गोस्वामी तुलसीदास

      गोस्वामी तुलसीदास जी के नाम व जीवन से सभी जन-साधारण परिचित तो होगे ही जो कि – ‘रामचरितमानस’ के रचियता है। इस ग्रन्थ से आज भी समस्त संसार भक्ति, सच्चाई, निति एवं धर्म की शिक्षा ग्रहण कर रहे है।
      वास्तव मे श्री रामायण का ग्रन्थ लिख कर इन्होने भगवान् श्री रामचन्द्र जी के जीवन चरित्र व महिमा के अतिरिक्त आत्मा से सम्बन्ध रखने वाले प्रत्येक प्रकरण का अति सरल ढ़ग से उल्लेख कर जगत् पर महान् उपकार किया है।
      गोसाई तुलसीदास जी की एक आदर्शमयी घटना का यहाँ वर्णन दिया जा रहा है कि किस प्रकार यह नम्रता और दीनता से सन्त श्रेणी मे उच्च पद प्राप्त कर गये। ऐसी दीनता व नम्रता का प्रमाण और कही देखने को नही मिलता। वह प्रकरण इस प्रकार है –



 

   एक बार की वार्त्ता है कि जब सन्त नाभादास जी ने श्री भक्तमाल ग्रन्थ लिखने का पूर्ण रूप से निश्चय कर लिया तो इससे पूर्व इन्होने यह निर्णय किया कि समस्त वैष्णव साधुओ और भक्तो को एकत्रित कर भक्तमाल के विषय मे सबसे उचित परामर्श ले लिया जाये। साथ ही इन्होने एक बड़ा भारी भण्डारा कराने का भी संकल्प किया। समस्त साधुओ और भक्तो को निमन्त्रण पत्र भेजे गये ताकि कोई भी महात्मा व भक्त इस भण्डारे मे सम्मलित होने से न रह जाये। जिन-जिन को निम्नत्रण पत्र मिला सबने श्री नाभा जी के भेजे निमन्त्रण को स्वीकार कर लिया।
      उधर निश्चित दिन के लिए भण्डारे का प्रबन्ध किया जाने लगा। इस समय पर गोस्वामी तुलसीदास जी को भी निमन्त्रण पत्र मिला। यह भी वैष्णव सन्त थे। यद्यपि वैष्णवों मे जाति-पाँति का कोई भेदभाव नही माना जाता था परन्तु गोस्वामी जी को अवश्य कुछ उच्च जाति का कुछ विचार था। दूसरी बात यह कि इन्ही दिनों इनकी नवीन एवं प्रसिद्ध रचना ‘रामचरितमानस’ सम्पूर्ण होकर जन-साधारण मे सादर अपनायी जा रही थी जिसके कारण गोस्वामी जी के दिल मे अभिमान के कुछ-कुछ अंकुर फूट चुके थे। नाभा जी द्वारा भेजा हुआ निमन्त्रण-पत्र प्राप्त कर लापरवाही व अंहकार का भाव प्रकट करते हुए बोले – हुँ! भला मै एक डोम के भण्डारे मे जाँऊ ? कदापि नही।
      सन्त नाभा जी जाति-पाँति के मर्म से बहुत ऊपर उठ चुके थे। इन्हें भी गोस्वामी जी की इस अंहभावना का पता लग ही गया कि वे मुझसे किंचित घृणा कर रहे है किन्तु सन्त जी मौन रहे।
      भण्डारे के दिन निश्चित समय पर लोगो का आगमन शुरु हो गया। जिन-जिन महात्मा व भक्तो को निमन्त्रण-पत्र भेजे गये थे वे अपने साथ श्रद्धालु भक्तो को भी लाये एवं और भी अत्यधिक संख्या मे जनता सम्मलित हुई। साधुओ और भक्तो के लिए अलग से एक विशेष पण्डाल बनाया गया था – सर्व साधारण के लिए अलग ही स्थान नियत था। घास-फूँस के बड़े-बड़े झोपड़ो मे यह पण्डाल बनाये गये थे। पण्डाल के एक कोने मे भोजन-सामग्री रखे जाने एवं परोसने वालों के लिए खाली स्थान छोड़ा गया था। शेष पूरे पण्डाल मे बैठने के आसन थे। जो पण्डाल वैष्णव साधुओ के लिए निश्चित था वहाँ पूरे गिनती के आसन तथा उसी के अनुसार पत्तलो का प्रबन्ध था। जिन-जिन साधुओ को निमन्त्रण-पत्र भेजे गये थे वे साधु आसनों पर आकर बैठते गये। सबके उपस्थित हो जाने के उपरान्त समय पर पत्तलो मे भोजन परोसा जाने लगा।
