अध्यात्म कहानी

       श्रीरामायण में श्रीरामचन्द्र जी अयोध्यावासियो को कथन करते है कि यह मनुष्य तन बड़े भाग्यो से मिलता है। मानव देह देवताओ को भी दुर्लभ है। सब ग्रन्थ भी मनुष्य शरीर के गौरव का ही बखान करते है। इस अनूठी काया मे ही मोक्ष की प्राप्ति का साधन जुटाया जा सकता है और यह ही मुक्ति का द्वार है। इस सुदुर्लभ मनुष्य योनि को पाकर भी जो अपना परलोक नही संवारते वे जीव परलोक जाने पर यमदूतो के हाथो कष्ट प्राप्त करते है। उस समय यह प्राणी सिर धुन-धुन कर पछताता है – कभी कहता है कि मुझे समय ही नही मिला  – कभी कहता है कि ईश्वर ने ही मुझसे भक्ति नही करवाई। इस प्रकार वह दूसरो पर मिथ्या दोषारोपण करता है परन्तु वस्तुत: इसमे जीव का अपना ही दोष होता है। किये हुए कर्मो का दण्ड तो उसे भोगना ही पड़ेगा। अब विचारने योग्य बात तो यह है कि इस मनुष्य तन मे अपना परलोक कैसे संवारा जा सकता है।
।। चौपाई ।।
बड़े भाग मानुष तनु पावा ।
      सुर दुर्भल सब ग्रंथन्हि पावा ।।
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा ।
      पाइ न जोहि परलोक सँवारा ।।
।। दोहा ।।
इसी विषय पर एक शिक्षाप्रद दृष्टान्त यहाँ दिया जा रहा है –
      किसी देश में कोई राजा रहता था – बड़ा धर्मात्मा, प्रजा-वत्सल। उसके शासन काल मे प्रजा बहुत सुखी थी। राजा भी यद्यपि सुखपर्वक जीवन जी रहा था। उसे किसी प्रकार का अभाव न था। अभाव था तो केवल यह कि वह निःसंतान था। जब वह भक्ति-परायण सम्राट स्वर्ग सिधार गया तो मंत्री व दरबारीगण आदि सबके समक्ष यह समस्या खड़ी हुई कि राज्य का उत्तराधिकारी बनकर प्रशासन की बागड़ोर कौन संभाले ? बड़े-बड़े गण्य-मान्य व्यक्तियो ने काफी विचार-विमर्श करने पर यह निर्णय किया की वोट डाले जाये। जिस व्यक्ति के नाम पर निर्धारित क्रमानुसार सबसे अधिक मतपत्र निकले उसे ही पाँच वर्ष के लिये राज्य दिया जाये और पाँच वर्ष पश्चात उसे राज-पद से हटाकर वन मे भेजा जाए।
      इस निर्णय को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया। जिस से यही नियम उस राज्य मे लागू हो गया कि प्रत्येक पाँच वर्ष पश्चात मतदान होता और जिस व्यक्ति के पक्ष मे अधिक वोट पड़ते उसी को ही पाँच वर्ष का राज्य संचालन का भार दिया जाता। पाँच वर्ष पश्चात उसे राज-गददी से हटाकर नदी-पार वन मे छोड़ आते यहाँ कि घना जंगल था और थे हिंसक पशु। अन्त मे वह राजा हिंसक पशुओ का शिकार बन जाता था। इसके अतिरिक्त होना भी क्या था उस भयावह वन मे।
      इसी सिद्धान्तानुसार प्रत्येक राजा पांच साल का राज्य मिलने पर खाने-पीने, क्षणिक वैभव-सुख आदि मे लीन हो जाता यहाँ तक की पांच वर्ष पश्चात मिलने वाले आगामी कष्टो की तनिक भी स्मृति उसे न रहती। यद्यपि यह नियम सभी को ज्ञात था कि निशिचत अवधि के उपरान्त उसे नदी के उस पार घोर जंगल में जाना होगा, साथ ही उसे अपने से पूर्व राजाओ का समस्त हाल भी ज्ञात होता था किन्तु माया इतनी प्रबल है कि सभी इसके मोहक जाल मे मन की इच्छाओ की पूर्ति हेतु राग-रंग व चमक-दमक मे इसप्रकार तल्लीन हो रहते कि पाँच वर्ष उनके स्वप्न की न्याई बीत जाते। निशिचत समय हाथ से निकल जाने पर वे वन्य पशुओ के हवाले हो जाते पर अब पछताये होत क्या ?
