चार बत्तियों की कहानी

   

      एक लोभी व्यक्ति जिसे की सदैव धन पाने का लालच लगा रहता था । जब अथक परिश्रम करने पर भी उसे कही से धन प्राप्त न हुआ हो तो अन्त मे वह किसी एक महात्मा जी की सेवा मे जा उपस्थित हुआ और लगातार कुछ समय तक उनकी सेवा करता रहा । एक दिन उन महात्मा जी ने प्रसन्न होकर इससे पूछा – कहो, तुम्हे किस वस्तु की इच्छा है ?
      ‘अन्धा क्या चाहे दो आँखे’ लोभी ने अपने लोभ का सवाल किया – महाराज! यदि आप मुझे प्रसन्न होकर कुछ देना ही चाहते है तो केवल इतनी प्रार्थना है कि मुझे बहुत सा धन प्राप्त हो जाए ।
      कितनी अज्ञानता भरी है इस लोभी व्यक्ति मे कि जिसने महात्मा जी से प्रेम भक्ति मांगने की अपेक्षा धन प्राप्ति की विनय की । जो साधु सन्तो के पास दुनियावी इच्छाओ की पूर्ति के लिए जाते है, विचारवानों की दृष्टि मे उनकी समझ-बूझ पर मानो पत्थर पड़े हुए है । यह तो सबको विदित है ही कि जिस वस्तु का जो केन्द्र होगा, वहां से वही वस्तु प्राप्त की जा सकती है । जैसे – वैद्य से औषधि, धनाढ्य से धन व देश के राजा से पदवी की माँग करने पर उसे प्राप्त किया जा सकता है । इसी प्रकार सन्त सत्पुरूषो से प्रेम भक्ति का खजाना ही प्राप्त किया जाना चाहिए । अतः महापुरूषो के वचनानुसार उन से जीव को किसी प्रकार की सांसारिक वस्तुओ की प्राप्ति की माँग न करके निष्काम प्रेम भक्ति तथा अपनी आत्मिक उन्नति का साधन पूछना चाहिए । जिज्ञासु का यह कर्त्तव्य है कि वह सन्त सत्पुरूषो के पावन दर्शन व उनके सत्संग को श्रवण करे तथा हितचित्त से सेवा करके उनसे विमल भक्ति का दान मांगे । परन्तु देखने मे प्रायः अधिकतर यही बात आती है । जैसा की परमसन्त श्री कबीर साहिब जी ने अपने शब्दो मे कहा है –
।। शब्द ।।
ऐसी दीवानी दुनिया, भक्ति भाव नहि बूझे जी ।।
कोई आवे तो बेटा माँगे, यही गुसाई दीजै जी ।।
कोई आवे दुःख का मारा, हम पर किरपा कीजै जी ।।
कोई आवे तो दौलत माँगे, भेंट रुपया लीजै जी ।।
कोई करावे ब्याह सगाई, सन्त गुसाई रीझे जी ।।
 साँचे का कोई गाहक नाही, झूठे जगत पतीजै जी ।।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, इन अंधो को क्या दीजै जी ।।

      सो, हमारा प्रसंग चल रहा था कि धन प्राप्ति के लिए उस व्यक्ति के लिए अत्यधिक दृढ़ विचार देखकर महात्मा जी ने उसे चार बत्तियां देते हुए कहा – बेटा! अर्द्धरात्रि के समय इनमे से एक बत्ती जलाकर तुम पूर्व दिशा की और चल देना और चलते-चलते जहां वह बत्ती बुझ जाए वही रूक जाना तथा उस स्थान को खोदना । वहां से जो कुछ मिले ले लेना और उसी पर सन्तुष्ट होकर निर्वाह करना । यदि उस धन से भी तुम्हे तृप्ति न हो तो उसी प्रकार दूसरी बत्ती जलाकर दूसरे दिन दक्षिण दिशा की और चल देना । जहां वह बत्ती बुझे वही जमीन खोदने पर तुम्हे जो कुछ प्राप्त हो उसी पर सन्तोष करना और यदि उस पर भी तुम्हे सन्तोष न हो तो तीसरे दिन तीसरी बत्ती लेकर पश्चिम दिशा की और जाना और वहां से जो कुछ भी मिल जाए वही तेरे लिए काफी होगा । लेकिन चौथी बत्ती बिल्कुल न जलाना और न ही उत्तर दिशा की और जाना, अगर हमारा कहना नही मानेगा तो तुझे बहुत कष्टो का सामना करना पड़ेगा ।
      महात्मा जी से बत्तियां लेकर वह व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक घर लौट आया । आधी रात के समय एक बत्ती जलाकर पूर्व दिशा की और चल दिया और जहां वह बत्ती बुझी वही रूक कर धरती खोदने लगा । यहां उसे तांबे की कान प्राप्त हुई । लेकिन इससे लोभी व्यक्ति को कुछ प्रसन्नता प्राप्त न हुई । बल्कि वह तांबे की कान को पूर्ववत् दबा कर तथा उस पर निशान लगाकर घर लौट आया । सोचा कि फिर कभी आवश्यकता पड़ने पर निकाल लूँगा ।
      दूसरी रात्रि को दूसरी बत्ती जलाकर वह दक्षिण दिशा की तरफ गया । कुछ दूर जाने पर बत्ती के बुझ जाने पर जब उसने जमीन खोदी तो वहां से चाँदी की कान निकली परन्तु यहां भी उसकी तृप्ति न हुई और उसे दबा कर निशान लगाकर वहां से लौट आया ।
     तीसरी रात्रि मे तीसरी बत्ती जलाकर पश्चिम दिशा की और गया । जहां वह बत्ती बुझी तो उसने धरती खोदनी आरम्भ कर दी । यहां पर उसे झिलमिलाती स्वर्ण की कान मिली । सोने की कान को देखकर मन मे प्रसन्न होकर सोचने लगा कि एक से बढ़कर एक अमूल्य वस्तु कान मे से निकल रही है । अतः चौथी कान में अवश्य इससे बढ़कर कोई मूल्यवान हीरे जवाहरात आदि होगे । लोभ ने उसकी बुद्धि मलीन कर दी । मन मे कहने लगा – देखूँ तो सही चौथी तरफ से क्या प्राप्त होता है ? महात्मा जी ने उसे कष्ट व पश्चाताप वाली बात कही थी वह नितांत भूल ही गया । इतना सोच उसने सोने की कान पर निशान लगाकर उसे पूर्ववत् दबा दिया और वापस घर लौट आया ।
      चौथी रात को चौथी बत्ती जलाकर वह उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा । चलते चलते जहां बत्ती बुझी तो वहां पर ही पृथ्वी खोदने लगा । कुछ जमीन खोदने पर उसे नीचे की तरफ एक अति सुन्दर दरवाजा दिखाई दिया । जब वह दरवाजा खोला तो उसे वहां एक गुफा सी दिखाई दी । जिसके चारों और एक सुन्दर बगीचा था और साथ ही एक कमरा भी । जिसे की बाहर से साँकल लगी हुई थी । जब साँकल खोल कर उसने अन्दर प्रवेश किया तो भीतर जो एक अन्य व्यक्ति पहले से ही बैठा हुआ था, दरवाजे के खुलते ही अन्दर वाला व्यक्ति बाहर निकल आया और दरवाजे पर पूर्ववत् साँकल चढ़ाते हुए उस धनलोलुप से कहने लगा – मै भी धन के लोभ के कारण ही यहां कब से कैद पड़ा था, अब तुम भी उस समय तक यही रहना जब कि तुम्हारे से ज्यादा तृष्णा वाला कोई व्यक्ति आकर तुम्हे न छुड़ाए ।

