एनी बेसेन्ट

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      जिन विदेशी महिलाओ ने भारत के राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक उत्थान मे महत्तवपूर्ण योगदान किया है उनमे एनी बेसेन्ट का स्थान बहुत ऊँचा है। एनी बेसेन्ट जन्म से ही आयरलैण्ड की थी पर भारत मे रहकर यहाँ के समाज मे घुल मिलकर पूर्णतः भारतीय बन गई थी। एनी बेसेन्ट का जन्म 1 अक्टूबर सन् 1847 ई. को लन्दन मे हुआ था। उनकी माता आयरलैण्ड की थी और पिता इग्लैंण्ड के रहने वाले थे। बचपन मे एनी बेसेन्ट को आयरिश भाषा और आयरिश रहन-सहन बहुत प्रिय लगते थे। जब एनी बेसेन्ट पाँच वर्ष की थी तभी उनके पिता का देहान्त हो गया।
      पिता की मृत्यु के बाद एनी बेसेन्ट की माता को आर्थिक कठिनाइयो का सामना करना पड़ा। वे एक होटल चलाती थी और उसी की आमदनी से अपनी पुत्री को हैरो मे शिक्षा दिला रही थी।
      एनी बेसेन्ट स्वंतत्र विचारक थी। अपने पादरी पति फ्रैंक बेसेन्ट के सम्पर्क मे आते ही उनके मन मे ईसाई धर्म के उपदेशो के विषय मे शंकाएँ उत्पन्न होने लगी। दाम्पत्य जीवन अधिक सुखमय नही था फिर भी एनी बेसेन्ट अपने कर्त्तव्य का पालन करती रही। उन्होने एक पुत्र और एक कन्या को जन्म दिया। वे बड़ी रूचि और उत्साह से बच्चो के पालन-पोषण में लग गयी।
एक बार उनके दोनो बच्चे बीमार पड़ गये। वे दिन-रात उनकी सेवा मे लगी रहती थी। बच्चे तो किसी प्रकार स्वस्थ्य हो गए पर उनका स्वास्थ्य बहुत बिगड़ गया और उनको जबर्दस्त मानसिक संघर्ष का सामना करना पड़ा।
      सन् 1875 ई. मे थियोसोफिकल सोसाइटी की स्थापना की। एनी बेसेन्ट उनकी सदस्या बन गई और आध्यात्मवाद के प्रचार के लिए अपने जीवन को अर्पित कर दिया। इस सोसाइटी के तीन प्रमुख उददेश्य थे जिनके कारण एनी बेसेन्ट इस सोसाइटी मे शामिल हुई –
जाति या धर्म का भेदभाव किये बिना विश्व बन्धुत्व की स्थापना करना।
आर्य साहित्य और दर्शन के अध्ययन को आगे बढाना।
प्रकृति के नियमो तथा मनुष्य मे छिपी किंतु सम्भव भौतिक शक्तियो की खोज-बीन करना।
      सन् 1893 ई. मे शिकागो मे होने वाले सर्वधर्म सम्मेलन मे एनी बेसेन्ट ने थियोसोफिकल सोसाइटी का प्रतिनिधित्व किया। जब वे थियोसोफिकल सोसाइटी के भारतीय सदस्यो के सम्पर्क मे आयी तब उन्होने उनसे वादा किया कि वे भारत अवश्य आयेगी। 46 वर्ष की उम्र मे एनी बेसेन्ट भारत आयी और फिर भारत की बनकर भारत मे रह गयी। उन्होने भारत की सामाजिक और धार्मिक स्थिति का गहन अध्ययन किया। उन्होने अनुभव किया कि भारत के विद्ययालयो को पाठ्यक्रम मे धार्मिक और नैतिक शिक्षा को भी सम्मिलित करने की आवश्यकता है। वे भारत के विद्ववानो, विचारको, धर्म-गुरूओ और समाज सुधारको के सम्पर्क मे आयी तथा उनके साथ विचार-विमर्श किया। अडयार (तमिलनाडु), वाराणसी, मुम्बई, आगरा, लाहौर आदि स्थानो मे जाकर उन्होने भाषण दिये। शिक्षा के प्रचार-प्रसार और शिक्षा प्रणाली मे सुधार कर उनके भाषणों मे विशेष बल रहता था। उन्होंने पिछडी जातियो के लिए स्कूल खुलवाने के लिए प्रयत्न आंरभ किए और हस प्रकार राष्ट्रीय शिक्षा के अभियान मे जुट गई।
      सन् 1907 ई. में थियोसोफिकल सोसाइटी मे अध्यक्षा बनी। अपने विचारो और सिद्धान्तो के प्रचार के लिए उन्हाने दो समाचार पत्रो का प्रकाशन आंरभ किया। एक था ‘द कामन वील’ और दूसरा था ‘न्यू इण्डिया। इन समाचार पत्रो के माध्यम से उनके विचार जनता तक पहुँचने लगे।
      एनी बेसेन्ट प्रभावशाली वक्ता, श्रेष्ठ लेखिका एवं सफल प्रचारक थी। उन्होने धर्म-शास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति और शिक्षा पर अनेक ग्रंथो की रचना की। इन रचनाओ मे उन्होने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के प्राचीन गोरव का गुणगान किया है तथा राष्ट्रवाद को भी धर्म के मार्ग मे ले जाने की प्रेरणा दी। उन्होंने श्रीमदभगवत गीता का अनुवाद किया और “हन्टस आन द स्टडी आफ भगवद गीता” नामक पुस्तक की रचना की। इस ग्रंथ से पता चलता है कि वे गीता के ज्ञान योग, कर्मयोग, शक्तियोग और इंद्रिय निग्रह की साधना को स्वीकार करती थी।
      एनी बेसेन्ट व्यक्ति की स्वतन्त्रता की हिमायती थी। उनका कहना था कि व्यक्ति को अपने चिंतन के परिणामो को स्वतन्त्रता से व्यक्त करने का अधिकार होना चाहिए। सत्य का आचरण करके ही हम स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकते है। वे भारत को समृद्ध राष्ट्र के रूप मे देखना चाहती थी। उनके मन मे भारत के प्रति गहरा लगाव था। अपनी एक कविता मे वे भारत के सम्बन्ध मे कहती है –