      इसप्रकार जब देश के कई युवक राज्य भोग चुके तब एक ऐसे युवक की बारी आई जिसका इस दृष्टान्त मे वर्णन चलना है। वह संत्सगी, साधू-सेवी, पूर्ण गुरू का शिष्य था। जब उसे सूचना मिली कि राज्यसिंहासन पर बैठने का तुम्हारा नम्बर है तो सूचना पाते ही वह गुरूदेव की शरण मे गया और सादर दण्डवत अभिवादन करने के पश्चात हाथ जोड़ कर विनय करने लगा – भगवन ! आप इस देश के होने वाले प्रत्येक सम्राट की परिस्थिति से परिचित तो है ही। अब मेरी बारी है, इसलिए इस सेवक को कृपा कर शुभ आर्शीवाद देने की अनुकम्पा कीजिये।
      श्री गुरुदेव जी ने पाँच वर्ष के कार्मक्रम के सम्बन्ध मे शिष्य को सब कुछ समझा दिया और आशीर्वाद भी दिया। अपने गुरूदेव जी से आशिष और आज्ञा पाकर युवक भक्त लौट आया। निशिचत दिन आने पर असे सिंहासन पर विराजमान किया गया। गुरूमुख तो वह था ही, साथ ही उसे प्राप्त था – पूर्ण गुरूदेव का कृपा-पूर्ण शुभ आशीर्वाद। जहाँ महापुरुषो का आशीर्वाद प्राप्त हो वहाँ पर फिर कठिनाई या दुविधा का तो प्रश्न ही नही उठता। हर तरफ सफलता ही सफलता हस्तगत होती है। श्री आज्ञानुसार उसने सबसे पूर्व नदी-पार के समस्त वन को प्रथम वर्ष मे कटवा कर साफ करवा दिया। शासनकाल के दूसरे वर्ष मे उस वन खण्ड मे पानी छुड़वा दिया ताकि कंटीली झाड़ियो की जड़े भी निकलवा दी जाये। तीसरे वर्ष मे रमणीय बाग, बगीचे आदि लगवा दिये। चौथे वर्ष मे लोगों के ठहरने के लिए मकान और बाजार बनवाए। शहर के बाहर-भीतर आने जाने के लिए सड़के व जन-सुविधा हेतु कुएँ, तालाब, बावली, पार्क,अस्पताल, स्कूल आदि स्थापित करवा दिए। घोड़े, गाय, बकरी आदि पालतू पशुओ के लिए अलग प्रबन्ध करवा दिया और इधर के राज्य का समस्त कार्य भी उचित प्रणाली से चलता रहा। हुआ यह कि चार सालो मे वहाँ एक अदभुत भव्य भवनो से युक्त नगर बस गया। वन का तो वहां नाम तक न रहा था। उस भक्त राजा ने नव निर्मित शहर मे लोगों को बिना किसी मूल्य के मकान व दूकाने देनी शुरू कर दी तथा उनके निर्वाह हेतु खाने-पीने की एवं समस्त आवश्यकतओं की सामग्रियाँ भेजने लगा। लोगों को अब वहाँ किसी प्रकार का भय न था क्योकि अब वहाँ निर्जन वन न रहा था और न ही वन-पशु। अतः निर्भीक हो काफी संख्या मे इस देश के वासी सहर्ष वहाँ जाकर बसने लगे। चार वर्ष बीतने के साथ-साथ वह नव नगर आबाद हो गया।
      समय बीतते देर नही लगती। इसी तरह पांच वर्ष पूरे होने को आए तो उस राजा ने स्वयं ही वहाँ जाने की तैयारी शुरू कर दी तथा शहर के सब सम्भ्रान्त व्यक्तियो को एकत्र कर कहा, “मेरा राज्य-काल बीत गया है। अतः मै तो अब नदी के उस पार जा रहा हुँ। इसलिए आप अपने लिए नया राजा नियुक्त कर लिजिये।” थोड़े ही समय मे वह सब की आँखो का तारा बन चुका था अब वह राजा हँसता-खेलता प्रसन्न वदन उन लोगों से विदाई लेकर अपने बसाये नगर की ओर चला गया।