      गोस्वामी जी ने निमन्त्रण-पत्र देखते ही भण्डारे मे सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया। जब गोस्वामी जी को ज्ञात हुआ कि वैष्णव सन्त व भक्त झुण्ड के झुण्ड नाभा जी के भण्डारे मे जा रहे है – यह देख-सुनकर उन्हे स्वयं पर ग्लानि सी हुई। दिल मे कहने लगे कि – मेरे भण्डारे मे न जाने पर साधु-महात्मा मेरे प्रति क्या सोचेगे कि एक तुलसीदास ही अभिमानी निकला सब लोग तो आ उपस्थित हुए है परन्तु एक यह ही नही आया। इस प्रकार मेरा अपयश होगा। मैने नाभा जी के भण्डारे मे जाने से इन्कार कर बड़ी भारी भूल की है। समस्त साधु-मण्डली के साथ भण्डारे मे सम्मिलित न होना मेरी अशिष्टता नही तो क्या है ? मन ही मन मे ऐसा सोच कर वे शीघ्रातिशीघ्र डग भरते हुए भण्डारे की और चल पड़े।
      इधर नाभा जी ने जब यह सुना कि गोस्वामी जी ने निमन्त्रण स्वीकार नही किया तो जो आसन इन्होने उनके लिए लगवाया था वह उठवा दिया। सो सीमित आसन लगाये जाने के कारण जब गोस्वामी जी पहुँचे तो उस समय वहाँ कोई आसन खाली न था जिस पर वह जा बैठते।
      पण्डाल के ठीक बीचों-बीच सामने की ओर एक ऊँचा स्थान था। जिस पर नाभा जी के गुरू सन्त ‘उगर दास जी’ के लिए बहुत सुन्दर चौकी पर आसन लगाया गया था। इस चौकी के पास ही गुरू चरणों के निकट श्री नाभा जी का आसन था। शेष साधुओ के आमने-सामने दो पंक्तियो मे आसन लगे हुए थे। जब भोजन परोसा जाने के बाद भोजन खाना भी शुरु हो चुका था कि अचानक ही पण्डाल के द्वार पर गोस्वामी जी पहुँच गये। पहुँचते ही पण्डाल मे दृष्टि दौड़ाई तो इन्हे कोई भी आसन व पत्तल खाली न दिखाई दिया। द्वार के ठीक सामने गुरू जी के आसन के समीप नाभा जी बैठे नजर आये। सब लोग भोजन करने में व्यस्त थे। इस कारण से किसी का ध्यान इनकी और न गया। यह कुछ देर खड़े हो सोचते रहे। फिर विचार हो आया कि साधु-महात्माओ का भण्डारा ही तो है। अतएव उनके चरणों मे बैठना ही उचित है।
      ऐसा सोचकर द्वार के बाहर जहाँ महात्मा जनों के जूते रखे थे वही बैठ गये। रोटी से भरी टोकरियाँ और दाल-भाजी की बाल्टियाँ उठाए परोसने वाले सेवक दोनों और की पक्तियो मे घूम-घूम कर सबको बाँट रहे थे। जब वे इनके पास से गुजरे तो इन्होने उनसे हाथ मे ही रोटियाँ ले ली तथा दाल के लिए पत्तल न होने के कारण यह तनिक असमंजस मे पड़ गये परन्तु शीघ्र ही इन्होने इस समय पर अपने कुल की मर्यादा को एक ताक पर रखते हुए नम्रता व दीनता से परिपूर्ण विशाल हदय का सबके समक्ष आदर्शमय प्रमाण प्रस्तुत किया जो इस प्रकार है –
      जब दाल के लिए इनके पास पत्तल न थी तो निकट ही जो नाभा जी का जूता पड़ा था इन्होने तुरंत ही वह जूता उठा कर उसमे दाल ले ली और उसी जूते मे खाना शुरु कर दिया। अभी दो कोर रोटी के खाकर जूते को ऊँचा कर दाल पी रहे थे कि एक दम नाभा जी की दृष्टि इन पर पड़ी क्योकि इनके ठीक सामने नाभा जी व इनके गुरूदेव का आसन था। दो बार तो यह जूते मे से दाल पी चुके थे और तीसरी बार दाल पीने के लिए जूते को ऊपर उठाया ही था कि अपना आसन छोड़ कर नाभा जी दौड़े आए और इनका हाथ पकड़ कर बोले – ‘हाय-हाय! गोस्वामी जी!! ये क्या गजब करते है आप!!! धन्य है आप। बस, अब तो रहने दीजिये। सारी की सारी भक्ति क्या आप ही समेट लेगे ? अब कुछ हिस्सा औरो के लिए भी रहने दीजिये।’ इतना कहते हुए नाभा जी ने गोस्वामी जी के हाथ से जूता छीन लिया और वही उच्छिष्ठ (जूठी) दाल स्वयं पी गए।