हे पूर्ण राष्ट्र भारत  !  भविष्य के भारत  !

कितनी देर बाद तुम अपना पद प्राप्त करोगे  ?
कितनी देर बाद तुम्हारे निवासी स्वतंत्र जीवन बिताएगे  ?
कब तुम्हारी आत्मा अनन्त को समेटकर उसमे लीन हो जायेगी  ?
      एनी बेसेन्ट अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त महिला थी। उनके अन्दर न्याय और सत्य के लिए संघर्ष करने वाली सशक्त आत्मा विध्यमान थी। जिस समय भारत ने स्वराज्य के लिए संघर्ष आंरभ किया उस समय अनेक ऐसी शक्तियाँ थी जो भारत को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप मे नही देखना चाहती थी। एनी बेसेन्ट ने धर्म और आध्यात्म का मार्ग अपनाकर भारतीय राष्ट्रवाद की शक्ति बढायी। उन्होंने स्वराज्य के आदर्श को भारत मे लोकप्रिय बनाने का सराहनीय प्रयास किया। लोकहित को ही वह राज्य और राष्ट्र का लक्ष्य मानकर चली। वे सन् 1917 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनी।
      उनके सम्बन्ध मे हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू ने कहा है –
      “आज की पीढ़ी के लिए वह नाममात्र हो सकती है लेकिन मेरी और मेरे से पहले की पीढ़ी के लिए उनका बहुत बड़ा व्यक्तित्व था जिसने हम लोगो को बहुत प्रभावित किया। इसमे कोई शक नही हो सकता कि भारतीय स्वतत्रतां संग्राम ने उनका योगदान बहुत अधिक था। इसके अतिरिक्त वह उन लोगो मे से थी। जिन्होने हमारा ध्यान हमारी अपनी सांस्कृतिक धरोहर की ओर आकर्षित किया और हममें उसके प्रति गर्व पैदा किया।”

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