      इस राजा से पूर्व जब कोई राजा राज्य-पद से उतरने पर वन की ओर जाता था उस समय उस पार के मिलने वाले असहनीय कष्टो को याद कर अत्यन्त दुःखी होता व पछताता था तथा उसके मुँह पर हवाइयाँ उड़ने लगती थी और होता भी ऐसा था कि वह राज़ा वन-पशुओ का ग्रास बन जाता था परन्तु इस बार राजा को प्रसन्नतापूर्वक विदाई लेते देख नगरवासी आश्चर्यचकित होने लगे कि इस राजा के मन मे भयावह जंगल मे जाने का तनिक भी आतंक नही छा रहा। इस रहस्य को जानने हेतु कई सज्जन उसे नदी पार तक पहुँचाने के लिए साथ चले आये। नदी-पार पहुँचने पर सबके आश्चर्य की सीमा न रही कि उस ओर तो पूरा नगर ही बस रहा है तथा इस राजा के स्वागत हेतु वहाँ के वासी बैड़-बाजो सहित उसे सादर लिवाने के लिए सुन्दर सी पालकी लेकर प्रतीक्षा मे खड़े थे। जंगल को भव्य नगर मे परिवर्तित हुआ देख यहाँ के लोग जो राजा को विदा करने के लिए आये थे – पूछने पर इन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब कार्य इसी राजा ने ही किया है। वह भक्त राजा भी धूम-धाम के साथ पालकी में बैठ कर नव नगर की ओर प्रस्थान कर गया।
      उसकी विलक्षण प्रतिभा को देख वे लोग सोचने लगे कि हमे भविष्य के ऐसा दूरदर्शी व विचारशील राजा मिलने का नही क्योकि इससे पूर्व कई नवयुवक सम्राट पाँच वर्ष का राज्य भोग कर जंगली जानवरो का शिकार बन गए, कारण यही की उन्होंने मात्र भोग-ऐश्वर्य मे ही अपने अमूल्य समय को खो दिया और अपने भविष्य के लिए कुछ भी अर्जित न किया। इसलिए ऐसे विवेकवान राजा साहब को ही अपने देश का सम्राट बनाना चाहिये। इस प्रकार उसके गुणानुवाद करते हुए अपने नगर मे लौट आए।
      अब कुछ सम्भ्रान्त सज्जन एकत्र हो विचार विमर्श करने लगे कि अब हमे अपने लिए जो नया राजा नियुक्त करना है तो क्यो न इसी को ही अपने देश का राजा बनाया जाए क्योकि इससे पूर्व हमे भी हर पाँच वर्ष पश्चात नया राजा बनाने की कठिनाई होती थी – साथ ही कई युवको का जीवन भी समाप्त हो गया है और राज्य भी उन्नति नही कर पा रहा। अतः इस राजा को राज्य-कार्य सौपने से हमारी समस्या भी दूर हो जायेगी। ऐसा विचार दृढ कर वे लोग नये नगर मे भक्त राजा के पास गये और अपने विचार उसके समक्ष प्रकट किये, “हम सब की यही सलाह है कि यहाँ के राज्य के साथ-साथ आप वहाँ का भी राज्य संभाले।”
      उनके द्वारा की गई विनय को इस गुरू-भक्त राजा ने स्वीकार कर लिया और वह राजा अपने गुरूदेव जी के वचनानुसार शासन करता हुआ दोनो राज्यो का कार्य सुचारू रूप से करने लगा।
      तात्पर्य यह है कि इस मनुष्य शरीर से ही परमात्मा की प्राप्ति का साधन हो सकता हे। इसलिए इसको सांसरिक सुखो मे लगाकर समय को व्यर्थ नही गंवाना चाहिए। जिसने इस अमूल्य देह को पाकर मालिक का भजन, सदगुरू की सेवा व संत्सग की ओर ध्यान नही दिया वह समय चूक जाने के बाद पछताता है। बुद्धिमान मनुष्य वह है जिसने मानव जन्म को पाकर इस लोक में भी शान्ति प्राप्त कर ली और अपना परलोक भी सँवार लिया। जैसा कि इस दृष्टान्त मे आपने पढ़ा है कि उस प्रतिभाशाली सम्राट ने परलोक की भाँति अर्थात भविष्य मे प्राप्त होने वाले भयानक वन को सुधार कर सुखप्रद सुन्दर नगर के रूप में परिवर्तित कर दिया जहा उसने पांच वर्ष पश्चात राज्य से परित्यक्त होने के बाद जाना था। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने परलोक सुधार का प्रयत्न इस लोक मे रहते हुए ही कर लेना चाहिये। इसी विषय पर एक गजल है –
