एक घड़ी संत्सग के लाभ से बालिका पर क्या प्रभाव पड़ा प्रंसग के माध्यम से जानिये !

      संत्सग की जितनी महिमा लिखी जाए उतनी थोड़ी है। सत्पुरूषो का एक घड़ी का संग ही मानव की जीवन धारा को बदल कर कुछ का कुछ बना देता है। प्रस्तुत दृष्टान्त मे एक ग्वालिन बालिका ने एक घड़ी के संत्सग सुनने और उस पर आचरण करने से किस प्रकार अपने जीवन को सुधार लिया, वह प्रंसग पढ़िये –


satsang ka falsatsang sa labh
      किसी नगर मे मायादास नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसके पास बहुत सी गाय-भैसे थी। वह दूध बेचकर अपना और अपने परिवार का जीवन निर्वाह करता था। उसकी दो लड़कियाँ थी। बड़ी लड़की विवाहित थी और छोटी जिसकी आयु अभी चौदह वर्ष की थी। उसका नाम सौभाग्यवती था। वह अपने पिता कि आज्ञानुसार चल कर दूध बेचा करती थी। उसके पिता का यह आदेश था कि जब सुबह-शाम दूध दोहने का समय आये तो दूध दोहने वाले बर्तनों को साफ करके उनमे पानी डाल दिया करे। जिससे दूध दोहते समय पानी दूध के साथ मिल जाए और ग्राहको को दूध में पानी डालने का आभास तक न होने पाए। इस साधन से मायादास कपट करके धन अर्जित किया करता था।
      इसी नगरी मे एक उच्चकोटि के महात्मा जी रहते थे। वह प्रतिदिन सायंकाल को शुद्ध व्यवहार तथा भक्ति ज्ञान के विषय मे उपदेश किया करते थ इन प्रेम भरे वचनों को श्रवण करने के लिए काफी संख्या मे लोग आया करते थे। इसी से सारे नगर मे इनकी महिमा फैली हुई थी। इनकी प्रसिद्धि के विषय में मायादास ने भी सुन रखा था। अतएव यह मन ही मन महात्मा जी के प्रति घृणा के भाव संजोये रखता था। इसने अपनी छोटी लड़की सौभाग्यवती से कह रखा था कि ‘बेटी! तू नगर के तीन कोनो मे जाकर दूध बेचा करना परन्तु चौथे कोने की और कभी मत जाना क्योकि वहाँ एक भाड़भट्टे (घर उजाड़ने वाले) महात्मा जी रहते है।’
       सौभाग्यवती पहले तो पिता के डर से कई दिनों तक उधर न गई परन्तु एक दिन उसके मन मे विचार आया कि आज चौथे कोने की और जाकर देखूँ तो सही कौन से भाड़भट्टे रहते है। ऐसा विचार आते ही वह लड़की उस और गई। वहाँ पहुँचने पर क्या देखती है कि एक वद्ध महात्मा जी उच्चासन पर विराजमान् है और उनके आगे चार-पाँच सौ स्त्री-पुरुष प्रेम से बैठे व्याख्यान सुन रहे है। यह देख सौभाग्यवती भी थोड़ी देर के लिए वहाँ बैठ गई। इस समय महात्मा जी सदाचार के विषय पर उपदेश कर रहे थे कि ‘सच्चाई के व्यवहार से जीव उत्तम गति को प्राप्त करता है तथा असत्य व्यवहार से दुःख-क्लेश पाकर नीच योनियों का शिकार बनता है। अपने किए हुए कर्मो से मनुष्य कदापि नही बच सकता।’ महात्मा जी के वचन बड़े मनोहर थे अतः कन्या के दिल पर गहरे उतर गये। वह काफी देर तक वहाँ बैठी रही। संत्सग की समाप्ति पर महात्मा जी के निकट जाकर सादर नमस्कार कर पूछा – महाराज! सच्ची व झूठी रहनी का क्या स्वरूप है ? 
      महात्मा जी ने कहा – बेटी! सच दूध और झूठ पानी है। जो केवल दूध का विक्रय करे उसकी सच्ची रहनी है और जो दूध मे पानी मिलाकर बेचे उसकी झूठी रहनी है।
      महात्मा जी के इन वचनों से सौभाग्यवती के सुषुप्त कर्म जाग उठे जिससे वह पूर्व किये हुए अपने कुकृत्यो पर पश्चाताप करने लगी और दिल मे प्रतिज्ञा कि की आज से मै पिता जी को बर्तन मे पानी डाल कर कभी न दूँगी।
      दूसरे दिन जब मायादास दूध दोहने लगा तब सौभाग्यवती बर्तन साफ करके ले आई परन्तु आज उसमे पहले की भाँति पानी नही डाला। दूध दोहते समय कुछ ग्राहक भी निकट ही खड़े थे। पिता ने बर्तन देखकर लड़की को इशारे से कहा – बर्तन अच्छी तरह से साफ करके ले आओ। कन्या ने बर्तन धोकर पुनः खाली ही पिता के हाथ में थमा दिया।
      पिता ने दूसरी बार पुनः कहा, परन्तु सौभाग्यवती ने इस बार भी खाली बर्तन पिता के हाथो मे दिया जिससे मायादास मन ही मन झल्ला उठा और कहने लगा – मुझे ऐसा लगता है जैसे आज तू भाड़भटटो की तरफ गई हो और वहाँ से ही यह उलटी पढ़ाई पढ़ आई हो। लोगों के चले जाने पर मायादास सौभाग्यवती पर बड़ा नाराज हुआ। तब उसने कहा – पिता जी! अब मै बर्तन मे पानी डाल कर कभी न दूँगी क्योकि महात्मा जी ने इस कार्य का कुपरिणाम बताया है।

