गुरू अर्जुनदेव जी का अद्भुत प्रंसग

      इस सृष्टि मे जब मनुष्य ने जन्म लिया तो कुदरत की तरफ से मनुष्य की आत्मा के साथ काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि लगा दिये गये, जिसे दूसरे शब्दों मे ‘पाँच चोर’ भी कहा जाता है। ये सब मनुष्य की रूह को नुकसान पहुँचाने वाले है। इन पाँचो चोरों के पजें से जीव को स्वतन्त्र कराने के लिए समय-समय पर सन्त-सदगुरू, अवतारी महापुरूषो व ऋषि-मुनियो का संसार मे आना होता है। वे अपने पावन संत्सग व रूहानी उपदेशों से जीवों को इन विकारो से बचा कर अपने साथ मिलाने का प्रत्यन करते है।

      अहंकार जिसको दूसरे शब्दो मे दर्प, गरूर, धमण्ड, गर्व व मद भी कहा जाता है। इसकी प्रकृति को समझना प्रत्येक का काम नही। अहंकार के कई रूप होते है – किसी को  धन का गर्व तो किसी को शारीरिक बल का, किसी को विद्या का तो किसी को कुल का – इन्ही बातों से मनुष्य के मन मे अहंकार उत्पन्न होता है।


      जिसका स्पष्ट प्रमाण ज्ञात करने के लिए निम्नलिखित दृष्टान्त पढ़िये –



      श्री गुरू अर्जुनदेव (पाँचवी पादशाही) जी के दरबार मे अधिकांश सिक्ख सेवा किया करते थे। प्रत्येक सेवक को अलग-अलग काम सौंपा गया था। जिसे वे हित-चित्त व श्रद्धापूर्वक संग्लन होकर करते थे। जिस समय दरबार लगता उस समय प्रथम भजन-किर्तन मे सतगुरू की महिमा के गीत गाए जाते थे। तत्पश्चात गुरू जी वचन फरमाते।
      दरबार लगते समय भजन-किर्तन की सेवा दो भाई मिरासी जाति के, एक का नाम सत्ता व दूसरे का नाम बलवन्ता था, ठीक समय पर पहुँचकर अपने कर्त्तव्य का पालन करते। काफी समय से  यह श्रद्धापूर्वक सेवा करते आ रहे थे। गुरू अर्जुनदेव जी भी इनको सम्मान की दृष्टि से देखते थे। अतः समस्त संगत भी इनका आदर करती। जिस कारण इनके मन मे अहंकार का बीज पड़ गया।
      गुरू दरबार मे सेवा करते-करते इनका यश बहुत बढ़ चुका था। इनकी एक बहन थी। जब वह युवावस्था मे पहुँची उसका उन्होने विवाह करना था। वैसे तो गुज़रान के लिए रोटी-कपड़ा, गुरू दरबार से इसके अतिरिक्त सिक्खों की और से हन्हे धन, वस्त्र, अनाज व अन्य आवश्यक वस्तुएँ मिल जाया करती थी। जिससे इनका निर्वाह बहुत अच्छी तरह से हो रहा था। किन्तु बहन की शादी के लिए इन्होने कुछ संचित न किया था।
      दोनो भाइयों ने विचार विमर्श किया कि हम दोनों भाई गुरू-दरबार के रागी है। सब संगत मे हमारा नाम है। हमारी जाति भी सबको ज्ञात है। अतः बहन की शादी बड़ी धूमधाम से होनी चाहिए। अब प्रश्न यह उठता है कि इतना धन आये कहाँ से ? एक भाई ने कहा – इस अवसर पर गुरू जी को चाहिये कि हमे मदद् देवे। हम दिन-रात इनके दरबार मे सेवा करते है तो इस समय हम और कहाँ जाए ? दोनों भाई आपस मे ऐसा निश्चय करके गुरू जी के पास आये और बहन की शादी का सारा वृत्तान्त गुरूदेव जी को विनयपूर्वक कह सुनाया। इनकी विनय सुनकर गुरू जी ने पूछा – तुम्हे कितना धन चाहिए ?
      इस प्रश्न का उत्तर देते समय दोनों दुविधा मे पड़ गये। उनके मन मे लालच आ गया। लालच के चुंगल मे फंसकर इन्होने उत्तर दिया – सच्चे पातशाह! सुबह के किर्त्तन मे जो चढ़त आवे – वह एक दिन की हमें दी जावें। गुरु जी ने फरमाया – बहुत अच्छा! प्रातः जो भेंट होगी वह तुम्हे दी जावेगी।

