ग्रामोत्थान का आधार स्वावलम्बन

      भारत का विकास व इसकी समृद्धि, गाँवो के विकास-समृद्धि तथा स्वावलम्बन पर निर्भर करता है, क्योकि भारत कृषि प्रधान देश है। गाँधी जी ओर विनोबा जी के अनुसार ‘भारत की आत्मा गाँवो में बसती है।’ कृषि उत्पादन पर ही देश की अर्थ व्यवस्था  निर्भर है।
     हमारे देश में बहुराष्ट्रीय कंपनियो के प्रवेश को 10-12 वर्ष हो चुके है। हम अनेक प्रकार के प्रतिबधो व शर्तो को समाप्त कर या उदार बनाकर विनियोग के माध्यम से उनके पैर व्यापार, उद्योग, चिकित्सा, कृषि आदि क्षेत्रो मे फेलते जा रहे है,जिसका प्रतिकुल प्रभाव हमारी अर्थ व्यवस्था पर पड़ रहा है।
परन्तु इस समस्या को देख घबराने की आवश्यकता नही है,
      सोचना है कि इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के पैर को कैसे रोके। पं. श्रीराम शर्मा जी एवं अन्य ऋषि मुनियो के अनुसार भारत जगतगुरू बनने जा रहा है।
बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अभी शहरो के चौथाई, हिस्से मे ही अपना पैर जमा पाई है, ग्रामीण क्षेत्रो मे भी उनके पैर, पसारने की संभावना है इसलिए आवश्यक है कि हम अपने गाँवो को अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओ के लिए स्वावलंम्बी बनाएँ।

      अतः आज का वास्तविक स्वतंत्रता संग्राम है, गाँव स्वावलंबी बने। यह संग्राम हर गाँव हर खेत व हर घर मे लड़ा जाना चाहिए। हमे अपने गाँवो को खाद्य सामग्री (अनाज, तेल, शाक-भाजी, बेकरी के विभिन्न उत्पाद आदि) कपडे, रोज मर्रा के सामान (जूते, पठन-पाठन की सामग्री आदि) तथा चिकित्सा (स्थानीय जडी-बूटी, गोबर-गोमूत्र एवं प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा) के लिए आत्मनिर्भर बनाना अति आवश्यक है। ताकि हमारे गाँव अपने आप मे स्वावलंबी बन सके और गरीबी दूर हो सके। इन उद्योगो के लिए प्राशिक्षण की व्यवस्था कर उत्पादन प्राप्त किये जा सकते है। यही हमारी वास्तविक स्वतत्रतां होगी

शहरो का अस्तित्व गाँव की खुशहाली मे
      नई अर्थनिति के अनुसार यदि ओघोगिक पूंजीवाद मे भारतीय गाँवो का भविष्य ठीक नही है तो प्रश्न उठता है कि क्या इससे शहरो का कोई अच्छा भाविष्य दिखने वाला है?
      आय दिन शहरो की समस्या भी गंभीर होती जा रही है। जो शहर कुछ लाख आबादी वाले थे वे 20-30 लाख तक होते जा रहे है, इसके फलस्वरूप उसकी आवश्यकताओ को पूरा कर पाना नगर निगम के लिए अंसभव होता जा रहा है। बिजली पानी, मकान की दिक्कत, बढते यातायात की घिचपिच व प्रदूषण से वातावरण नरक होता जा रहा है,आज की स्थिति मे शायद ही कोई शहर साफ सुथरा हो, शहरो मे गाँव से भागती आबादी का दबाव बढता जा रहा है, जो शहरो को गंदा तथा बदसूरत बनाता है। जिसके कारण अन्याय समस्याओ के साथ अपराधो में भी निरन्तर बढोतरी हो रही है
      इससे स्पष्ट है कि अगर देश के गाँवो को सुखी नही रखा गया, तो देश के शहर भी सुखी नही रह पाएँगे। इस पीड़ा के चलते पूरा देश (भयावह) समस्या से ग्रस्त हो जायेगा, अतः जरूरी है कि समय रहते इस पर विचार कर शहरो के साथ गाँवो का विकास भी किया जाए। शहरो मे नये खुलने वाले शिक्षण संस्थान, स्वास्थ्य केन्द्र, उद्योग आदि अन्य सुविधा वाले सस्थानों को सुदूर ग्रामीण इलाको मे खोला जाये ओर गाँवो मे आवागमन की सुविधा बढाई जाये। इससे शहरो की ओर दबाव कम होगा ओर राष्ट्र सशक्त तथा सम्पन्न बनेगा। ग्रामीण युवाओ को रोजगार मिलेगा तो बेरोजगारी घटेगी ओर ग्रामीण जन परिवार भी खुशहाली का जीवन जी सकेगा। इसके लिए सरकार, संस्थानें तथा राष्ट्र नायको को चिन्तन कर रोजगारपरक सस्ती, सुलभ एवं रूचिकर योजना बनानी व क्रियान्वित करानी होगी तभी ग्राम उत्थान का सपना सच हो सकेगा ओर भारत के महान होने का सपना साकार हो सकेगा।

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