इब्राहीम अधम (बलख बुखारे)

।। श्लोक ।।
नामु   अमोलकु   रतनु  है   पूरे   सतिगुर    पासि ।।
सतिगुर   सेवै  लगिआ  कढ़ि  रतनु देवै   परगासि ।।
धनु वडभागी वडभागिआ जो आइ मिले गुर पासि ।।

        मालिक के नाम का जो अमूल्य रत्न है वह पूर्ण सतगुरू की शरण मे जाने से ही प्राप्त हो सकता है। जो जिज्ञासु उनकी सेवा करता है। उसे वे नाम का गुप्त रत्न जो कि जीव मात्र के घट मे विद्यमान है प्रकट कर दिखाते है। कुदरत की तरफ से नाम का खजाना सतगुरू के ही अधीन होता है। उनकी दया के बिना नाम को अपने घट मे प्रकट कर सकना अथवा अपने बल-बूते पर नाम का अभ्यास कर सकना जिज्ञासु के लिए नितान्त असम्भव है। अनादिकाल की परम्परा से ही कुछ ऐसा नियम है कि मालिक से अनेक जन्मों से बिछड़ी हुई सुरति को जब तक यह जीव सतगुरू के शब्द के साथ न मिलाए तब तक नाम का भण्डार गुप्त रहता है। इस कारण इस अभ्यास का नाम सुरत-शब्द-योग है। केवल पूर्णवेत्ता सत्पुरूष ही जीव को नाम के अलौकिक प्रकाश में ला सकने मे समर्थ है। वे जीव धन्य है जिन्होने की उनकी परम कल्याणमय शरणागति ग्रहण करके अपने को सौभाग्यशाली बना लिया है। 
       बलख़ बुख़ारे का युवराज परमार्थ सिद्धि के साथ-साथ चाहता था कि ऐश्वर्यमय जीवन भी व्यतीत करूँ। ये दोनों विरूद्ध कार्य कैसे सिद्ध हो सकते थे ? सो उसको उचित मार्ग दर्शाने के लिए दो दिव्य पुरुषो ने स्वप्न मे कहा कि ‘ईश्वर प्राप्ति की चाह रखने वालो का सवा मन फूलो को सेजो पर विश्राम करने का क्या काम ?’ इसका विशद परिचय पाठको को नीचे लिखे दृष्टान्त से मिलेगा-

