक उत्साहित होकर कहने लगा – आपके लिए कैसा कष्ट ।
     युवती – अच्छा, तो फिर ले आओ ।
     उसके कहने पर बड़ा भाई समीपवर्ती गांव की और चला गया । बड़े भाई के चले जाने पर युवती छोटे भाई को निकट बुलाकर कहने लगी – मै तुझे चाहती हूँ ।
     इस पर छोटे भाई ने बड़े आदर से कहा – मेरे प्रति आप ऐसी अनुचित बात कहने का कष्ट मत किजिये क्योकि आपने मेरे बड़े भाई के साथ संकेत मे वचन कर लिया है इसलिए आप अब मेरे लिए भावज तुल्य है ।
     युवती बड़े नादान प्रतीत होते हो ।
     छोटा भाई – क्यो ?
     युवती – अच्छा, तो बताओ तुम्हारे बड़े भाई की उम्र कितनी है ?
     छोटा भाई – पच्चास वर्ष ।
     युवती – और … तुम्हारी ?
     छोटा भाई – पैतींस वर्ष ।
     युवती – अच्छा, तो फिर मेरी उम्र ?
     छोटा भाई – आप ही जाने ।
     युवती – फ़िर भी अपनी बुद्धि से कुछ तो बताओ ?
     छोटा भाई – होगी कोई बीस साल की ।
     युवती – अब तुम्ही बताओ कि बीस वर्षीय पैतींस वर्ष के युवक को वरेगी या पचास साल के बूढ़े को ?
     यह सुनकर छोटा भाई निरूत्तर हो गया । तब युवती ने कहा – मै जैसा कहूँ तुम वैसा करो अर्थात्  शीघ्र ही मेरे साथ यहाँ से भाग चलो ।
     छोटा भाई – नही, ऐसा हरगिज न होगा क्योकि आप मेरी माता के समान है ।
     युवती यदि तुम मेरा कहना न मानोगे तो मारे जाओगे ।
      भाई – चाहे कुछ भी हो, मुझे इस की परवाह नही ।
      उसके इन्कार करने पर इसने त्रिया चरित्र का अभिनय इस प्रकार प्रस्तुत किया कि – उसने अपने बाल खोल दिये, जहां तहां से कुछ वस्त्र फाड़ लिये और आँचल मे मुँह ढ़क कर जोर जोर से रोने लगी ।
      इतने मे बड़ा भाई खाद्य सामग्री लेकर वहाँ आ पहुँचा और युवती की और बढ़ाते हुए बोला – यह लो, खाओ और अपनी क्षुधा शान्त करो ।
      वह ढ़ाहे मारती हुई बोली – भोजन को डाल दो कुँए मे और तुम भी पड़ो कुएँ मे ।
      वह अति विस्मित हो पूछने लगा – ऐसा क्यो, क्या बात है ?
      तब युवती ने छोटे भाई पर लाँछन लगाते हुए अनुचित बातें की जिसे सुन बड़ा भाई आग-बबूला हो उठा – क्यो भाई! ऐसी हरकत ?
      छोटा भाई – भाई साहब! मैने कुछ भी नही किया ! यह असत्य बोलती है ।
     
      बड़ा भाई – हूँ … तू सच्चा है यह झूठी ।
      बड़ा भाई – और … यह बिना कारण ही रोती है, ऐसा मै कैसे मान लूँ ?
      छोटा भाई – मै क्या जानूँ भ्राता जी !
      पर बड़े भाई ने आपे से बाहर होकर छोटे भाई को अपशब्द कहे । तब छोटे भाई ने नम्रता से कहा – देखो भाई साहब ! गाली न दो – गाली में विष बसता है ।