       गुरू जी से समुचित उत्तर पाकर दोनों खुशी-खुशी घर लौट आये। इन्होंने सोचा था कि पाँच सौ से ज्यादा रूपया मिल जायेगा तथा विवाह करके भी बचत हो जायेगी, चूंकि वे देखते थे कि नित्य-प्रति पाँच-छः सौ से कम चढावा न चढ़ता था। कई-कई ऐसे धनवान् श्रद्धालु भी आते थे जो कि एक-एक व्यक्ति सौ-सौ रूपये तक भेंट चढ़ा देता था। कभी कभी तो सोने की मोहरे भी भेंट मे आती थी। रात को दोनो को मारे प्रसन्नता के नींद न आई। सारी रात करवटें लेते हुए बिता दी। प्रातः हुआ नित्य की भाँति गुरू-दरबार मे पहुँचे। अन्य सब संगत भी श्री दर्शनार्थ आ पहुँची। ‘लालच बुरी बला होती है’ स्वार्थ-लोलुप सत्ता बलवन्ता ने आज कुछ अधिक प्रेम-रस व भक्ति भाव से सने हुए भजन गाये। यह ऊपर से तो किर्तन करते रहे मगर हर मत्था टेकने वाले सिक्ख की जेब, हाथ व माया मे इनकी सुरति अटकी रही। इस कारण इनका संकीर्त्तन आज नीरस रहा फिर भी जैसे-तैसे करके आज यह दोनों दोपहर के 12 बजे तक किर्त्तन करते रहे।

      संत्सग की समाप्ति पर जब सब संगत चली गई तो सतगुरू जी ने उस दिन की सारी माया इकट्ठी करके जो सौ रूपये की थी – इनको दे दी। थोड़ी माया देख कर इनका तन-मन जल उठा। क्रोध मे आपे से बाहर हो जले-भूने वापस घर आये और गुरू जी का अपयश करने लगे – यह सब गुरू जी की ही चालाकी है। गुरू जी ने आज सिक्खो व प्रेमियो को चढ़त चढ़ाने से रोक दिया है। भला, आज बड़े-बड़े धनवान् मत्था टेकने क्यो नही आए ? अच्छा, हमारे साथ गुरु जी ने चालाकी की है तो हम भी कल कीर्त्तन करने नही जायेगे। देखेगे, कौन और कैसे कीर्त्तन करता है।