Image result for sultan ibrahim adham


       ‘इब्राहीम अधम’ अपने ऐश्वर्यमय जीवन मे ही प्रभु-दर्शन की लालसा संजोये रखता था। सदैव साधु-महात्माओ व फकीरो की खोज मे लगा रहता है कि कही से मुझे ईश्वर प्राप्ति सुलभ हो जाये। अन्ततः एक दिन उसकी यह उत्कट अभिलाषा मालिक ने सुन ही ली। युवराज इब्राहीम सवा मन फूलो की सेज पर विश्राम करने का आदि था। एक दिन वह अपने महल वाली छत पर सोया हुआ था कि उसने स्वप्न में दो दिव्य पुरूषो को देखा। वे इसके पास जब आये तो युवराज ने उनसे पूछा – तुम कौन हो और यहाँ कैसे आये हो ?
       दोनों ने उत्तर दिया कि ‘हम सारबान (ऊँट चलाने वाले) है। हमारा ऊँट गुम हो गया है उसे ही खोजते फिर रहे है।’
       इस पर युवराज ने कहा – होश की दवा लो। भला, ऊँटो का मकान की छत पर क्या काम ?
       सारबान (देवदूत) कुदरत की तरफ से युवराज को सन्मार्ग पर अग्रसर करने आये थे। उन्होने तपाक से उत्तर दिया – होश की दवा तो प्रथम आप लिजिये – ईश्वर की प्राप्ति करने वालो का सवा मन फूलो की सेज पर सोने का क्या काम ? इतना कहकर वे न जाने कहाँ ओझल हो गये। उनकी बात से युवराज के विचारो को ठेस लगी और राजसी ठाट-बाट छोड़कर फकीरी भेष धारण कर लिया। अभी यह योवन अवस्था मे ही था परन्तु वैराग्य हो जाने के कारण उसने राज्य के सुखो का त्याग कर दिया और अपने देश ‘बलख़ बुखारा’ मे पहले से अधिक लगन से फकीरो की खोज करने लगा लेकिन आत्मिक आन्नद की प्राप्ति उसे कही से न हुई।
      इस तरह सन्तो और फकीरो को खोजता-खोजता वह भारत मे आया और यहाँ भी कई फकीरो, साधु महात्माओ से मिला। फिर भी मन की आकांक्षा पूर्ण न हुई। यह वह समय था जब परम सन्त श्री कबीर साहिब काशी जी मे नामोपदेश कर रहे थे और अनेको जीवो को परमार्थ लाभ हो रहा था। श्री कबीर साहिब जी की महिमा सुनकर वह काशी जी मे उनके पास पहुँचा और विनय की – मुझे भी अपनी चरण-शरण मे अपना सेवक बनाकर रख लिजिये।
      परमसन्त श्री कबीर साहिब ने उनसे आदि से अन्त तक का हाल पूछा और फरमाया – तुम बादशाह हो और हम है गरीब जौलाहे। अतः हमारा तुम्हारा मेल कैसा?
     इस पर इब्राहीम ने कहा कि मै आपके पास बादशाह बनकर नही अपितु एक गरीब भिखारी बनकर आपसे नाम की भिक्षा लेने आया हुँ। उस समय श्री कबीर साहिब जी के पास ‘माता लोई’ बैठी हुई थी। उसने भी सिफारिश की और श्री कबीर साहिब जी ने उसे अपने पास रख लिया। अब इब्राहीम अधम श्री कबीर साहिब जी के घर का हर प्रकार का काम करने लगा और जो कुछ वहाँ से खाने को मिलता – सहर्ष खा लिया करता था। इस प्रकार श्री कबीर साहिब जी की सेवा मे उसे छः वर्ष व्यतीत हो गये। एक दिन माता लेई ने श्री कबीर साहिब से कहा कि यह बादशाह और हम गरीब जुलाहे, जो कुछ हम खाते है वो यह भी चुपचाप खा लेता है। अब इस पर आपकी दयादृष्टि होनी ही चाहिए।
     कबीर साहिब ने उत्तर दिया – अभी इसका दिल पूर्णतया पवित्र नही हुआ। अभी इसने हदय मे से अंहकार की बू आती है। इस पर माता लेई ने विनय की – इसका क्या प्रमाण है? तब श्री कबीर साहिब जी ने प्रत्युत्तर मे कहा – आज तुम ऐसा करो कि घर का समस्त कूड़ा-कर्कट एकत्र कर लो और मकान की छत पर चढ़ जाओ। मै इसको बाहर भेजता हुँ। जब यह नीचे से गुजरे तब सब गन्दगी तुम इसके ऊपर फेंक देना और छिपकर सुनना की यह क्या कहता है ?
     माता लेई ने ऐसा ही किया। कूड़ा फेंकने के बाद पीछे होकर सुनने लगी। इब्राहीम कहने लगे – अफसोस! अगर होता बलख बुखारा तो फिर मे जो करना चाहता सो करता। माता लेई ने सब वृत्तान्त श्री कबीर जी को बताया। उन्होने कहा कि हमने तो पहले ही तुमसे कहा था कि अभी इसके अन्तःकरण मे अंहकार ने डेरा लगाया हुआ है। जिस कारण अभी यह इस चीज के योग्य नही हुआ।
