कर्मो का फल

      प्रत्येक जीव अपने पूर्व जन्मो के संचित कर्मो का फल वर्तमान समय मे भोगता है। उन्ही के अनुसार ही उसका प्रारब्ध बना करता है। अगर उसके क्रियमाण कर्म श्रेष्ठ नही है तो इसका परिणाम दुःख व कल्पना के रूप मे उसके सामने आ जायेगा। इस पर एक कवि ने लिखा है-
।। कविता ।।
पूर्व की कमाई पशिचम मे बैठ खाई  ।
      आगरे की खेप तूने कभी न चलाई है  ।।
दिल्ली के दलालों ने सोदा ही बिगाड दीन्हा  ।
परियाले की लूट में जगाधरी न पाई है  ।।
नाभा के लोग तो पुकार ही पुकार कहे  ।
       सहारनपुर के रास्ते से हरिद्वार जाइये  ।।
संग के संगोटी तो लाहौर ही लाहौर कहे  ।
       तज ‘वैरो वाल’ चित्त अमृतसर लाइये  ।।

       अर्थ – ‘पूर्व’ की कमाई (पिछले जन्म की) ‘पशिचम’ मे (इस जन्म मे) बैठकर खा ली है। ‘आगरे’ आगे के लिए दान न किया जो की भविष्य मे प्राप्त हो सके। ‘दिल्ली’ (दिल की दलीले) अर्थात सारहीन विचारो ने परमात्मा के मिलाप के सौदे (साधन) को बिगाड़ दिया ‘पटियाले की लूट’ (अपने पेट के खातिर) अर्थात स्वार्थ ने ‘जगाधरी’ (जगत के आधार हरि) को मिलने नही दिया। ‘नाभे के लोग’ (निर्भय पद के वासी) अर्थात नाम शब्द मे वृत्ति को जोड़कर रखने वाले साधु सन्त पुकार पुकार कर कह रहे है कि ‘सहारनपुर’ (वाक कुवाक को सहना) अर्थात सहनशीलता के होने से ही सन्तो के द्वारा दिया हुआ जो ज्ञान है उससे ‘हरिद्वार’ (भगवान के द्वार तक) पहुँचा जा सकता है ‘संग के सगोटी’ (इन्द्रिया) जो तेरे सम्बन्धी है वे भी कपड़ा, भोजन आदि सदैव मांगा करते है। इसलिए ‘वैर’ (ईर्ष्या द्वेष) तज कर ‘अमृतसर’ (आत्मा मे चित्त) लगाने से ही मुक्ति प्राप्त होती है।
      इसी पर यहाँ एक दृष्टान्त दिया जा रहा है।
      एक सेठ बहुत संत-सेवी और संत्सगी था। उनके घर प्राय साधु महात्मा जन आया करते थे। यह सेठ अपनी श्रद्धा भावनानुसार उनकी सेवा किया करता था। ठहरने को स्थान व भोजन आदि का हर प्रकार का उसने प्रबन्ध किया हुआ था। सेठ के पास अन्न, धन, वस्त्र, भूषण, नौकर-चाकर मकान आदि सभी कुछ प्रचुर मात्रा मे थे अर्थात उसके पास किसी वस्तु की न्यूनता न थी। ऐश्वर्य के सब सामान प्राप्त होने पर भी वह इन सभी चीजो मे आसक्त न था। उसका झुकाव संत्सग की और अधिक था। उस सेठ का विचार यह था कि पूर्व जन्मो के किये हुए अच्छे कर्मो का फल मुझे अब मिला है अतः अब मै जैसे कर्म करूंगा उसका वैसा ही फल मुझे अगले जन्म में प्राप्त होगा। इन विचारो से ही वह अपने धन को अधिक से अधिक परोपकार, परमार्थ-हित के लिए खर्च करता था। सेठ के इन उत्तम विचारो का प्रभाव उनकी सन्तानो पर पड़ना भी अवश्यम्भावी था।
      इस सेठ की एक लड़की थी। वह लड़की भी श्रेष्ठ विचार रखने वाली थी। युवावस्था होने पर इसका विवाह एक धनाढ्य सेठ के पुत्र के साथ हुआ। वह परिवार यद्यपि धन-धान्य से सम्पन्न था परन्तु संत्सग प्रिय न था।
      एक दिन यह लड़की अपने ससुराल मे सास के पास बैठी थी उसी समय बाहर से किसी एक फकीर ने आवाज लगाई कि देवी ! कुछ खाने को मिलना चाहिये। सास ने लड़की से कहा – तू जाकर फफीर से कह आ कि यहाँ कुछ नही है। लड़की ने सास की आज्ञा मानकर बाहर आकर फकीर से कहा – महाराज ! यहाँ कुछ नही है।
      फकीर ने पूछा – तो फिर बेटी ! तुम लोग क्या खाते हो ?
