ईश्वर जो करता है, अच्छा करता है

 

 

      प्रकृति के नियमानुसार जो कार्य हो रहा है, वह ठीक ही हो रहा है । इसलिए प्राणी को कभी भी विपत्तियो से घबराना नही चाहिए क्योकि कष्ट तो अपने कर्मानुसार बड़े बड़े लोगों पर भी आते है किन्तु उस कष्ट को वे ईश्वर की और से भेजा हुआ प्रसाद समझते है । ‘ज्ञानी काटे ज्ञान से अज्ञानी काटे रोये’ इस कारण वे कभी अपने कर्त्तव्य से विमुख नही होते । इस दृष्टान्त मे ऐसे ही एक धीर मंत्री एवं कमजोर विचार वाले राजा का प्रंसग दिया जा रहा है –
      किसी एक राजा का मंत्री धार्मिक प्रवृत्तिवाला, सन्त महात्माओ का सेवक एवं सत्संगी और भजनाभ्यासी था । वह सदैव इस बात पर विश्वास रखता था प्रकृति की और से जो भी काम होता है वह उचित ही होता है । वह परमात्मा के प्रत्येक कार्य पर किसी प्रकार का संशय न करता था ।
      एक बार एक साधु मण्डली इनके शहर के निकट आकर ठहरी । राजा सहित मंत्री उनके दर्शन करने गये । जब वह उनके दर्शन व सत्संत श्रवण करके वापिस लौट रहे थे अकस्मात् राजा के पैर मे मार्ग मे पड़े एक पत्थर से ठोकर लगी । जिससे पैर के अंगूठे मे अत्यधिक चोट आ गई और अंगूठा जख्मी हो गया । अत्यधिक चिकित्सा कराने पर भी घाव नासूर का रूप धारण करता गया । मवाद के फैल जाने पर विष फैलने की आशंका थी । फलतः राजवैद्यो ने परामर्श दिया – ‘महाराज! अंगूठा कटवा लिजिए अन्यथा …। उनके परामर्श से राजा को अंगूठा कटवाना पड़ा ।
      एक दिन राजा ने अपने इसी धर्मात्मा मन्त्री से कहा – मन्त्री जी ! उस दिन उन साधुओ के दर्शन करने से हमे क्या लाभ हुआ कि हमे पैर का अंगूठा ही कटवाना पड़ा । मन्त्री महोदय ने विनम्रता से विनय की – महाराज! इसमे ही आपकी भलाई निहित होगी । यह बात राजा को अच्छी न लगी । उस समय तो राजा साहब ने प्रत्यक्ष मे तो मन्त्री से कुछ न कहा परन्तु मन ही मन उस मन्त्री से घृणा करने लगे ।
      उधर दूसरे राजकर्मचारी जोकि पूर्व ही इस मन्त्री से घृणा करते थे, उन्होने इस अवसर का लाभ उठाते हुए राजा साहब के कान भरने शुरु कर दिये । वे कहने लगे – महाराज! यह आपका कैसा निर्दयी मन्त्री है जो कि आपके कष्ट की रत्ती भर भी परवाह नही करता । महाराज! ऐसा मन्त्री अवश्य ही एक दिन चकमा दे जायेगा । वह मन्त्री ही कैसा जिसमे अपने स्वामी के प्रति सहानुभूति न हो । ऐसे मनुष्य को तो तत्काल ही दरबार से निकाल देना चाहिये ।
      राजा मन्त्री से मन ही मन पूर्व क्रुद्ध था ही अब राजकर्मचारियो के कथन से जलती अग्नि मे आहूति का कार्य कर दिया । अर्थात् महाराजा ने उनकी बातों मे आ कर मन्त्री को पूर्ण रूप से अपना अहितकारी समझ कर आवेश मे आकर उसे मन्त्री पद से हटा दिया परन्तु मन्त्री को इस बात का तनिक भी दुःख न हुआ । उसके मुख से अब भी वही पंक्ति गूँज रही थी कि ‘ईश्वर जो करता है अच्छा करता है’ मै तो उसकी विराट इच्छा मे ही सर्वदा प्रसन्न रहने वाला हूँ ।
।। गजल ।।
कुन्दन के हम डले है जब चाहे तू गला ले ।
बावर न हो तो हम को ले आज आजमा ले ।।