     इसी प्रकार कबीर जी के पास रहते-रहते छः वर्ष और व्यतीत हो गये। इन छः सालों मे इब्राहीम ने अति विनम्रता, दीनता व गरीबी के साथ सेवा की। खाने को जो रूखा-सूखा मिलता अमृत समझकर खा लिया करता। यदि कभी कुछ न मिला तो भी चूं तक न की। श्री कबीर साहिब जी के घर पर साधु-महात्मा तो आते ही रहते थे। इब्राहीम अधम को इनकी सेवा करने व सत्संग सुनने का अच्छा अवसर मिला। प्रारम्भ की सेवा व अब की सेवा मे धरती-आकाश का अन्तर पड़ चुका था। श्रद्धा-भाव से की हुई सेवा अब रंग लाई।
     एक दिन कबीर साहिब जी माता लेई से कहने लगे कि अब बर्तन साफ हो गया है। लेई ने कहा – मुझे तो कोई विशेष अन्तर नही दिखता है। जैसे पहले था वैसा अब भी है। परन्तु यह तो परख दृष्टि रखने वाले श्री कबीर साहिब ही जानते थे कि अब इब्राहीम का हदय पवित्र हो चुका है। सर्वसाधारण मनुष्य इन बातो को परखने व समझने की योग्यता कहाँ रखता है। जब कबीर साहिब जी के कहने पर माता लेई को विश्वास न हुआ तो कबीर साहिब जी ने फरमाया। इसकी परीक्षा लो। पहले तो तुमने इसके ऊपर साधारण कुड़ा कर्कट डाला था। अब गली-सड़ी दुर्गन्धयुक्त गन्दगी इसके ऊपर छत पर खड़ी होकर डालो। ताकि यह उस गन्दगी से अच्छी प्रकार लथपथ हो जाये। तब तुम्हे स्वयमेव ज्ञात हो जायेगा।
     माता लोई ने श्री कबीर साहिब जी के कथनानुसार वैसा ही किया। जब इब्राहीम जी द्वार से निकलने लगे तो योजना के अनुसार माता लोई ने एकत्र की हुई गन्दगी की इसके ऊपर वर्षा कर डाली। इस बार अपने ऊपर दुर्गन्धयुक्त कीच के पड़ते ही वह खूब हँसा और प्रसन्नता से कहने लगा – शाबाश! मेरे ऊपर कृपा करने वाले तेरा भला हो। मेरा मन अंहकारी है। अतएव इसे ठीक करने का यही उचित उपाय है।
     इसे देख व सुन कर माता लोई ने समस्त वृत्तान्त कबीर साहिब जी को सुनाया। जिसे सुनकर उन्होंने फरमाया कि ‘मैने तुम्हे पहले ही तुम्हे बता दिया था कि अब इसके दिल का बर्तन पवित्र और निर्मल हो गया है। इसमे कोई कोर-कसर नही रह गई। अतः अब यह कृपा का पात्र बन चुका है।’ अब श्री कबीर साहिब जी ने इब्राहीम को रूहानियत के गूढ़ रहस्य बताये। जिससे इसके दिल पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि उसे लेखनीबद्ध नही किया जा सकता। यह तो गूंगे के गुड़ वाली बात है। अब यह पूर्णतया भक्ति के रंग मे रंगा गया था। जैसे धुले हुए स्वच्छ कपड़े पर रंग चढ़ जाता है। इसी तरह उसका दिल सेवा से साफ हो चुका था तथा थोड़े ही समय मे उसके दिल मे रूहानियत की ज्योति जगमगा उठी। अन्त मे श्री कबीर साहिब जी ने कहा – अब तुम भक्ति की सम्पदा से मालामाल हो चुके हो। अस्तु अब तुम बलख बुखारा जा सकते हो।
     इब्राहीम अधम ने श्री कबीर साहिब जी का कोटिशः धन्यवाद किया। चरणों मे गिरकर अपने प्रेमाश्रुओ से उनके चरणो को प्रक्षालित (धो) कर अपने अपराधों की क्षमा याचना की तथा माता लोई को सादर प्रणाम कर अपने देश बलख बुखारा लौट आया। बारह-चौदह वर्ष पश्चात इसके शरीर का काफी रंगरूप बदल गया था क्योकि भाक्ति की लगन के पीछे इसने कठिन से कठिन कष्टो को भी हँस हँस कर सहन किया था। शारीरिक दृष्टि से भले ही वह निर्बल हो चुका था परन्तु उसके चेहरे पर तेज और दिल मे आत्मिक आनन्द व सच्ची शान्ति हिलौरे लेती थी। इसके अतिरिक्त व नाम रूपी अमूल्य रत्न पाकर समृद्ध हो चुका था। अतएव वह वापस जब लौटा तो सीधा बलख बुखारा आकर राजमहल मे न गया। निकट ही राज्य के किसी जंगल मे डेरा लगा लिया। पहले तो किसी को यह ज्ञात न हुआ कि यह फकीर कौन है? बाद मे लोगो ने पहचान लिया। जब वह घर से चला था उस समय उसका छोटा सा लड़का जो अभी एक-डेढ़ वर्ष का था। इस समय 15-16 वर्ष के लगभग हो गया था। सूचना मिलने पर वह लड़का पिता से मिलने आया। बेटे को देखकर इब्राहीम के हदय मे पुत्र के प्रति मोह जागृत हुआ। उसी समय उसे सावधान करने हेतु वहाँ देववाणी हुई –