 अर्थात् निन्दा करनी तो किसी की भी अच्छी नही परन्तु महापुरूषो की निन्दा तो जीव को नरकगामी बना देती है। दोनों गुरू जी की निन्दा करते रहे और जो रूपये गुरू जी से मिले थे उन्हे एक और फेंक दिया। किसी काम करने को इनका जी न चाहा। आज की रात भी क्रोधाग्नि मे जलते हुए इन्होने गुजार दी।
      कुदरत के काम तो किसी के न करने से न कभी रूके है और न रूकेगे। सतगुरू तो सदैव सेवको को उनके कल्याण के लिए ही सेवा की दात बख्शा करते है। जिस सेवक ने श्रद्धा भाव व प्रेम से सेवा कर ली उसी को ही सेवा का फल मिला करता है। जिसने तनिक आनाकानी की अथवा सेवा करने के पश्चात उसमे अहंभाव आ जाता है तो वह उस फल से वंचित रह जाता है। ठीक यही दशा सत्ता-बलवन्ता की भी हुई।
      दूसरे दिन प्रातः दरबार लगा। सभी सेवक आ पहुँचे परन्तु ये दोनों नही आए। समय पर गुरूदेव जी भी आ पहुँचे। सत्ता और बलवन्ता को न देखकर पूछा – रबाबी क्यो नही आए ? एक सेवक ने हाथ जोड़कर विनय की – सच्चे पादशाह जी! दो बार सिक्ख सेवक उनके घर से हो आए है। उन्होने उत्तर दिया है की हम किर्त्तन नही करेगें क्योकि गुरू जी ने हमारे साथ धोखा किया है।
      सत्य है सतगुरू जी अति दयालु होते है। वे उस परोपकारी डॉक्टर के समान होते है जो यह देख रहा है कि रोगी मरणासन्न है, इसके बचने की कोई आशा नही। फिर भी आशा का दामन पकड़े रोगी के मुँह मे कोई न कोई औषध देकर – इन्जैक्शन आदि लगाये जाता है कि शायद इससे बच जाए। ठीक इसी तरह अपने विशाल हदय का प्रमाण श्री गुरू अर्जुनदेव जी ने दिया दो सेवको को साथ लेकर स्वयं उनके घर की और चल दिये। उनके द्वार पर पहुँचकर आवाज लगाई – भाई सत! भाई सत!! अन्दर से कोई उत्तर न आया। तीसरी बार पुनः आवाज लगाई – भाई सत! बात तो सुन आकर।
      तब दोनों बाहर आए, अहंकार का दैत्य अभी भी उनके सिर पर नाच रहा था। स्वयं भगवान चलकर द्वार पर आये परन्तु इन मन्दभागियो ने इस स्वर्णिम अवसर का लाभ न उठाया – श्रद्धा से चरणों मे मस्तक न झुका कर बाँस की न्यायी अकड़ कर खड़े रहे। सत्य है ‘विनाश काले, विपरित बुद्धि:’ अर्थात् जब मनुष्य के बुरे दिन आते है तो उसकी बुद्धि पलट जाती है। इसके भी अब बुरे दिन आ गये थे – बुद्धि ने साथ छोड़ दिया। यदि इस समय ज्ञान होता तो क्या कुछ नही पा सकते थे ? यहाँ तक की धरती के बादशाह भी बनना चाहते तो बन सकते थे परन्तु कहाँ ….? अहंकार, लालच तथा निन्दा ने इनकी बुद्धि पर पर्दा डाल दिया था। गुरूदेव के समक्ष मौन खड़े रहे। फिर भी दया के सागर सतगुरू जी ने इनके इस भीषण अपराध की और न निहारते हुए कहा – भाई सत्त-बलवन्त जी! चलो, दरबार मे संगत प्रतीक्षा कर रही है। चल कर गुरू दरबार का कीर्त्तन करो। नाराज क्यो हो गए हो ? 
      दोनों भाई अहंकार से कहने लगे – कल आपने हमें धोखा दिया है। आपने संगतो को रोक दिया कि चढ़त न चढ़ाना। जाओ, जिससे भी चाहो किर्तन करा लो। हम दोनों नही आयेगे। हमारी सेवा व मेहनत का किसी ने मूल्य नही पाया। भला, हम सौ रूपये कहाँ- कहाँ खर्च करे।
      प्रेम और दया के सिन्धु सदगुरू जी ने पुनः फरमाया – भाई! यदि रूपये कम है तो गुरू घर मे कोई कमी नही … जितना धन तुम्हे जरूरत हो ले आना। छोटी सी बात पर बिगड़ना उचित नही। माया के लिए गुरू दरबार से प्रीत नही तोड़नी चाहिए।
      परन्तु कहाँ ? इन पर तो मन ने पूर्ण रूप से कब्जा किया हुआ था। सो इन्होने दरबार मे जाने से साफ इनकार कर दिया और कहने लगे – आपकी जितनी महिमा फैली है सब हमारे ही कारण न! यदि हम आपकी महिमा के गीत न गाते तो आपको कौन जानता था ? प्रारम्भ से ही श्री गुरूनानक देव जी के पास हमारी ही जाति का मरदाना था। अगर मरदाना गुरूनानक देव जी का यश न फैलाता तो उन्हे कौन जानता था ? आज तक आप गुरूओ की किर्ति हमने ही फैलाई है। हम आपका गुणानुवाद न करेगे तो आपको कौन मानेगा ?
      पाप, विष और अहंकार जब सीमा पार कर जाते है तो कुदरत भी उनको रोकने के लिए कोई न कोई उपाय ढूढ़ निकालती है। बाली, रावण आदि का गर्व भगवान ने चूर कर दिया तो फिर इन गुरू-निन्दको को कौन बख्शे ? आखिर शान्ति व दया की कोई न कोई तो सीमा होती ही है। भला श्री गुरूदेव जी की निन्दा कौन सह सके ? गुरू अर्जुनदेव जी को अपनी की गई अवज्ञा तो न खली परन्तु जब इन्होने सिक्ख पंथ के प्रथम गुरूमहाराज जी की शान मे अनुचित शब्द सुने तो सहन न कर सके और फरमाया – जिस जुबान से तुमने महापुरूषो की निन्दा की है उसे कोढ़ हो जाये और तुम्हे भी कोढ़ पड़े। कोई तुम्हे मुँह नही लगायेगा। इतना फरमाकर गुरूदेव जी दरबार मे चले आए। आकर संगत मे फरमाया कि ‘सत्ता-बलवन्ता की कोई सिफारिश न करे। यदि कोई उन्हे क्षमा दिलाने आयेगा तो उसे नशर बनाया जायेगा।’