।। दोहा ।।
 आवत गारी एक है, उलटत होए अनेक ।
कह कबीर न उलटिये, हो रहे एक की एक ।।

      यह सुन बड़ा भाई रोष से भर गया और उसने म्यान से तलवार निकाल ली । छोटा भाई यद्यपि था सभ्य, सुशील परन्तु वह भी बड़े भाई को देखकर क्रोध मे लाल-पीला हो गया । उसने देखा कि बेकसूर होने पर बड़ा भाई एक बदचलन और अजनबी औरत के बहकावे मे पड़कर मुझे धर्मभ्रष्ट समझ रहा है । अस्तु उसने भी तलवार संभाली ।
      दोनों लड़ने लगे और तलवारें चलने लगी । थोड़ी देर मे दोनों धराशायी होकर सदा के लिए सो गये । यह देख युवती हँसी और मिट्टी मे लोट-पोट होकर तत्क्षण एक बड़े साँप के रुप मे परिवर्वित हो गई । सर्प आगे को रेंगने लगा । यह अचम्भा देख राजा विक्रामादित्य ने उसका पीछा किया । थोड़ा आगे चलने पर एक नदी आई । जिसमे एक बड़ी नाव थी, और काफी संख्या में मनुष्य सवार थे । जब वह नाव बीच धारा मे पहुँची तो सांप नदी मे कूद पड़ा और तैरता हुआ तत्काल ही नाव के पास जा पहुँचा । (शेर, सुअर और सांप पानी की धार काटकर पानी मे सीधा तैरते है) इस सांप ने नाव के पास पहुँचते ही उछाली भरी और नाव मे जा गिरा । सर्प को देखते ही नाव मे बैठे लोग सहम गये और भय के कारण सांप से हटकर एक और खड़े हो गए । एक और सारा भार होने से नाव उलट गई जिससे सभी व्यक्ति नदी की भेंट हो गये । अब वह सांप नदी से बाहर आया और लगा मिट्टी मे लोटने । सम्राट् ने सोचा – अजीब तरह की लीला है । यह कुछ समझ नही आती । अब की बार वह वृद्ध ज्योतिषी बन बैठा । सफेद दाढ़ी, ललाट पर लम्बा तिलक, हाथ में पत्रा, पैर मे पादुका । सम्राट ने दौड़कर उनके पांव पकड़ लिये, यह देख ज्योतिषि ने हैरानी से पूछा – तुम कौन हो ?
      सम्राट – मै एक राजा हूँ ।
      ज्योतिषि – तुम क्या चाहते हो ?
      सम्राट – मै आज प्रातः से जब कि आप रीछ के रूप मे थे, आपके पीछे पीछे चला आ रहा हूँ । उसके बाद आप युवती बने, फिर सांप भिन्न-भिन्न रूप धारण करके आपने जो जो काम किये वे सब मैने अपनी आँखो से देखे है और अब चौथे रूप मे आप मेरे सामने है । 
      ज्योतिषी – अच्छा, तो तुम क्या पूछना चाहते हो ?
      सम्राट – बस, यही की आप कौन है ?
      ज्योतिषी – तुम व्यर्थ इस झंझट मे न पड़ो और अपना रास्ता नापो ।
      सम्राट – नही, महाराज ! जब तक आपका पूरा परिचय ज्ञात न कर लूँगा तब तक एक पग भी आगे न धरूँगा ।
      यद्यपि ज्योतिषी ने अपना परिचय देने से साफ किया परन्तु राजा के बार-बार आग्रह करने पर ज्योतिषी ने कहा – यदि आप जानना चाहते है तो सुनो मेरा नाम ‘महाकाल’ है और मै लोगों के संहार के कार्य मे सतत लगा रहता हूँ ।
      सम्राट (आश्चर्य से) – तो क्या आप जिसे चाहते है उसे मार डालते है ?   
      ज्योतिषी – नही, मै स्वंतत्र नही हूँ अपितु मै परमात्मा का एक तुच्छ सेवक हूँ । परमात्मा सम्राट है, प्रारब्ध प्रधानमंत्री और मै उनका कर्मचारी हूँ । प्रधानमंत्री की आज्ञा से ही मै मारने योग्य पात्रो को पहचानता हूँ ।
      सम्राट – अच्छा महाकाल जी! यह तो बताओ, मेरी मौत कब आयेगी ?
      महाकाल – यह बताने की मुझे आज्ञा नही । वैसे तुम अभी बहुत समय तक जीवित रहोगे तथा ईश्वर तुम्हारे द्वारा परोपकार के अनेक करवायेगे । अतएव तुम भी ईश्वराधीन हो और मै भी ।
      सम्राट – फिर भी आप इतना तो बतलाने की कृपा करे कि मेरी मौत कैसे होगी ?
      महाकाल – छत से गिरकर । जिस दिन तुम छत पर से रपट जाओगे उस समय समझ लेना कि महाकाल का बुलावा आ गया ।
      सम्राट – अब आप किस जीव की घात मे है ?
      महाकाल – यह तुम्हारे अधिकार से बाहर का प्रश्न है ।
      सम्राट – आपने रीछ बन कर क्या किया था ?
      महाकाल – एक व्यक्ति की पेड़ पर से गिर कर मृत्यु होनी थी तो इसीलिए मै उसे पेड़ पर से गिराने के लिए रीछ बना और उसे वृक्ष से गिराकर हमेशा के लिए सुला दिया ।
      सम्राट – आप विभिन्न प्रकार के रूप क्यो धारण करते हो ?
      महाकाल – जिस व्यक्ति की जिस रूप मे मौत लिखी होती है उसको मै उसी बहाने से मार देता हूँ । जैसे कहावत भी है – हीला रिजक, बहाने मौत ।
      सम्राट – तो इसका अभिप्रायः यह है कि आपके कराल हाथो से कोई जीव भी नही बच सकता है ?
      महाकाल – बच सकते है, जो भाग्यवान् जीव संसार मे मानव जन्म लेने के उद्देश्य को समझ कर सांसारिक मोह-बन्धन मे नही बँधते और पूर्ण सन्त महापुरूषो की पावन शरणागति ग्रहण कर एवं उनसे नाम उपदेश ले कर मन-क्रम-वचन द्वारा निश्चल प्रेम-भक्ति मे अपने मन को रंग कर उनकी आज्ञा पालन मे तत्पर रहते है । ऐसे प्रभु-प्रेमियो के समक्ष मेरी एक भी नही चलती उनके तो निकट जाने से भी मै थर थर काँपता हूँ । जैसे बिल्ली अपने बच्चों को अपने मुँह मे सुरक्षित रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचा आती है वैसे ही उन प्रभु प्रेमियो के लिए मै ही दयावान् रूप धारण कर हर प्रकार से सुरक्षित कर सुखपूर्वक उन्हे मालिक के धाम मे पहुंचा आता हूँ । जैसा इन पक्तियो से स्पष्ट है –