।। शेअर ।।
एक  दिन  लड़का  हुआ उसका  उदास ।
मिलने को 1उल्फत से आया बाप पास ।।
उसके  भी  दिल   मे  मुहब्बत  आ   गई ।
देख   कर   बेटे  को  उल्फत  छा  गई  ।।
वहीं   एक   2इलहाम    ग़ैबी   यूं    हुआ ।
यानी    इब्राहीम   तू    समझा    है   क्या  ? 
या   तो   बेटे  की मुहब्बत दिल  मे  रख ।
या   हमारी   ही  मुहब्बत दिल  मे  रख ।।
दिल  है   तेरा  एक उस   मे   ऐ   3हुजी ।
उलफ्तें   दो   दो  समा   सकती   नही  ।।

    जब इब्राहीम ने ऐसी आकाशवाणी तो लड़के को विदा कर दिया। लोगों का विचार था कि पुत्र अपने पिता को अवश्य राजमहल मे ले आयेगा क्योकि बादशाह के जाने के बाद लड़का अल्पायु था। अतः वजीर ही लड़के के साथ राज्य के काम करवाता था। लड़के के अकेला लौट आने पर अब वजीर इब्राहीम को लेने आया, उस समय वह ‘दजला नदी’ के तट पर बैठा हुआ अपनी गुदड़ी सी रहा था। आकर वजीर ने नमस्कार किया। कुछ दिन बाद इधर-उधर की बातें करने के उपरान्त वजीर ने कहा – हुजूर! आपके यहाँ से जाने के पश्चात मैने आपके लड़के के पालन-पोषण कर उसे विद्याध्ययन कराया साथ ही राज्य के कार्य मे भी प्रवीण किया। अब आप अपने राजमहल मे पधारने की कृपा करे तथा पूर्ववत् शासन की बागडोर अपने सुदृढ़ हाथो मे लेकर राजसिंहासन पर आसीन होवे। जिससे मेरा व आपका शेष जीवन पुनः हँसी-खुशी से व्यतीत हो।
      इब्राहीम ने यह सुन कर वही सुई जिससे वह गुदड़ी सी रहा था नदी मे तत्क्षण फेंक कर वजीर से कहा – पहले मेरी सुई यहाँ से निकाल दो फिर मे आपको उत्तर दूँगा। इस पर वजीर ने कहा – हुजूर! आप मुझे केवल आधे घण्टे का समय दे दो मै सैकड़ों सुईयाँ लाकर आपको अर्पण कर सकता हुँ।
      इब्राहीम ने कहा – नही, मुझे तो यही सुई लेनी है।
      वजीर ने जबाब दिया – इतनी गहरी नदी मे से सुई निकालना असम्भव है।
      इब्राहीम ने कहा – तुमसे कुछ नही हो सकता तो किसी और को बुला लाओ।
      वजीर ने उत्तर दिया कि – यहाँ से कोई भी सुई नही निकाल सकता।
      तब वही बैठे हुए इब्राहीम ने एक दृष्टि डाली तो एक मछली मुँह मे सुई लेकर सामने आई। हब्राहीम ने वजीर को उत्तर दिया कि ‘मैने तुम्हारी बादशाही को आजमा लिया है। मै अब उस देश के बादशाह (परमात्मा) का गुलाम हुँ। जिसके अधीन समस्त सृष्टि-जमीन, आसमान, अग्नि, वायु, खण्ड-ब्रहाण्ड और तीनो लोक है। तुम जानो तुम्हारे काम जाने, मुझे अब किसी से कोई सरोकार नही।’
      तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार इब्राहीम अधम अपने गुरू की सेवा करके कितनी बड़ी शक्ति का मालिक बन गया। इसी प्रकार बिना आत्म-समर्पण किये जीव सच्चा आनन्द नही पा सकता। अपने हदय से अहंता को निकालने पर पूर्ण श्रद्धा-विश्वास-नम्रता आदि धारण करने पर ही आत्मिक शान्ति प्राप्त हो सकती है। सत्पुरूषो की वाणियाँ पढ़ने से ज्ञात होता है कि अपने हदय मे कितना उच्चकोटि का विश्वास सदगुरूदेव जी के प्रति होना चाहिये।
जैसे निचे लिखी पक्तियो से स्पष्ट होता है –
मुल खरीदी लाला गोला मेरा नाउ सभागा ।
गुर की बचनी हाटि बिकाना जितु लाइआ तितु लागा ।।

      अर्थात् सेवक को अपने गुरूदेव के वचनों पर इस प्रकार बिक जाना चाहिये। जिस प्रकार कोई क्रीतदास (जर खरीद गुलाम) होता है। वह अपने मालिक के किसी भी आदेश पर कोई आपत्ति नही कर सकता। चाहे उसका मालिक उस नौकर से किसी प्रकार का भी काम ले अथवा दण्ड दे उसे सहर्ष स्वीकार करना पड़ता है। इसी प्रकार वह शिष्य इन काम, क्रोध, लोभादि शत्रुओ पर तभी विजय पा सकता है। जब स्वयं को गुरूदेव के वचनों पर न्यौछावर कर देवे। सन्त सत्पुरूष तो रूहानियत से भरपूर सागर की भाँति होते है। अपनी-अपनी श्रद्धा-भावना के अनुसार जो चाहे उनसे लाभ प्राप्त कर सकता है।             

Leave a Reply

Your email address will not be published.