      अर्थात् इस लोभी व्यक्ति ने तो अपने मन मे यह ठानी हुई थी कि अत्यधिक धनराशि को पाकर मै बहुत सुखी हो जाऊँगा । चूँकि यह पारमार्थिक विचारों व भक्ति के गूढ़तम रहस्यो से नितान्त अनभिज्ञ था ।
      चूंकि महात्मा जी उस लोभी व्यक्ति की तृष्णा से परिचित थे । दूरदर्शी होने के नाते वे इस बात को भी समझ रहे थे की, हमने इस व्यक्ति को चौथी बत्ती जलाने से सख्त मना किया है लेकिन यह मानेगा नही, क्योकि इस पर धन का लालच बुरी तरह सवार हो रहा था अर्थात् महात्मा जी के वचनों को उसने न माना और चौथी बत्ती जलाकर ‘आ बैल मुझे मार’ वाली कहावत चरितार्थ कर आजीवन कैद खरीद ली ।
      लोभी व्यक्ति के कैद हो जाने पर उसके उद्धार के लिए वे महात्मा जी वहां आते है । पद-आहट पाकर भीतर से लोभी व्यक्ति को कुछ सांत्वना हुई कि अब मुझे छुटकारा मिल जायेगा । महात्मा जी ने कहा – प्रेमी ! अब तो तुमने जी भर कर धन प्राप्त कर लिया होगा ?
      लोभी व्यक्ति भीतर से ही रूदन करता हुआ प्रार्थना करने लगा – ‘प्रभु! मैने स्वय ही अपने पैर पर कुल्हाड़ा चलाया है, जो आपके वचनों का उल्लंघन करके मनमति से धन के लोभ मे फँसकर अनुचित कर्म कर लिये जिसका कुपरिणाम अब मै देख पा रहा हूँ।’
      जब महात्मा जी ने उसका बहुत आर्त्तनाद सुना तो उससे न रहा गया । उन्होने तत्काल ही द्वार पर लगी साँकल खोल दी । आते ही महात्मा जी के चरणों मे गिर पड़ा । अब उनकी वाणी पर एक ही रट लगी हुई थी कि अब तो भगवन् ! मुझे क्षमा कर दो । मैने बहुत अपराध किया । मै आपके इस महान् उपकार का बदला किसी जन्म में नही दे सकता (क्योकि उसके कान मे पहले वाले लोभी व्यक्ति के शब्द गूँज रहे थे कि अब तुझे वही व्यक्ति छुडायेगा जो तुझ से बढ़कर लोभी होगा) जो कि आपने इस कारावास से मुझे छुड़ा दिया । मै आपका आजीवन ऋणी बना रहूँगा । भगवन् ! अब तक जो हुआ सो हुआ, अब मुझे आप जैसा कहेगे – आपके चरणों मे रहकर व श्री वचनों पर आचरण कर अपना शेष जीवन बिताऊँगा क्योकि धन के लालच के भयावह परिणाम ने अब मेरी आंखे खोल दी है ।
      तब महात्मा जी ने उसे उठाकर व आर्शीवाद देते हुए धैर्य बधाया । पश्चात दोनों आश्रम पर आए और वह व्यक्ति महात्मा जी के साथ ही आश्रम पर रहकर सत्संग व सेवा का लाभ प्राप्त करने लगा । कुछ समय बीत जाने पर जब महात्मा जी ने उसे भक्ति पथ पर चलने योग्य समझा तब उसके जिज्ञासा प्रकट करने पर उसे सच्चे नाम व शब्द की दीक्षा दी जिस पर नित्यप्रति आचरण कर वह लोभी व्यक्ति अपना जीवन आदर्श बनाकर आगामी लोगों के लिए उच्च प्रमाण उपस्थित कर गया ।               

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