जैसी तेरी खुशी हो सब नाच तू नचा ले ।
सब छानबीन करले हर तोर दिल आजमा ले ।।
राजी है हम उसी मे जिसमे तेरी रजा है ।
यहाँ यूँ भी वाह वाह है और वूँ भी वाह वाह है ।।
      यह पंक्तिया पढ़ता हुआ मन्त्री राज दरबार से प्रसन्न वदन हो घर चला गया । 
      शनैः शनैः राजा साहब के अंगूठे का घाव ठीक हो गया । एक दिन राजा आखेट के लिए अपने कर्मचारियों के साथ किसी जंगल मे निकल गये । अभी तक मन्त्री पद पर नया मन्त्री निर्धारित नही किया गया था । इसीलिए स्वंय राजा साहब ही आगे आगे जा रहे थे । इतने मे उन्हे एक शिकार दिखाई दिया । बस, फिर क्या था राजा ने उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ा लिया । दुर्भाग्यवश शिकार तो राजा के हाथ न लगा और वह उसके पीछे अपना घोड़ा दौड़ाते दौड़ाते एक गहन वन में जा पहुँचे । 
     अलहकारों के दुर्बल घोड़े राजा से पीछे रह गये । तब अकेले ही राजा विश्राम के लिए कोई स्थान खोजने लगे । उनके खोजते खोजते सूर्य अस्त हो गया और अन्धकार ने दशो दिशाओ में आ डेरा लगाया । अकस्मात् राजा क्या देखते है कि सामने कही से प्रकाश नजर आ रहा है । ज्यों ही राजा उसकी और बढ़े कि कुछ भीलों ने आकर उनको घेर लिया । ये भील एक यज्ञ कर रहे थे इनको मुखिया ने कहा था कि एक आदमी देवी की बलि चढ़ाने के लिए ढूँढ लाओ । ये भील एक व्यक्ति की तलाश मे फिर रहे थे कि अकस्मात् उनकी राजा की भेंट हुई । जिन भीलों ने राजा को पकड़ रखा था उनमें से एक ने आगे बढ़कर पूछा – तुम कौन हो ?
      प्रत्युत्तर मे राजा ने कहा – मै इस नगरी का राजा हूँ । तथा शिकार खेलने के लिए निकला था परन्तु रास्ता भूल जाने के कारण भटक गया हूँ । इसी भूल के कारण ही मै आपकी नगरी मे आ गया हूँ ।
      इस पर जंगली भीलो ने कहा – तुम्हे पता होना चाहिए की हमारी इस नगरी मे भीलों का राज्य स्थापित है और हमारे मुखिया का यह आदेश है कि रात्रि समय जो कोई पुरुष हमारी सीमा मे आ जाए तो उसको पकड़ लाओ । हमारे यहां देवी का मन्दिर है, सो हम अपने मुखिया के आदेशानुसार आपको वहां ले जायेगे तथा वहां आपके शरीर की बलि चढ़ायेगे । अतएव तुम चुपचाप हमारे साथ चलें चलो । इस समय आपकी कुछ भी बात सुनने को हम तैयार नही ।
      अपने लिए बलि का शब्द सुनते ही राजा के रोंगटे खड़े हो गए । वह मन ही मन कहने लगे कि मेरे साथ तो वही बात हुई ‘आकाश से गिरा, खजूर मे अटका’ अच्छा मेरे मालिक ! जो तेरी मौज ! तू बड़ा ही बेपरवाह है । परन्तु तू ही जीवमात्र का एक रक्षक भी है । मैने तो रोशनी के सहारे नगर की और जाने का विचार किया था परन्तु इसी प्रकाश ने ही मुझे बड़े संकट मे ला पटका है । हे दीनबन्धु ! मेरे अपराधो को क्षमा करो । क्षमाशील नाथ !! मुझे केवल आपका ही सहारा है ।