      विशेष – नशर की सजा उस जमाने मे ऐसी थी कि जिसको नशर बनाना हो उसका मुँह काला, हाथ व पाँव नीले किये जाते थे तथा गधे पर उलटा बिठा कर उसके गले मे जूतो की माला डाल कर समस्त बाजार मे घुमाया जाता था।

      गुरूदेव जी के यह वचन सुनकर सब संगत चुप हो रही। तब गुरू जी ने दो सिक्खों को किर्तन करने की आज्ञा दी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जिऩ सिक्खो ने कभी किर्तन न किया था। गुरू-आज्ञा पालन करने से आज इन सिक्खों द्वारा किया गया किर्तन अत्यन्त मनमोहक रहा और पहले से भी अधिक गुरू घर का यश दिग्दिगन्त मे छा गया।
      गुरू अर्जुनदेव जी के मुखारविन्द से निकलना था कि तीसरे दिन उनको कोढ़ का भयंकर रोग शुरू हो गया। यहाँ तक की छाले पड़ गये – उनमे कृत्रिम- कीट भी चलने लगे। अब तो लेने के देने पड़ गये। बेचारे बहुत पछताये। पहले जो लोग इनका सम्मान करते थे अब वही लोग इन्हे घृणा की दृष्टि से देखने लगे। रोग बढ़ने से इनके शरीर से दुर्गध उठने लगी। यह जिस और भी जाते वही घर का दरवाजा बन्द कर लेता। कोई भी इन्हे अपने पास फटकने न देता। इनकी बहन की शादी भी रूक गई। दोनों अपार दुःख के शिकार हो गए। इन्होने कई सिक्खो से कहा भी कि हमे माफी दिलवा दो। मगर पूर्व ही समस्त संगत में गुरू जी ने फरमा दिया था कि ‘अगर कोई भी इनकी सिफारिश करेगा तो उसको नशर की सजा दी जोयगी।’ इसी कारण कोई उनकी मदद न करता था।
      जहाँ-जहाँ इनकी जान-पहचान व सम्बन्ध थे ये सब जगह गये परन्तु हर जगह निराशा ही हाथ लगी। सच है ‘अपना किया भुगत रे जिया।’ इनको इस प्रकार दुःखी देखकर एक दिन एक सिक्ख को इन पर दया हो आई और उसने सलाह दी की एक गुरूमुख सेवक भाई ‘लधा परोपकारी’ नाम का लाहौर मे रहता है। उसके द्वारा शायद तुम्हारा कुछ काम बन जाये क्योकि गुरूमहाराज जी कभी उनकी कोई बात नही टालते।
      जैसे नदी मे डूबता हुआ मनुष्य नदी मे बहती जाती हर एक चीज को पकड़ने का प्रयास करता है कि शायद उसे आसरा मिल जाये उसी प्रकार दोनो ने जैसे ही लधा भक्त का नाम सुना तो तत्क्षण लाहौर की तरफ मुँह किया। गरज इन्सान से क्या नही कराती। यद्यपि अमृतसर से 35 मील दूर था। इनसे चला भी न जाता था क्योकि इनके पैरो के तलुओ मे भी छाले थे जो चलने मे भी पीड़ा पहुँचाते थे। काफी कष्ट उठाते हुए दोनो भाई लाहौर पहुँचे। अथ से इति तक सब कुछ भक्त लधा जी को सुनाया। साथ मे यह भी बताया कि गुरू जी का यह हुक्म है कि – हमारी सिफारिश करने वाले को नशर की सजा मिलेगी।
      भक्त लधा जी को उनकी दीन-दशा पर करूणा हो आई। उन्होने कहा – तुमने गलती तो बहुत भारी की है। अच्छा…. मै स्वयं तुम्हारे साथ चलकर तुम्हारे लिए क्षमा की विनती करता हुँ आगे जैसे मालिक की मौज होगी। उन दोनो को इस प्रकार पूर्ण सात्न्वना देते हुए कहा – तुम चलो, अमृतसर (रामदासपुर) के नजदीक पहुँचो। मै भी आता हूँ। उन्हें भेजकर भक्त लधा जी के मन मे विचार आया कि अब क्या करना चाहिए ? आखिर उनके भक्ति भाव वाले मन ने सलाह दी की क्यो न पहले से ही यहाँ से नशर वाला रूप धारण कर अमृतसर मे श्री चरण कमलों मे हाजिर होऊँ।
