कल्पवृक्ष

      पोराणिक हिन्दूधर्म और वेद-पुराण मान्यताओ के अनुसार समुन्द्र मंथन के समय कल्पवृक्ष की उत्पत्ति हुई थी। यह 14 रत्नो मे से एक माना जाता है। समुन्द्र मंथन से प्राप्त यह वृक्ष देवराज इन्द्र को दे दिया गया था। इन्द्र ने इसकी स्थापना ‘सूरकानन वन’ (हिमालय के उत्तर में) कर दी थी।


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      कल्पवृक्ष के बारे मे यह मान्यता है कि जो भी व्यक्ति इस वृक्ष के नीचे बैठकर जो कुछ भी इच्छा प्रकट करता है, अथवा हदय मे विचार मात्र भी करता है तो वह इच्छा तत्क्षण पूर्ण हो जाती है क्योकि इसमे अपार सकारात्मक ऊर्जा विध्यमान होती है।
      आइये हम आपको एक दृष्टान्त के माध्यम से समझाते है।
      कहते है एक मारवाड़ देश मे यात्रा कर रहा था। ज्येष्ठ मास की कड़कती धूप मे भूख और प्यास से व्याकुल हो अकेला ही बढ़ा जा रहा था। मन बहलाव अथवा यात्रा को सुगम बनाने के लिए कोई अन्य साथी भी उसके साथ न था। वह यात्रा की इन दुर्गम कठिनाइयो से बहुत ही क्षुब्ध हुआ जा रहा था।
      मारवाड़ देश मे मृगतृष्णा के जल की प्रायः यह चर्चा प्रचलित है कि किस प्रकार से चमचमाती हुई रेत पानी होने का मन म भम्र पैदा कर देती है। वास्तव मे वह पानी नही होता अपितु मध्याहन के सूर्य की प्रखर किरणो के रेत पर पड़ने से रेत-कण चमकने लगते है। जिससे दूर से आने वाले पथिक को ऐसा प्रतीत होने लगता है मानो आगे पानी का स्वच्छ जलाशय लहरें मारता हुआ इठला रहा है। इस मरूस्थल मे अनजान मृग तो मारे प्यास से व्याकुल होकर पानी प्राप्त करने की आशा मे सारा दिन चौकडियाँ भरते-भरते व्यतीत कर देता है। किन्तु पानी वहाँ हो तो उसे मिले, वह तो ‘मृग-मरीचिका’ होती है। अन्त मे प्यास से व्याकुल हो छटपटाता हुआ तड़प-तड़प कर प्राण दे देता है। इसलिए इसका नाम ही ‘मृगतृष्णा का जल’ पड़ गया है।
      यह यात्री इस भम्र जाल से परिचित था। उसने एक दो बार स्वाभाविक ही इस दृश्य को देखा। वास्तविकता को जानने के कारण जल्दी ही इसने अपने ध्यान को दूसरी तरफ कर लिया। इस रेतीले स्थान मे पानी मिलने की आशा तो उसे न थी, परन्तु इसके हदय मे ऐसा विचार आया कि कही वृक्ष की छाया ही मिल जाए तो प्राणो को झुलसा देने वाली प्रचण्ड धूप से कुछ समय के लिए छुटकारा मिल सकता है। हदय मे यह सोचता हुआ थका-मांदा, प्यास से बैचेन हुआ, पद यात्रा किये जा रहा था। नीचे तप्त रेत-कणों तथा ऊपर से सूर्य की प्रखर किरणो ने इसे बेहाल कर डाला। वह निराशा मे डुबा हुआ आगे बढ़ता जा रहा था।
      कुछ दूर आगे बढ़ने से दैववश इसको रेत के मैदान मे एक घना और छायादार वृक्ष दृष्टिगत हुआ। जिसे देख यह प्रसन्न हुआ शीघ्रातिशीघ्र डग भरता हुआ उस वृक्ष के नीचे जा पहुँचा। गर्मी से व्याकुल तो था ही। छाया मे जाते ही इसकी जान मे जान आई। अपनी थकावट को मिटाने के लिए उसी वृक्ष के नीचे बैठ गया।
      वास्तव मे यह तरू ‘कल्पवृक्ष’ था, जिसके निचे आकर मनुष्य जिस वस्तु की प्राप्ति की इच्छा करता है तो उस वस्तु का विचार आने मात्र से ही वह वस्तु उसके समक्ष प्रकट हो जाती है। कई मनुष्य का यह विचार भी है कि यह कल्पवृक्ष स्वर्ग या बैकुण्ड धाम मे होता है तथा देवी-देवता इसके नीचे बैठ कर अपनी मनोकामनाँए पूर्ण किया करते है।