      मायादास ने क्रोध मे भरकर कहा – मै तो पहले ही समझ गया था कि आज तुझ पर भाड़भटटे के संग का रंग चढ़ गया है। लेकिन …. बेटी! अभी तू अविवाहित है, तेरा सारा सुख दुःख, भला-बुरा मुझ पर ही निर्भर है। तेरी बड़ी बहन यद्यपि विवाहित है तब भी वह मेरी ही आज्ञा मे चलती है। फिर तेरा भविष्य तो मेरे हाथों मे है। इतने पर भी तू मेरा कहना मानने मे असावधानी करती है – यह तेरे लिए उचित नही।

      प्रत्युत्तर मे कन्या बोली – पिता जी! उचित है अथवा अनुचित …. मै अपने हाथों से जानबुझ कर खोट कपट नही करना चाहती। जब तक मुझे ज्ञान नही था तब तक गलत काम करती रही – अब मुझे संत्सग द्वारा इस बात का अनुभव हो गया है। इसलिए अब मै ऐसा करना पाप समझती हूँ। जैसे कहा भी  है

।। दोहा ।।
      यह सुन पिता ने आवेश मे भर कर कहा – अभागिन! देख लेना मै तेरी शादी एक ऐसे पुरूष से करूँगा जो लूला लंगड़ा, बदसूरत और कोढ़ी हो फिर तुझे पता लगेगा कि भाड़भट्टो की संगत का क्या फल मिलता है। तू ऐसा दुःख पायेगी कि आयुपर्यन्त रक्ताश्रु प्रवाहित करती रहेगी और फिर इस घड़ी का तू पश्चाताप करेगी – इन महात्माओ की शिक्षा से तू दिन-रात दुःखी होकर रोएगी। अब भी समय है मान जा और उनके उपदेश का त्याग कर दे, फिर भूल कर भी उनका सुमरण मत करना।
      कन्या न दृढ़ता से उत्तर दिया – ‘पिता जी! मेरी प्रारब्ध मेरे साथ है, कर्म-रेखा प्रबल है। यदि मेरे भाग्य मे लूला-लंगड़ा पति लिखा है तो मै उसी को ही भगवान की तरफ से अति कृपा समझूँगी। मै इस बात से क्यो मुँख मोडूँ ? मुझे कोई भय नही क्योकि मेरा मार्ग सत्यता से पूर्ण व बिल्कुल साफ है।’  
।। शेअर ।।
कुछ परवाह नही अगरचे जमाना खिलाफ है।
रास्ता वही  चलेगे  जो  ठीक  और  साफ  है ।।
       पिता जी! मेरी प्रारब्ध जो बननी थी वह तो बन चुकी है। हाँ, अब तो मात्र समय की ही प्रतीक्षा है। जैसे गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है – 
।। दोहा ।।
पहले  बनी  प्रारब्ध, पाछे  बना  शरीर ।
तुलसी यह आश्चर्य है, मन नही बांधे धीर ।। 
       भगवान् की लीला विचित्र है। जिस समय पिता और पुत्री मे यह वार्ता हो रही थी, उस समय प्रीतम नगर का राजा ‘लीलाधर’ भेष बदलकर नगर का परिभ्रमण कर रहा था। चलते-चलते इन पिता पुत्री मे हो रही बातें उसके कान मे पड़ गई जिससे वह कुछ देर के लिए वहाँ रूक गया और छिप कर सारी वार्ता सुन अपने महल मे लौट आया। उस लड़की के सद्गुण, सच्चाई, भक्तिभाव के शुभ विचारों से यह प्रभावित हुआ और निश्चय किया कि क्यो न ऐसी सुशील लड़की के साथ विवाह किया जाए।    