      कोई चारा न देखकर राजा चुपचाप उनके साथ चल दिया । भीलों ने राजा को ले जाकर मुखिया के समक्ष प्रस्तुत किया । पण्डितो ने उनके अंगो की परीक्षा लेते हुए उनके पैर का अंगूठा कटा हुआ देखा । बस फिर क्या था, झट से पण्डित बोले – इसे ले जाओ ये पुरूष बलि के योग्य नही है क्योकि इसका एक अंग भंग हुआ हुआ है । पंडितो के ऐसा कहने पर वह राजा तो मृत्यु के मुख से बच गया तथा उन भीलों को पुनः अपने मुखिया का यह आदेश हुआ कि तुम बलिदान के लिए ऐसे पुरूष को लाओ जिसके सम्पूर्ण अंग सही हो ।
      इस प्रकार जब जीवन दान पाकर राजा लौटने लगा तो मार्ग मे चलता हुआ हदय मे सोचता जाता है कि प्रभु कितने ही कल्याणकारी है । यदि मेरा अंगूठा न कटा हुआ होता तो आज मे महाकाल का ग्रास बन गया होता । इस कटे हुए अंगूठे का ही प्रताप है जो कि आज मेरे प्राण बच गए । राज-पाट व शरीर दोनों मे से किसी एक पर भी आंच नही आ सकी । अब महाराजा के मन मे अपने मंत्री को राज्य से निकाल देने का बहुत ही पश्चाताप होने लगा कि वह मन्त्री कितना बुद्धिमान था जो मुझे कहता था कि ‘ईश्वर जो भी करता है, उसमे जीवमात्र का हर प्रकार से भला ही छिपा होता है ।’ मैने व्यर्थ मे लोगों के बहकावे में आकर ऐसे बुद्धिमान, धर्मात्मा, सुशील मन्त्री को अपमानित कर राज दरबार से अकारण ही निकल दिया है यह मैने अच्छा नही किया ।
      यह सोच कर राजा सीधा ही मन्त्री के घर पहुँचा । उसने सारी वार्त्ता उसे कह सुनाई तथा मन्त्री से बड़ी विनयपूर्वक क्षमा माँगी – ऐ मन्त्री श्रेष्ठ ! घोर अपराध हुआ है जो मैने लोगों के कहने मे आकर आपको मन्त्री पद से हटा दिया है । अब आप मेरे इस अपराध को क्षमा करे और चलकर पूर्ववत् अपना पद स्वीकार करे ।
      मन्त्री कहने लगा – महाराज ! इसमे आपका दोष नही है । यह जो कुछ भी हुआ है सब उस परमात्मा की आज्ञानुसार ही हुआ है । मालिक को ऐसा ही स्वीकार होगा । वह प्रभु तो सदैव सब का मंगल चाहते है । अतः यह तो सब लीला उस दयामय् भगवान की ही है । उसी प्रभु ने मेरे द्वारा अपनी मौज को पूरा करवाया है ।
      यह सब सुनकर राजा ने शंकित स्वर मे पूछा – मन्त्रि जी ! भला यह कैसे ? मैने तो आपको नौकरी से हटा दिया था – यह मैने कोई भलाई का कार्य किया था ? मन्त्री ने उत्तर दिया – महाराज ! यदि आप मुझे नौकरी से न हटाते तो मै भी आपके साथ शिकार खेलने जाता । हम दोनों अपने अपने बलशाली घोड़ो पर इकट्ठे ही जंगल मे गये होते तो हम दोनों को ही उन जंगली भीलो ने पकड़ लेना था । आप तो अंगूठे के कटे होने से मुक्त हो जाते और मुझे वे बलिदान कर देते । अब आप ही कहिये कि परमात्मा ने दोनो का ही किस सुन्दर ढंग से परम कल्याण कर दिया है ।
      मन्त्री से यथार्थ ज्ञान पाकर राजा ने कहा – सत्य है मन्त्रि जी ! मैने माना ईश्वर जो कुछ भी करता है उसमे प्राणिमात्र का सर्वथा मंगल ही छिपा होता है । वह सर्वरक्षक, दीनबन्धु, करूणासिन्धु और न्यायकारी है ।
      सांराश यह है कि ईश्वरीय इच्छानुसार अपने विचारों को बनाना यह किसी विरले का काम होता है । आमतौर पर मनुष्य इस बात को सोचता ही नही अपितु थोड़े से कष्ट मे ही दूसरे को गलत समझने लगता है और वह हमेशा दुःखी व परेशान रहता है ।                   

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