      मनुष्य की यह प्रकृति स्वाभाविक ही है कि जब इसकी एक इच्छा पूर्ण हो जाती है तो तत्क्षण ही दूसरी इच्छा आ धमकती है। ठीक इसी प्रकार धूप और प्यास से व्याकुल हुए इस पथिक को जब वृक्ष की प्राणदायिनी शीतल छाया से नवजीवन प्राप्त हुआ तब इसको प्यास सताने लगी। हदय मे सोचने लगा कि यदि कहीं से थोड़ा सा पानी मिल जाता तो अच्छा होता। उसे अभी इस बात का ज्ञान भी न हुआ था कि यह साधारण वृक्ष न होकर मन की कामनांए पूर्ण करने वाला कल्पवृक्ष ही है। सो इसके विचार उठने की देर थी कि तत्क्षण उस वृक्ष के नीचे निर्मल, मीठे व ठण्डे जल का स्त्रोत बन गया। यात्री ने उसे समक्ष देखा तो उसके हर्ष की सीमा न रही। मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देने लगा। वह पानी की हौज की और झुका, अपने हाथ-पैर और मुंह को धोया। गर्मी का सताया तो था ही, खूब नहाया-धोया, शीतल हुआ और प्यास बुझाकर पुनः वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया।
      प्यास की तृप्ति होने की देर थी कि इतने मे उसे भोजन की इच्छा हुई। यहाँ तो केवल विचार उठने की ही देर थी। नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन उसके सामने आ गए। उसने पेट भर खाना खाया। भोजन करने की देर थी कि उसे निद्रा ने आ सताया। काश! यहां अगर पलंग होता तो मै उस पर पूर्णरूपेण शान्ति से आराम कर लेता। लो, उसके विचारानुसार पलंग भी आ उपस्थित हुआ। वह उस पलंग पर जाकर सो गया। लेटते ही उसे गहरी निंद्रा ने आ घेरा और वह पर्याप्त समय तक सोया रहा। इतने मे सायंकाल का समय हो आया। सम्पूर्ण इच्छाओ की पूर्ति होने पर उसे ज्ञात हो गया कि ओह! यह तो देवताओ का कल्पवृक्ष है। केवल मन मे चिंतन करने से ही प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति हो जाती है।
      इस यात्री को यात्रा पर आगे भी जाना था परन्तु रात्रि होने के कारण एवं सुनसान वन को देखकर इसने मन मे सोचा कि यहाँ मुसाफिरो के विश्रामार्थ कोई रहने को धर्मशाला तो बनी हुई नही है। कहीं ऐसा न हो कि भयावह जंगल होने के कारण शेर, चीते आदि हिंसक पशु मुझे दम ही दम मे चीर-फांड़ कर खा जाये। जिस स्थान पर बैठा यह मन मे विचार कर रहा था, उस समय उसके दिल मे यह विचार कूच कर गया कि यह तो कल्पवृक्ष है। इसका यह सोचना था कि हिंसक पशु आ गये। उन्हें देख इसकी अवस्था ‘काटो तो खून नही’ सी हो गई। घबरा कर चिल्लाने लगा, हाथ-पाँव फूल गये, स्वयं को संभाल न पाया लेकिन इस वीरान जंगल मे उसकी रक्षा कौन करता? आखिर वन्य पशुओ ने उसके बदन को पैने नाखूनों से चीर डाला और उनके माँस को खा गये। इस प्रकार इस यात्री की संकल्पमात्र से जीवन-लीला समाप्त हो गई।
      क्या ही अच्छा होता कि मरते समय इसको मालिक का स्मरण हो आता ताकि वे अन्तिम समय इसकी सहायता कर सकते।
      भावार्थ यह है कि सूत्परूषो ने इस मनुष्य देह की कल्पवृक्ष से तुलना की है। मनुष्य जब अपने विचारों तथा चित्त वृत्ति को एकाग्र करके जिस कार्य या किसी भी वस्तु का संकल्प करता है तो वह अवश्यमेव उसे प्राप्त हो जाती है। अब यह तो मनुष्य के विचारों पर निर्भर है कि वह अपनी चित्तवृत्ति को संसार की ओर लगाए अथवा ईश्वर प्राप्ति की और।        

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