अरे गाफिल ! न कुछ समझा, मिला था तन रतन तुझको ।
मिलाया खाक में तूने, कहूँ क्या ऐ सजन तुझको  ।। 1 ।।
हुआ   हस्ती   वजूदी  मे,  तू   इतना  भूल   मस्ताना  ।
रहा  न यादगारी  में, अदम का जो वतन  तुझको  ।। 2 ।।
जमा दावा क्यो बैठा है, ?  मुसाफिर इस सराँ  ऊपर  ।
अभी भी आनेवाला है,  रवानी का समन  तुझको  ।। 3 ।।
सदाये  कूच  दम-दम  मे,  नही  बेहोश  सुनता  तू    ।
मनादी दे दे कहता है, यह अपना ही बदन तुझको ।। 4 ।।
जिन्हो  के  प्यार  मे हरदम,  हुआ मुश्ताक दीवाना  ।
वही  तुझको  जलावेगे,  करेगे  या  दफन  तुझको ।। 5 ।।
गदाई  और  शाही मे,  कफन  किस्मत मे  है  तेरा  ।
खबर यह भी नही पुख्ता, मिले या न कफन तुझको ।। 6 ।।
न इन फूलो के खन्दा पर, लगा खन्दा जनी हरगिज ।
हमेशा न दिखायेगा, खुशी का मुँह  चमन  तुझको   ।। 7 ।।
      सरलार्थ – 1 – अरे प्रमत्त (आलसी) पुरूष ! तुझे कुछ समझ नही आयी कि यह मानुष तन तुझे एक अनमोल रत्न मिला हुआ है परन्तु तू उसे विषय विकारो की मिटटी मे मिला रहा है।
2 – जब से तू पैदा हुआ है उस समय से आज तक तुझ पर धन और योवन का ही मद छाया रहा । तुझे भूल कर भी परलोक-गमन करना याद नहीं रहा।
3 – ऐ भोले मुसाफिर ! यह संसार तो एक पान्थशाला है। इसलिए यहां अपना अधिकार न जमा । न मालूम कब तुझे यहाँ से चलने का अर्थात मौत का पैगाम (बुलावा) आ जाये।
4 – दिन-रात कूच का जो नगारा बड़े जोरो से बज रहा है, तू अचेत होने के कारण उसको सुनता ही नही। यह अपना शरीर ही तुझे शिक्षा दे रहा है – आज जवानी, कल प्रौढ़ावस्था, परसो बुढ़ापा। अपने क्षणभंगुर शरीर की अवस्था को निहार और इससे शिक्षा शिक्षा ग्रहण कर ।
5 – अपनी जिस संतान के कारण तू दिन-रात एक करके काम-धन्धो में लगा हुआ है, वही निजी सन्तान अन्तिम समय मे तुझे श्मशान घाट मे जला आवेगी अथवा भूमि मे दफना देगी।
6 – गरीबी या अमीरी – दोनों ही अवस्थाओ मे मरते समय एक कफन के सिवाय तुझे कुछ नही मिल सकता तथा यह भी निशिचत नही कि अन्तिम समय मे तुझे कफन भी मिलता है अथवा नही क्योकि ऐसे कई प्रमाण है जिन्हें कि मृत्यु के उपरान्त कफन तक भी उपलब्ध न हो सका।
7 – संसार के झिलमिलाते पदार्थों को देखकर इतना गर्वित न हो क्योकि यह सदैव के लिए तुझे हँसता हुआ दिखाई नही देता। माया के पदार्थों व माया तो ढलती छाँव की तरह है। मरणाेपरान्त तो जीव के साथ अपने किये कर्म ही साथ जायेगे। इसलिए जीवन-काल मे ही पूर्ण सन्त सदगुरू की चरण-शरण ग्रहण कर लेनी चाहिये, जिससे कि उनसे निष्काम कर्म करने की शिक्षा ग्रहण कर परलोक मे काम आने वाली सम्पत्ति अर्जित कर सके। यही मानव मात्र का कर्त्तव्य है और इसी मे ही उनकी बड़ाई है।

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