      लड़की ने उत्तर दिया – महाराज ! हम बासा भोजन खा रहे है।
      फकीर ने पुनः पूछा – जब बासा भोजन समाप्त हो जायेगा तो फिर तुम क्या खाओगे? लड़की ने प्रत्युत्तर मे कहा – तो फिर हम आपकी ही भाँति दर-दर की भीख माँगेंगे।
      लड़की से उचित उत्तर सुनकर फकीर तो वहाँ से चला गया पर इधर विधना का खेल, लड़की की सास उस फकीर व अपनी बहू का भीतर बैठे-बैठे ही सब वार्त्तालाप सुन रही थी। बहू के भीतर आते ही उसकी सास आग बबूला हो उठी तथा उसे डाँटती हुई बोली कि ‘ऐ कम्बख्त लड़की ! तू अच्छी हमारे घर आई है कि सबसे अच्छा खाना खाते हुए भी तू हमारा अपयश करती है। बता तो सही ! कब तुझे इस घर मे खाने को बासा भोजन प्राप्त हुआ है जो कि आज तूने फकीर से बासा भोजन करने की बात कही और भीख माँगने वाले मनहूस शब्द तेरे मुँह से निकले?’ इतना कुछ कहकर भी सास को सन्तोष न हुआ तथा क्रोध मे जो कुछ मुँह मे आया वह अपशब्द बोलती रही। अन्त मे उसकी पुत्र-वधु ने बडे धैर्य के साथ उत्तर दिया – माता जी ! क्या मैने झूठ कहा है ? क्या हम सब बासा नही खा रहे ?
      परन्तु लड़की की सास ने जो कि मारे क्रोध से लाल पीली हुई जा रही थी बहू के इतने विनम्रता से दिए हुए उत्तर को न सुना अपितु आवेश मे आकर सम्पूर्ण गृह को ही अशान्ति व कल्पना का रूप बना डाला। शाम को लड़की का ससुर घर आया। घर मे इस प्रकार कलह को देख तथा अपनी स्त्री को ठण्डे श्वास भरते हुए निहार कर वह दंग रह गया। बहू अलग कोने मे मुरझाई हुई दुबकी सी बैठी है। मन ही मन सोचने लगा – आज क्या कारण है कि घर मे नीरवता छाई हुई है। अपनी स्त्री से पूछा कि ‘आज क्या बात है ?’ तब उसने जले कटे शब्दो मे कहा – यह सब तेरी नेक बहू की ही कारामात है। सबसे अच्छा खाते-पीते, पहनते हुए भी स्थान-स्थान पर हमारा अपयश करती फिरती है। गलियो मे जाकर लोगो से कहती है कि हम बासा भोजन खाते है और जब यह भी समाप्त हो जायेगा तब हम भीख माँगेगे।
       लड़की का ससुर वैसे तो सत्संग के शुभ विचार नही रखता था परन्तु था समझदार और धैर्यवान। उसने अति धैर्य से पत्नी से पूछा कि ‘ऐसी क्या बात है – ऐसा कहने का उसका क्या प्रयोजन हो सकता है?’ परन्तु स्त्री तो अब भी मुँह फुलाये बैठी रही। तब वह अपनी बहू की तरफ बढा और अति प्यार से पूछा – पुत्रि ! आज घर मे क्या बात हुई है ?