      दूसरे दिन प्रातः होते ही मायादास क्रोधावस्था मे सौभाग्यवती के लिए लूंला-लगड़ा पति ढूँढ़ने के लिए संकल्प कर ही रहा था कि उधर महाराज लीलाधर ने अपनी मंत्री के हाथ मायादास को बुलाने का सन्देश भेजा। राजा साहब के आदेशानुसार मंत्री मायादास के घर पहुँचा और सन्देश दिया कि कन्या को साथ लेकर मायादास राजदरबार मे पहुँचे। यह सुनते ही मायादास आवाक् सा रह गया और स्वप्न की सी उसकी अवस्था हो गई। उसे अपने पर विश्वास नही हो रहा था कि यह सब सत्य है या असत्य। उसकी बुद्धि काम नही कर रही थी। उसके सारे कुविचार धूल मे मिल गई। विवश हो राजा की आज्ञा मान अपनी कन्या सौभाग्यवती को लेकर राजदरबार में जा पहुँचा। तब राजा साहब ने मायादास से कहा – ‘मै चाहता हूँ इस कन्या का विवाह मेरे साथ हो जाये।’ शास्त्र-विधि अनुसार सौभाग्यवती का विवाह महाराजा लीलाधर के साथ किया गया और सौभाग्यवती अब ग्वालिन से ‘महारानी’ बन गई। मायादास कन्या के सौभाग्य को देखकर चकित रह गया। इसने समझ लिया कि यह सब महात्मा जी कि दयालुता और क्षणिक संत्सग का ही प्रभाव है। मायादास के दिल मे महात्मा जी के प्रति को घृणा थी वह अब श्रद्धा मे परिवर्तित हो गई। उसने महात्मा जी के पास जाकर अपनी भूलो की क्षमा याचना कि तथा उनका सेवक बन गया एंव अपने कुव्यवहार को शुद्ध व पवित्र कर लिया अर्थात् उस ने दूध मे पानी मिलाना बंद कर दिया।
      इधर सौभाग्यवती के सद्व्यवहार से महाराजा लीलाधर बहुत ही प्रसन्न थे। एक दिन उन्होंने महारानी सौभाग्यवती से पूछा – ‘आपकी कोई हार्दिक इच्छा हो तो प्रकट करो मै उसे पूरा करने को तत्पर हूँ।’ इस पर सौभाग्यवती ने प्रेम व नम्रता से उत्तर दिया – ‘महाराज! आपकी कृपा से वैसे तो आनन्द ही आनन्द है मेरी केवल एक ही इच्छा है, वह यह कि इस नगर मे अमुक महात्मा जी रहते है। मैने हदय मे उन्हे गुरू-रूप धारण कर लिया है। उनकी अपार कृपा व एक दिन के क्षणिक संत्सग से मेरे बुरे कर्मो की रेखा परिवर्तित होकर शुभ हो गई है। उनके उपदेश के श्रवण व मनन से ही मै उस पद की अधिकारिणी बन पाई हुँ। सो मेरी हार्दिक इच्छा यह है कि आप उन्हे सादर महल मे ले आइये। प्रथम तो विधि अनुसार उनसे नाम की दीक्षा ली जाए तथा उनके निवास के लिए अलग स्थान बनवा दिया जाए ताकि नित्य संत्सग प्रचार हो सके जिससे हमे व प्रजा को रूहानी लाभ हो।
।। दोहा ।।
      महाराजा लीलाधर पूर्व ही आस्तिक विचारों के थे। अब महारानी की संगति से उनके शुभ विचारों मे बढ़ोतरी होने लगी। रानी के कथनानुसार दूसरे दिन बड़ी श्रद्धा व आदर के साथ महाराज लीलाधर महात्मा जी को महल मे लिवा लाए और उनसे विधिपूर्वक गुरू-दीक्षा लेकर दोनों उन के शिष्य बन गए। अब तो वहाँ प्रातः सायं संत्सग का प्रवाह चलने लगा जिससे थोड़े समय मे ही नगर निवासी संत्सगी बन गए। सब लोग महारानी के उपकार और महात्मा जी की अनुकम्पा व संत्सग द्वारा अपने जीवन को सफल सिद्ध करने लगे। महारानी सौभाग्यवती की खुशी का कोई ठिकाना नही था। तात्पर्य –  
।। दोहा ।।
सतगुरु के .परसाद  से, काग हंस  हवै  जाय ।
मलिन विषय रस त्यागि कर, गुरू के शब्द समाय ।।
 

   अर्थात् सत्पुरूषो के विमल संत्सग को पाकर जीव अपनी काकवृत्ति को छोड़ हंसवृत्ति ग्रहण कर लेता है। इतना ही नही दिन-रात उसका मन जो मलिन-वासनाओ व सांसरिक सुख-वैभव के रसों मे फँसा होता है। सन्तों की संगति प्राप्त होने से उसे सब झुठे भासने लगते है। तथा वह सत्-पथ की और अग्रसर हो जाता है। जिस प्रकार इस दृष्टान्त मे एक घड़ी के संत्सग के प्रभाव से सौभाग्यवती ने केवल स्वयं को ही नही अपितु अपने साथ अपने पिता को भी बुराई की और जाने से बचा लिया।                                                                                   

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