      विचार दृढ़ कर भक्त लधा जी एक गधे पर बैठ कर अमृतसर के नजदीक पहुँचे, जहाँ सत्ता व बलवन्ता इनकी प्रतीक्षा मे थे। वहाँ पहुँचकर भाई लधा जी ने अपना मुँह काला कर लिया। गले मे जूतों का हार पहनकर गधे पर उलटे मुँह बैठकर शहर की परिक्रमा करने लगे। इसके पीछे देखने वालो की भीड़ लग गई। ये दोनों भाई भी साथ थे। हवा की भाँति यह बात फैल गई की भाई लधा परोपकारी सतगुरू द्वारा त्यागे गये सत्ता बलवन्ता को क्षमा दिलाने आये है। यह बात गुरू जी तक भी पहुँच गई। गुरूदेव जी इसकी परोपकारिता पर चकित व प्रसन्न हुए। शहर की परिक्रमा कर भाई लधा जी गुरू अर्जुनदेव जी के पास पहुँचे। गुरू जी ने भक्त लधा जी को इस हालत मे देख हैरानी से पूछा – लधा! तेरा ये हाल कैसे ? क्या बात है ?
      तब भाई लधा जी ने विनती की – हुजूर! मै सत्ता व बलवन्ता के लिए क्षमा याचना करने आया हूँ। सदगुरु दया-निधि होते है और ये जीव है। यद्यपि भूल तो इनकी बड़ी भारी है परन्तु इन्होंने अपनी करनी का फल पा लिया। अब आप इन्हे क्षमादान देने की कृपा फरमाये।
       इतनी विनय कर भक्त लधा जी आगे कहने लगे – मैंने नशर का रूप इसलिए बनाया है कि इनकी सिफारिश की सजा जो आपने निश्चित की है वह मै पहले से ही भोग लूँ। गुरूमहाराज जी उनकी विनम्रता व सवेंदना को देखकर अति प्रसन्न हुए। उठकर उसे अपने गले से लगा लिया और फरमाया – आज तुमने अपने ‘परोपकारी’ नाम को सार्थक कर दिया। भक्तो को सदैव परोपकारिता के लिए तन-मन-धन की कुरबानी करनी चाहिए। पुनः सत्ता व बलवन्ता की और दृष्टि कर फरमाने लगे – वैसे तो ये दोनों क्षमा के योग्य नही है लेकिन तुम्हारी श्रद्धा व त्याग देखकर हम इन्हे माफी देते है परन्तु इनके शरीर का कुष्ठ रोग तब निर्वत्त होगा जबकि जिस प्रकार इन्होने जबान से श्री गुरूनानक देव जी व अन्य गुरूओ कि निन्दा की है, उसी प्रकार उनकी महिमा के गीत गायेगे, तदुपरान्त ही इनका यह कुष्ठ दूर होगा। फिर इनको सेवा का अवसर सौंपा जायेगा।

      गुरू चरणों मे साष्टांग दण्डवत कर क्षमा पाकर इन दोनों ने श्री गुरूनानक देव जी की स्तुति करनी शुरू की। ज्यों-ज्यों ये महिमा गाते गये त्यों-त्यों इनका शरीर पूर्व की न्याई आरोग्य हो गया और कुष्ठ भी दूर हो गया। दस-पन्द्रह दिन पश्चात इनके शरीर पूरी तरह से स्वस्थ हो गए और पुनः ये पूर्ववतत् सेवा मे जुट गये। इस घटना के घटित होने के बाद उस समय के सब सिक्ख सेंवको को यह शिक्षा मिल गई कि गुरू-सेवा मे अहंकार का परिणाम यह होता है। सत्ता और बलवन्ता के जीवन से हम सबको भी क्या ही अच्छी शिक्षा मिलती है।

      तात्पर्य यह है कि अंहकार का कितना बुरा परिणाम होता है।

        

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