      तब लड़की ने सिर झुकाये हुए अति विनम्रतापूर्वक समस्त वृत्तान्त यो सुना दिया – पिता जी! आज एक फकीर ने द्वार पर आकर भोजन की माँग की तब माता जी ने मुझे कहा कि जाओ, फकीर से कहो कि घर मे कुछ नही है। मैने इनकी आज्ञा मानकर उस फकीर को ये ही शब्द कहे – यहाँ कुछ नही है। तब उस भिखारी ने पूछा कि फिर क्या खा रहे हो ? मैने उत्तर मे कहा – हम बासा भोजन खा रहे है। पुनः उसने पूछा – बासा भोजन समाप्त हो जाने पर क्या खाओगे? तब मैने कहा कि आपकी तरह ही भीख माँगते फिरेगे।
      यह सारी बात सुनकर सेठ जी ने बहू से पुनः पूछा – बेटी ! तुम्हे कब खाने को बासा मिला है?
बहु ने कहा – पिता जी! मैने जब से होश सँभाला है उसी दिन से आज तक मैं सुख-वैभव मे ही जीवन व्यतीत करती आ यही हुँ। चाहे माता-पिता के घर अथवा आपके पास। आवश्यकता की सब सुख सामग्री मुझे प्रारम्भ से ही अपलब्ध है – किसी वस्तु का भी अभाव नही परन्तु यह प्रश्न है कि यह सब हमे क्यो प्राप्त है? भगावान की सृष्टि मे ऐसे कई प्राणी होगे जिनको भरपेट रोटी भी नही मिलती और न ही तन ढाँपने को कपड़ा मिलता हे। रहने को आकाश के नीचे धरती के बिछौने पर समय व्यतीत कर रहे है। एक हम है कि जिन्हें हर प्रकार की सुखदायी सामान सुलभ है। उनमे और हममे इतना अन्तर क्यो है ? क्या कुदरत की तरफ से पक्षपात है ? नही, कुदरत तो किसी के साथ अन्याय नही करती। यह सब तो हमारे पूर्वजन्मो के कर्मो के ही सुपरिणाम है। पूर्व जन्म के अच्छे कर्म होने से ही हमे सभी प्रकार के सुख प्राप्त है। वास्तव में इसी का नाम ही बासा भोजन है। अगर हम इस वर्तमान समय में हम कोई ऐसा साधन नही कर रहे जिनका हमे श्रेष्ठ फल मिले।
जैसे – भजनाभ्यास, संत्सग साधु-महात्माओ की पवित्र सेवा, दान-पुण्य आदि आदि।
जब हम किसी प्रकार के शुभ कर्म ही नही कर रहे तो आगे के लिए यह आशा रखना की हमें इसी तरह से सुख-सम्पक्ति के सामान मिलते रहेगे, यह अंसम्भव बात हे। यदि हम यह चाहते है कि भविष्य मे भी हर प्रकार के सुख उपलब्ध हो तो अभी से ही उसी के अनुकूल दान- पुण्य कथा-किर्तन तथा परमार्थ के कार्यो मे अपने धन व अमूल्य समय को लगाना चाहिए।
      सेठ ने पूछा – भिक्षा का क्या अर्थ हुआ ?
      लड़की कहने लगी – जिसने इस जीवन मे शुभ व श्रेष्ठ कर्म नही किये उनको जैसा प्रारब्ध के अनुसार मिलेगा उसी पर उसको गुज़र करना पडेगा। जैसे भिखारी को जो कुछ भी भिक्षा मे मिल जाए उसको असी पर सन्तुष्ट रहना पड़ता है।
     लड़की की ज्ञान भरी बाते सुनकर सेठ बहुत आश्चर्य चकित हुआ। पुनः लड़की से विस्मित हो पूछने लगा – पुत्री! ऐसा उत्तम ज्ञान तुम्हे कहाँ से प्राप्त हुआ ?
तब लड़की ने कहा –

      पिता जी! हमारे पिता जी के घर मे प्रायः साधु सन्त आया करते थे। उन्हें के संत्सग से ही हमे बचपन मे ही यह शिक्षा प्राप्त हुई है कि साधु-संगति व प्रभु किर्तन जिसको भी प्राप्त होता है, यह सब पूर्व शुभ कर्मो का ही परिणाम है तथा यही सर्वोत्म कर्म है। इतना सुनना था कि सेठ की आँखे खुल गई और उसे ज्ञान और वैराग्य हो गया।
तब उसने बहु से कहा – पुत्री! अमुक कमरे मे जो गेहूँ, चने व जौ मिश्रित है, कल से उसका आटा पिसवाकर भिखारियो व अतिथियो को भोजन करवाया करो। (वास्तव मे वह गेहूँ पुराना था और उसमे घून भी लगा हुआ था।)
      सेठ जी के कथनानुसार बहु ने वैसा ही किया और उसी आटे की रोटी बनाकर उसने ससुर के आगे परोसी। चने व जौ मिश्रित रोटी सेठ जी जब खाने लगे तो वह रोटी उनके गले से न उतरी। उस समय उन्होने बहु से पूछा-बेटी! आज कौन से आटे की रोटी बनाई है जिनके खाने से गला लकड़ी के समान खुश्क हो रहा है ?
