अशर्फियो से भरे सात घड़ों की कहानी

      धन का लोभ मन मे आ जाने से मन की तृष्णा कभी समाप्त नही होती। जैसे आग पर ईधन डालने से आग प्रचण्ड होती है, इसी तरह लोभी मनुष्य को जितना धन मिल जाये उतनी ही उसकी तृष्णा बढ़ती ही चली जायेगी ऐसा मनुष्य अपने जीवन काल के दरिद्री बना रहता है। धन के अति अधिक होने पर भी वह मनुष्य स्वयं को कंगाल मानता है। ऐसा मनुष्य परमार्थ व भक्ति के पथ पर कभी भी सफलता प्राप्त नही कर सकता।
हम आपको एक रोचक कहानी बताते है कि किस प्रकार एक नाई ने अशर्फियो के सात घड़े पाकर और उनको भरने के लालच मे अपना सम्पूर्ण जीवन दुःखरूप बना लिया। पूरा प्रंसग यहाँ पढ़िये –  
      किसी समय का वृत्तान्त है कि एक बार एक नाई वृक्ष के नीचे से होकर कही जा रहा था। इतने मे यह आवाज आई कि ‘अशर्फियो से भरे हुए सात घड़े तू लेगा? उस नाई ने चारों तरफ दृष्टि घुमाई परन्तु वहां उसे कोई व्यक्ति दिखाई नही दिया मगर अशर्फ़ियो के सात घड़े का नाम सुनकर लालच से उसके मुँह मे पानी भर आया तब वह जोर से चिल्लाकर बोला – हाँ, मै सात घड़े लेने को तैयार हूँ। उधर से पुनः आवाज आई – तू अपने घर जा, अशर्फियो के सात घड़े मैने तेरे घर पहुँचा दिये है। नाई जिस काम को जा रहा था वह काम तो वह भूल ही गया और वापस घर लौट आया। घर आकर क्या देखता है कि अशर्फियो के सात घड़े उसके घर मे मौजूद थे। वह यह देखकर बहुत हैरान हुआ – छः घड़े तो अशर्फियो से ऊपर तक भरे हुए थे। लेकिन सातवां घड़ा आधा ही था। वह देखकर उस नाई को चिन्ता हुई – अगर यह घड़ा भी भर जाता तो कितनी अच्छी बात होती। इसके पास जितने भी रूपये चाँदी-सोने के जेवर थे सबको बेंच कर अशर्फिया खरीद ली और जो घड़ा अधूरा था उसमे डाल दी मगर वह घड़ा नही भरा। 
      यह नाई राजा के यहाँ नौकरी करता था और राजा भी इसके कार्य से प्रसन्न था। इसने नम्रतापूर्वक राजा से विनय की ‘महाराज मेरा खर्च अब नही चलता मेरा वेतन बढ़ा दिजिए।’ राजा ने नाई का वेतन दुगुना कर दिया। अब यह सब रूपया उस अधूरे घड़े मे जाने लगा मगर घड़ा फिर भी नही भरा। इसके बाद नाई घर-घर भीख माँगने लगा और जो कुछ मिलता – अशर्फियाँ मोल लेकर घड़े मे भरता जाता, मगर वो घड़ा फिर भी न भरा।  
      एक दिन राजा ने इसे चिन्तित सा देखकर पूछा – ‘तू इतना दुःखी व उदास सा क्यो रहता है? जब तेरी तन्ख्वाह आधी थी तब तक तो तू खुश था परन्तु जब से तेरी तन्ख्वाह बढ़ी है तू ज्यादा परेशान हो गया है। कही तुझ को सात घड़े तो नही मिल गये है?’ ये सुनकर नाई ने हैरान होकर पूछा – महाराज! आपसे यह बात किसने कही है?   
      राजा बोला – ‘तू नही जानता, ये चिन्ह उस व्यक्ति के होते है। जिसको भूत अपने सात घड़े दे देता है। हमे भी एक दिन भूत ने कहा था कि सात घड़े ले लो। हमने पूछा – खर्च करने के लिए या जमा करने के लिए। यह बात सुनकर वह चुप हो रहा और भाग गया। तू यह नही जानता कि कोई उस दौलत को खर्च नही कर सकता। उनको पाकर केवल धन एकत्र करने का लालच बढ़ जाता है। उचित है तू उसको फैंक आ, नही तो बहुत दुःखी होगा।’
      नाई राजा की बात मानकर उन सातों घड़ो को बाहर जंगल मे उस वृक्ष के नीचे रख आया जहाँ से उसे घड़े मिले थे। इसका परिणाम यह हुआ कि उसकी सारी आयु भर की कमाई अपने लालच के कारण हाथ से निकल गई। इतना नुकसान होने पर भी अब वह खुश था क्योकि उसे अब मालूम हो गया था कि अगर यह घड़े मेरे घर पर रहते तो पूरी जिन्दगी मुझे परेशान होना पड़ता। अच्छा है थोड़े मे ही राजा ने मुझे छुटकारा दिलवा दिया। अब वह पूर्ववत् अपनी कमाई को खाने, पीने, पहनने मे खर्च करने लगा। और हँसी खुशी से उसका समय गुजरने लगा।  
      जैसा की इस दृष्टान्त मे बताया गया है कि एक नाई को अपना जीवन सुखपूर्वक व्यतीत करता था, धन के लोभ मे आकर अपना संचित धन हाथ से गँवा बैठा और इसी लोभ के कारण ही घर घर जाकर भिक्षा माँगता रहा। यह तो अच्छा हुआ कि राजा ने उसे बता दिया कि ‘ये तो वही भूत के घड़े है’ और वह भी कहना मान कर उन्हे वापिस जंगल मे छोड़ आया। नही तो न मालूम यह नाई कितना दुःखी व परेशान होता। ठीक इसी तरह से सन्त महात्मा व शास्त्र इस जीव को लोभ से बचाने का उपदेश देते है कि ऐ मनुष्य! तू अपने दिल से लोभ के ख्याल को दूर कर और अपनी चित्तवृत्ति को मालिक के भजन सुमिरण व सत्संग मे लगा। पूर्वजन्म के संचित कर्मानुसार जो तेरी प्रारब्ध बन चुकी है वह तो हर हालत मे तुझे मिलनी ही है। जैसे कहा भी है –
।। शेअर ।।
      जब यह बात सर्वथा सत्य है तो फिर क्यो लोभाधीन होकर अपने इस मानव जन्म को व्यर्थ खोना चाहता है। सन्त महात्मा इस मनुष्य को नाम व भक्ति वाला सच्चा धन संचित करने की प्रेरणा देते है जो मरणोपरान्त जीव के काम आने वाली वस्तु है।   

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