      इसके बाद इन्होने गोस्वामी जी का आलिंगन किया तथा उन्हें पण्डाल के अन्दर ले आए और बैठने के लिए अपना आसन दिया। साथ ही कहा – जिस व्यक्ति मे इस प्रकार उत्कृष्ट भक्ति व नम्रता हो उसका आसन ऊँचा होना चाहिये। तत्पश्चात् नाभा जी उस स्थान पर जा बैठे जहाँ पूर्व गोस्वामी जी बैठे थे। श्री गोस्वामी जी का सिर लज्जा से झुका हुआ था। उनके नेत्र जल धारा प्रवाहित कर रहे थे। उधर इनकी भक्ति, नम्रता, दीनता तथा सहदयता से प्रभावित होकर नाभा जी प्रेमाश्रु बहा रहे थे। इस अद्भुत दृश्य को सबने देखा और उन सब पर इनकी इस उत्कृष्ट भक्ति-भावना का अनुपम प्रभाव पड़ा। सबने नाभा जी व गोस्वामी जी के विशुद्ध प्रेम की अत्यधिक सहारना की। नाभा जी पर तो इस बात का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उसी समय सबके समक्ष यह उच्च विचार व्यक्त किया कि ‘हमारे भक्तमाल मे गोस्वामी तुलसीदास को ‘सुमेरू-मणि’ का पद दिया जायेगा।’ भण्डारे की समाप्ति पर सबकी वाणी पर गोस्वामी जी की नम्रता व दीनता की चर्चा थी। 
      विशेष – सुमेरू-मणि उस बड़े हीरे को कहते है जो हीरे मोतियो की माला मे रहता है तथा सबसे ज्यादा सुन्दर एवं बहुमूल्य होता है। तात्पर्य यह है कि –
।। दोहा ।।
धन छोटा पन सुख महा, धिरग बड़ाई ख्वार ।
सहजो नन्हा  हूजिये, गुरू  के  वचन  सम्भार ।।  
      भक्ति व परमार्थ के पथ पर चलने वाले जिज्ञासुओ को सन्तो और सत्पुरूषो ने छोटा बनने का उपदेश दिया है। इस रूहानी मार्ग पर चलने वाले मे जब तक नम्रता व खाकसारी नही आ जाती तब तक साधक आत्मिक धन से वंचित रह जाता है क्योकि अहंकार तो इस मार्ग का महान् शत्रु है। अतः जिसने अहं भाव का त्याग कर नम्रता व दीनता ग्रहण की वही इस भक्ति रूपी धन से मालामाल हो सकता है।

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