चन्द्रगुप्त मौर्य

      उस समय यूनानी सम्राट सिकन्दर अपनी विजय-पताका फहराकर भारत से लौट चुका था। सिन्ध, पंजाब तथा सीमा प्रदेश का शासन उसने अपने यूनानी अधिकारियो के हाथ मे दे रखा था। विदेशी अधिकारीयो का शासन अत्याचारपूर्ण था। प्रजा अत्यन्त दुःखी व परेशान थी। सिकन्दर के आक्रमण का विरोध करने मे भारतवासी सफल भले ही न हो सके लेकिन उनके मन मे अपने देश को स्वतन्त्र कराने की इच्छा बराबर बनी रहती थी। यूनानी आधिकारियो के अत्याचार से विरोध की यह आग और भी भड़क उठी। उनको आवश्यकता थी तो केवल एक ऐसे नायक की, जो इन्हे दिशा निर्देश दे सके ओर उनका पथ प्रदर्शक बन सके। संयोगवश चन्द्रगुप्त मौर्य जैसे साहसी और महत्तवकांक्षी युवक का इन्हे नेतृत्व मिल गया।
      चन्द्रगुप्त मौर्य ने भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वालो को संगठित कर एक सेना का निर्माण किया। सेना की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य ने यूनानियो को भारत भूमि से बाहर निकाल दिया और अपनी राजसत्ता स्थापित की। इस विजय से चन्द्रगुप्त मौर्य मे विश्वास और उत्साह का जन्म हुआ। फलस्वरूप उसने एक विशाल सेना संगठित की और मगध साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। युद्ध मे चन्द्रगुप्त मौर्य को विजय प्राप्त हुई। मगध का शासक नन्दराजा धनानन्द युद्ध मे मारा गया और चन्द्रगुप्त मौर्य मगध की राजधानी पाटलिपुत्र के सिहासनं पर बैठे।
     चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तर भारत पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के पश्चात यह अनुभव किया कि सम्पूर्ण देश को एक सूत्र मे बाँधने के लिए दक्षिण भारत पर भी विजय प्राप्त करना आवश्यक है। धीरे धीरे बंगाल तथा मालवा आदि पर चन्द्रगुप्त ने अपना अधिकार कर लिया। चन्द्रगुप्त मौर्य का अन्तिम संघर्ष सिकन्दर के सेनापति सेल्युकस के साथ हुआ। यूनानी और भारतीय सेना मे घमासान युद्ध हुआ जिससे चन्द्रगुप्त की विजय हुई। अपनी पराजय मानकर सेल्यूकस को चन्द्रगुप्त से सन्धि करनी पड़ी। सन्धि को दृढं बनाने के लिए सेल्यूकस ने अपनी पुत्री का विवाह भी चन्द्रगुप्त मौर्य से कर दिया। और मेगस्थनीज नामक एक राजदूत भी चन्द्रगुप्त के दरबार मे भेजा। चन्द्रगुप्त ने भी 500 हाथी उपहार स्वरूप दिये। इस प्रकार चन्द्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य पशिचम मे मध्य एशिया से पूर्व मे बंगाल तक उत्तर मे हिमालय पर्वत से दक्षिण मे कृष्णा नदी तक फैल गया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने बाहुबल और अदम्य साहस से भारत मे राजनैतिक एकता स्थापित की।
      जैन जनश्रुति के अनुसार चन्द्रगुप्त एक ऐसे गाँव के प्रधान की कन्या के पुत्र थे जहाँ मयूर – पोषक निवास करते थे इस कारण उनका वंश ‘मौर्य वंश’ कहलाया। बौद्ध धर्म के अनुसार नेपाल की तराई मे पिप्पलिवन नामक एक स्थान था। यहाँ क्षत्रिय जाति के लोग निवास करते थे, इन्हे “मौरिय” कहा जाता था। चन्द्रगुप्त के पिता इसी जाति के प्रधान थे। जिनकी किसी शक्तिशाली राजा द्वारा हत्या कर दी गई थी। अपने पुत्र को सुरक्षित रखने के लिए इसकी माता अपने सम्बन्धियो के साथ कही अन्यत्र चली गई और राजवंश से गुप्त रखा। कालान्तर में कौटिल्य (चाणक्य) नामक ब्रह्मण की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य की शिक्षा-दीक्षा पूरी हो सकी।
      चन्द्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य का शासन प्रंबध अत्यन्त सघठित था। उन्होंने जिस शासन प्रणाली को अपनाया। वह भारत के भावी शासको के लिए आदर्श बन गई। शासन व्यवस्था मुख्यत तीन भागो मे विभक्त थी – केन्द्रीय शासन, प्रान्तीय शासन और स्थानीय शासन। शासन की सर्वोच्च शक्ति सम्राट के हाथ में थी लेकिन प्रजा का अधिक से अधिक कल्याण करने के उददेश्य से मन्त्रियो, परामर्शदाताओ तथा अन्य पदाधिकारियो की व्यवस्था थी। शासन विभिन्न विभागो द्वारा चलाया जाता था। प्रत्येक विभाग के प्रमुख को “अमात्य” कहा जाता था। आन्तरिक शान्ति एव व्यवस्था के लिए पुलिस का प्रबन्ध था। पुलिस के सिपाही को “रक्षिन” कहा जाता था।
      चन्द्रगुप्त मौर्य अपनी प्रजा की उन्नति के प्रति सदैव प्रत्यनशील रहते थे। उन्होने यातायात के साधनो की समुचित व्यवस्था की।सड़को के किनारे छायादार वृक्ष लगवाये, कुएँ तथा धर्मशालाएँ बनवायी। सिंचाई हेतु अनेक तालाब और कुएँ खुदवाये। उस समय उनके साम्राज्य की ‘सुदर्शन झील’ बहुत प्रसिद्ध थी। रोगियो की चिकित्सा के लिए अनेक औषधालय खुलवाए। भोजन सामग्री की शुद्धता की जाँच हेतु निरीक्षक थे। शिक्षा के प्रचार एवं प्रसार हेतु उसने शिक्षालयो की स्थापना की। शिक्षा व्यवस्था का दायित्व सीधे प्रधानमंत्री का था।
      यूनानी राजदूत मेगस्थनीज ने अपनी पुस्तक “इण्डिका” मे चन्द्रगुप्त मौर्य की राजधानी पाटलिपुत्र का बडा विशद वर्णन किया है। इस काल मे भारत का बहुमुखी विकास हुआ। कृषि, व्यापार एवं ललित कला आदि के सम्यक विकास हेतु शासन द्वारा अनेक सुविधाएँ दी जाती थी। उस समय प्रजा की नैतिकता उच्चकोटि की थी। उस काल की शासन व्यवस्था वस्तुतः एक आदर्थ थी। लगभग 24 वर्ष राज्य का सफल संचालन करने के पश्चात सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र बिन्दुसार को शासन का कार्यभार सौंप दिया और स्वयं कुछ वर्ष साधक के रूप मे जीवन व्यतीत करने हेतु जैन मुनि भद्रवाहु के साथ चन्द्रगिरी पर्वत पर रहे। यही 298 ई. पू. मे उनका निधन हो गया।

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