आत्मिक उन्नति करने का यही सही समय है।

      मानव जन्म बहुत अमूल्य है। क्योकि मानव चौरासी लाख योनियो मे सबसे उत्तम व सर्वश्रेष्ठ है। और इसी मानुष जन्म मे ही हम चौरासी की कैद से छूट सकते है। ‘खाओ पियो, और ऐश करो’ ऐसा कहना बुद्धिमानी नही। अपितु ऐसा कहकर हम अपने आप को धोखा दे रहे है। तथा खुद को चौरासी की कैद मे डाल रहे है।
      महापुरूषो और सन्तों की दृष्टि मे बलशाली पुरुष वीर पुरूष नही है। बल्कि वे है जिन्होंने अपने मन को नियन्त्रण मे रख कर मालिक की पावन भक्ति मे अपना जीवन लगा दिया है। वे ही सच्चे योद्धा एवं शूरवीर है। इसके विपरीत जिस मनुष्य का मन चंचल है। उसकी आत्मा मृत्योपरान्त भी भटकती रहती है तथा पशु-पक्षी, कीट, पतंगो की योनियां प्राप्त करती है। अतएव मानव जन्म मे ही सब कार्य व्यवहार करने के साथ-साथ आत्मिक उन्नति के साधन भी अपनाने चाहिए।
      कई मनुष्यो का ऐसा विचार होता है कि दुनिया के काम समाप्त हो जाने पर भक्ति व भजन-सुमरण का काम भी कर लिया जायेगा परन्तु यह सब मात्र उनके मन के बहाने है क्योकि सांसारिक काम-धन्धे अथवा मन की इच्छाओ का कम होना तो अति असम्भव है। इनका पेट तो ‘सुरसा राक्षसी’ की भाँति अथाह और विशाल है। अतएव जगत के कर्त्तव्यो के साथ ही आत्म-ज्ञान प्राप्त करने वाला ही विचारवान् व श्रेष्ठ है।
       इसी विषय पर एक छोटा सा दृष्टान्त यहाँ दिया जा रहा है –
     एक बार कोई पथिक अश्व पर सवार होकर किसी यात्रा पर जा रहा था। यात्रा करते-करते दोपहर होने को आयी। सूर्य देव अपनी प्रखर-रश्मियो से सबको ताप देने लगे। एक तो यात्रा की थकावट – तिस पर पानी की तृष्णा ने यात्री को बैचेन कर रखा था। वह पानी प्राप्त करने के लिए दौड़-धूप कर रहा था कि कही से मुझे शीतल जल मिल जाए तो मै अपनी तृषा शान्त करूँ अन्ततः खोजते-खोजते उसको किसी कुँए पर रहट (हलटी) चलता दृष्टिगत हुआ जिसे देख पथिक की जान मे जान आई।
     अब उसने घोड़े की लगाम तीव्रता से खींच ली और शीघ्र ही उस स्थान पर जा पहुँचा जहाँ से की स्वच्छ शीतल जल निकल कर समूचे खेत को सिंचित कर रहा था। जाते ही पथिक ने घोड़े से उतरकर उसे एक वृक्ष से बाँध दिया और वहाँ आकर पहले अपनी प्यास बुझाई। पश्चात स्नान करके भोजन किया। इसके बाद उसने घोड़े को वृक्ष से खोला और उसे पानी पिलाने के लिए समीप लाया। रहट के चलने से खट-खट की ध्वनि हो रही थी। जिसे सुनकर घोड़ा भयभीत हो पीछे हट जाता था और पानी नही पी सकता था। घोड़े के मालिक ने रहट चलाने वाले से कहा – ‘भाई! थोड़ी देर के लिए आप रहट चलाना बन्द कर दो जिससे मेरा घोड़ा पानी पी ले।’
      इस पर रहट वाले ने उत्तर दिया – अगर रहट की ठक् ठक् होनी बन्द हो जायेगी तो पानी आना भी बन्द हो जायेगा। फिर आप अपने घोड़े को पानी कहाँ से पिलाओगे ? यदि आपके अश्व ने पानी पीना है तो ठक् ठक् की आवाज के होते हुए ही पानी पी सकता है अन्यथा नही।
      सांराश यह है कि इसी प्रकार इस संसार मे रहते हुए तथा इसके उतार चढ़ाव को देखते हुए भी आत्मिक ज्ञान की प्राप्ति का साधन अपनाना चाहिए।
      सत्पुरूषो ने कहा है कि हमे दुनिया मे कमल के पुष्प की भांति रहना चाहिए। जिस प्रकार कमल का पुष्प कीचड़ मे रहते हुए भी उससे ऊपर ऊपर ही रहता है अर्थात् हमे भी कमल के पुष्प की भांति संसार मे रहते हुए संसार से निर्लिप्त रहना चाहिए। तथा संसार मे रहकर संसार के कार्य व्यवहार करते हुए मालिक का सच्चा नाम जपते रहना चाहिए। जिससे हम इस मानुष तन का लाभ प्राप्त कर सके तथा अपने उददेश्य की पूर्ति कर अपना लोक व परलोक सँवार सके।
  

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