      सम्राट – (आश्चर्यमयी मुद्रा बनाकर) कृपया आप अब मुझे यह बतलाने का कष्ट करे कि क्या करने से मौत के समय यम-किंकरो द्वारा दी गई प्रताड़नाएँ सहन नही करनी पड़ती ?
      महाकाल – यह तो मै आपको पहले ही बता चुका हूँ कि शरीर द्वारा कोई भी मेरे प्रहार से बच नही सकता, लेकिन अन्तर केवल इतना होता है कि जिसके क्रम उत्तम व श्रेष्ठ होते है, जिन लोगों ने सन्त महात्माओ के संत्सग मे जाकर ज्ञान की प्राप्ति की होती है, जो अपने मन की चित्तवृत्ति को स्त्री-पुत्र की मोह-ममता मे नही लगाते, जो मन मे धन का प्यार न रखकर अपने धन को दान-पुण्य एवं उपकार के कार्यो मे लगाते है । जो मनुष्य अपने इष्टदेव सतगुरू द्वारा प्रदत्त सच्चे नाम की कमाई करके भक्ति रूपी सच्चे धन को संचित करते है और अपने शरीर को नाशवान व क्षणभंगुर समझकर उसमे आसक्त नही होते । ऐसे ज्ञानीजन मरते समय दुःखी नही होते । इतना सदुपदेश देने के पश्चात, महाकाल ने कहा – अच्छा, तो अब मै चलता हूँ । 
      सम्राट – मै आपको प्रणाम करता हूँ तथा आपने अपने विषय मे जो मुझे पूर्ण परिचय दिया है उसके लिए मै आपका अतिशय धन्यवाद करता हूँ, आपके संयोग से मुझे बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त हो गया है ।
      तदुपरान्त महाकाल ने वहाँ से विदाई ली और राजा विक्रामादित्य अपने महल मे लौट आये ।                   

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