यह सुनकर बहु ने पूर्ववत नम्रता से उत्तर दिया – पिता जी! उसी गेहूँ की रोटी आज घर में बनाई है जिसको की आपने भिखारीयो मे बाँटने को कहा था।
बहु से यह उत्तर पाकर सेठ जी विस्मित हो पूछने लगे कि ‘ऐसा क्यो?’ तब बहु ने कहा – पिता जी इसमे हैरान होने की कोई बात नही क्योकि इस जन्म मे जिस प्रकार का अन्न दान किया जायेगा वैसा ही अन्न हमे भविष्य मे मिलेगा। मैने आपको दिखाने के लिए ही ऐसा किया है। पिता जी इसमे हैरान होने की कोई बात नही क्योकि इस जन्म मे जिस प्रकार का अन्न दान किया जायेगा वैसा ही अन्न हमें भविष्य मे मिलेगा। मैने आपको दिखाने के लिए ही ऐसा किया है।
पिता जी! यदि आपको इस समय यह भोजन पंसन्द नही है तो क्या आगे चलकर (परलोक मे) यह भोजन आपको रुचिकर लगेगा ? अपनी बात को जारी रखते हुए बहू ने कहा – जिस प्रकार के श्रेष्ठ क्रियामाण कर्म इस समय मे करेगे वैसा ही फल हमे अगले जन्म मे मिलेगा।
बहू की इस बात ने सेठ जी के मन पर बहुत अच्छा प्रभाव डाला। तब सेठ जी ने अच्छे गेहूँ का आटा पिसवाकर तथा अच्छे भोजन बनवाकर सदाव्रत जारी करवा दिया।
      इस प्रकार प्रभु-भक्त व साधु-सेविका बहू के संसर्ग से सेठ जी भी भक्ति-परायण हो गए एवं वह भी सन्त-महात्माओ की शरण मे जाने लगे। अपनी पुत्री-पुत्र व अन्य सम्बन्धियो को भी संत्सग मे जाने के लिए उत्साहित करने लगे। सेठ जी के साथ-साथ घर के अन्य सम्बन्धी भी सत्संगी हो गए और घर मे हर समय शान्ति का निवास हो गया.
      इस दृष्टान्त का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक मनुष्य को वर्तमान समय मे श्रेष्ठ व उत्तम कर्म करने चाहिए। क्योकि इन्ही कर्मो से ही मनुष्य का प्रारब्ध बनता है। आज इच्छानुसार भोज्य पदार्थ आदि न मिलने पर हम तत्क्षण भाग्य को ही कोसने लग जाते है परन्तु इस बात पर तनिक भी विचार नही करते कि यह सब हमारे अपने ही किये हुए कर्मो का फल है। मनुष्य जन्म मे क्योकि जीव को सभी अधिकार प्राप्त होते है, इसमे वह पिछले कर्म भोगकर आगे के लिए शुभ कर्म भी कर सकता है। परन्तु यह तो जीव की इच्छा पर निर्भर है कि चाहे इस मनुष्य शरीर द्वारा अशुभ कर्म कर चौरासी लाख योनिया खरीदे अथवा इस दुर्लभ जन्म मे सतगुरू की शरण ग्रहण कर उनसे सच्चा ज्ञान प्राप्त कर आवागमन के चक्कर से छूटकर मुक्तरूप हो जाये। अतः प्रतिदिन के कर्मो पर कड़ी दृष्टि रखने से जीव पथ भ्रष्ट न होकर नित्यप्रति अपनी मंजिल के निकट होता चला जायेगा। सदगुरू की आज्ञानुसार शुभ व निष्काम कर्म करके अपना परलोक सँवार लेगा तथा अपने वर्तमान समय को भी स्वर्णिम बना लेगा।

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